पश्चिम सिंहभूम – पत्थलगड़ी का विरोध करने पर अगवा किए गए सभी सात लोगों की हत्या

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पश्चिम सिंहभूम जिले के गुदड़ी प्रखंड में पत्थलगड़ी मामले में सात लोगों की हत्या कर दी गई है. ग्रामीणों में मंगलवार को हुए विवाद के बाद यह हत्याकांड हुआ. बताया जा रहा है कि पत्थलगड़ी का विरोध करने के कारण यह हत्याएं हुईं. झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले में पत्थलगड़ी का विरोध करने पर अगवा किए गए सभी सात लोगों के शव बुधवार सुबह बरामद हुए. पुलिस ने सभी शव बुरुगुलीकेरा गांव के पास स्थित जंगल से बरामद किए. पुलिस ने सभी मृतकों के शव पोस्टमार्टम के लिए भेजवा दिए हैं.

जानकारी के अनुसार पत्थलगड़ी समर्थक रविवार को बुरुगुलीकेरा गांव में ग्रामीणों के साथ बैठक कर रहे थे. वे ग्रामीणों से वोटर कार्ड, आधार कार्ड आदि जमा करने को कह रहे थे. इस दौरान उपमुखिया जेम्स बूढ़ सहित अन्य लोगों ने यह कहकर विरोध किया कि अगर वोटर कार्ड, आधार कार्ड आदि जमा कर देंगे तो बच्चों को पढ़ाई में दिक्कत होगी. इससे नाराज पत्थलगड़ी समर्थक उपमुखिया जेम्स बूढ़, लुपा बुढ़ और अन्य पांच लोगों के साथ मारपीट करने लगे.

तत्पश्चात पत्थलगड़ी समर्थक उपमुखिया जेम्स बूढ़ और अन्य छह लोगों को उठाकर जंगल की ओर ले गए. रविवार देर रात तक उनके घर वापस नहीं लौटने पर सोमवार को उपमुखिया जेम्स बूढ़ और अन्य छह लोगों के परिजन गुदड़ी थाना पहुंचे. उन्होंने मामले की जानकारी पुलिस को दी. मंगलवार दोपहर को पुलिस को उपमुखिया जेम्स बूढ़ और अन्य छह लोगों की हत्या कर उनके शव जंगल में फेंके जाने की सूचना मिली. क्षेत्र नक्सलग्रस्त होने के कारण पुलिस मंगलवर रात तक घटनास्थल पर नहीं पहुंची थी. इसके बाद सुबह पुलिस ने सातों अगवा लोगों के शव बरामद कर लिए.

स्थानीय पुलिस अधीक्षक ने बताया कि गांव के उप मुखिया की हत्या होने की सूचना मिली है, जिसकी पुष्टि कराई जा रही है. जानकारी के अनुसार, मंगलवार की दोपहर को हत्या के घटना की सूचना मिलने के बाद जिले के कई पुलिस पदाधिकारियों के साथ देर शाम लोढ़ाई पहुंची थीं. घटनास्थल सोनुवा थाना से करीब 35 किलोमीटर दूर है. जिस जगह पर यह घटना हुई है, वह घने जंगल के बीच और नक्सल प्रभावित क्षेत्र है.

हेमंत सोरेन ने झारखंड का मुख्यमंत्री बनते ही पहली बैठक में भाजपा सरकार द्वारा पत्थलगड़ी मामले में किए गए सारे मुक़दमे वापस लेने का फ़ैसला ले लिया. यह जल्दबाज़ी आम जन की समझ के परे थी. इस आंदोलन के बहाने आदिवासी परम्परा को ढाल बनाकर भारत सरकार को अवैध घोषित करने के बाद अलग करेन्सी, अलग स्वास्थ्य सेवा और अलग सेना की घोषणा कर दी गई थी.

पत्थलगड़ी असल में है क्या?

रघुवर सरकार के दौरान झारखंड के खूंटी, गुमला, सिमड़ेगा, चाईबासा और सरायकेला जिलों में पत्थलगड़ी की जा रही थी, जिसपर सरकार और आदिवासी आमने-सामने थे. असल में पत्थलगड़ी आदिवासियों की सदियों से चली आ रही परम्पराओं में से एक है. परम्परागत पत्थलगड़ी और अभी की जा रही पत्थलगड़ी में काफ़ी अंतर है. पत्थलगड़ी वाले इलाक़ों में सरकारी शिक्षा का विरोध कर दिया गया था, वहां खुद की करेंसी लाने की बात की जा रही थी. केंद्र सरकार और राज्य सरकार के कानूनों को खुले तौर पर चुनौती दी जा रही थी.

परम्परागत पत्थलगड़ी के अनुसार अगर आदिवासी इलाके में कोई भी उल्लेखनीय काम होता था, तो आदिवासी उस इलाके में एक बड़ा सा पत्थर लगा देते थे और उस पर उस काम को दर्ज कर देते थे. अगर किसी की मौत हो जाए या फिर किसी का जन्म हो तो आदिवासी पत्थर लगाकर उसे दर्ज करते हैं. इसके अलावा अगर उनके इलाके का कोई शहीद हो जाए या फिर आजादी की लड़ाई में कोई शहीद हुआ हो, तो इलाके के लोग उसके नाम पर पत्थर लगा देते हैं. अगर कुछ आदिवासी लोग मिलकर अपने लिए कोई नया गांव बसाना चाहते हैं, तो वो उस गांव की सीमाएं निर्धारित करते हैं और फिर एक पत्थर लगाकर उस गांव का नाम, उसकी सीमा और उसकी जनसंख्या जैसी चीजें पत्थर पर अंकित कर देते हैं. इस तरह के कुल आठ चीजों में पत्थलगड़ी की प्रथा रही है और ये प्रथा पिछले कई सौ सालों से चली आ रही है.

रघुवर सरकार के दौरान पत्थलगड़ी राज्य के खूंटी, गुमला, सिमडेगा, चाईबासा और सरायकेला जैसे कुल 13 जिलों के करीब 50 गांवों में चल रही थी. इनमें से भी चार जिले के 34 गांव सबसे ज्यादा प्रभावित थे. चर्च और नक्सलियों की शह पर उन गांवों में हो यह रहा था कि पत्थलगड़ी करके किसी गांव की सीमा निर्धारित कर दी गई है, तो उसका नियम ये है कि उस गांव की ग्रामसभा की इजाजत के बिना कोई भी शख्स उस गांव में दाखिल नहीं हो सकता है. बाहर से आए किसी भी शख्स को पहले ग्रामसभा से इजाजत लेनी पड़ती है और तभी उसे दाखिला मिलता है. अगर कोई जबरदस्ती उस गांव में दाखिल होता है, तो पूरा गांव मिलकर उसे बंधक बना लेता है. फिर ग्रामसभा उसे दंड देती है.

पत्थलगड़ी पर हाल में सबसे बड़ा विवाद 2017 में सामने आया था. झारखंड की राजधानी रांची से करीब 8 किलोमीटर दूर एक गांव है. इस गांव का नाम है सोहड़ा, जो तुपुदाना ओपी इलाके के नामकुम प्रखंड में पड़ता है. 2017 में दक्षिण कोरिया की ऑटोमोबाइल कंपनी इस गांव के 210 एकड़ जमीन पर कंपनी लगाना चाहती थी. इसके लिए कंपनी के प्रतिनिधियों ने तीन बार गांव का दौरा किया. जमीन को समतल भी करवाया गया, लेकिन मार्च 2017 आते-आते गांव के लोगों ने इस गांव में पत्थलगड़ी कर दी. उन्होंने ऐलान कर दिया कि इस गांव से बाहर का कोई भी आदमी गांव में दाखिल नहीं हो सकता है. उसके बाद कोरियाई कंपनी को पीछे हटना पड़ गया. इस दौरान प्रशासन ने दावा किया था कि जनवरी 2017 से अगस्त 2017 के बीच खूंटी, अड़की व मुरहू इलाके में करीब 50 किलो अफीम बरामद की गई थी. प्रशासन ने गांवों में हो रही अफीम की खेती को बर्बाद कर दिया था, जिससे बौखलाए हुए अपराधियों की शह पर गांववालों ने पत्थलगड़ी करके प्रशासनिक अधिकारियों का विरोध किया.

2017 में ही 25 अगस्त को डीप्टी एसपी रणवीर कुमार खूंटी जिले के सिलादोन गांव में करीब 300 पुलिसवालों के साथ पहुंचे थे. पुलिस को सूचना मिली थी कि गांव में अफीम की खेती हो रही है. इसी की जांच के लिए पुलिस टीम खूंटी पहुंची थी. लेकिन गांववाले इससे नाराज हो गए और हथियारों से लैस गांववालों ने पुलिस के जवानों को बंधक बना लिया. करीब 24 घंटे बाद जब बड़े अधिकारी मौके पर पहुंचे, तो पुलिस टीम को छुड़ाया जा सका.

फरवरी 2018 में एक बार फिर गांववाले और प्रशासन आमने सामने आ गए. पुलिस की एक टीम 21 फरवरी को कोचांग इलाके में नक्सलियों के खिलाफ सर्च अभियान पूरा कर लौट रही थी. रास्ते में उन्हें कुरुंगा गांव के प्रधान सागर मुंडा मिल गए, जिनपर 2017 में पुलिसवालों को बंधक बनाने का केस दर्ज हुआ था. इसी मामले की पूछताछ के लिए पुलिस ने सागर को हिरासत में ले लिया और थाने लेकर जाने लगी. इसी बीच पुलिस के 25 जवान अपनी टुकड़ी से पीछे छूट गए. जब गांववालों को सागर को हिरासत में लेने और 25 जवानों के पीछे छूटने का पता चला, तो वो हथियारों के साथ बाहर आए और पुलिस के छूटे हुए 25 जवानों को बंधक बना लिया. जब पुलिस ने सागर मुंडा को रिहा किया, तब जाकर ये जवान गांववालों के चंगुल से छूट पाए. 28 फरवरी को विवाद फिर भड़क गया. सीआरपीएफ के जवान नक्सलियों के खिलाफ सर्च अभियान चलाते हुए कुरुंगा पहुंचे, तो गांववालों ने सीआरपीएफ के सर्च अभियान का भी विरोध किया.

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