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भगवान से प्रार्थना कीजिए कि श्री राम, सीता और लक्ष्मण की प्रतिमा को आग के हवाले करने करने वाले, तिरंगा झंडा को जलाने की कोशिश करने वाले और भारत का एक और बँटवारा करने वाले राष्ट्रद्रोही और उसके इशारे पर नाचने वाली दोनों तमिल द्रविड़ पार्टियों के ख़िलाफ़ सुपरस्टार ने जो चर्चा छेड़ी है, आवाज़ उठाई है और सच्चाई को सामने रखा है- वो ढीली न पड़े। सुपरस्टार का मन न बदले। अगर उनका मन नहीं बदला तो आपको देश में वो देखने को मिलेगा, जो आज तक नहीं हुआ। ये आग जब मद्रास से चलेगी तो अपनी लपटों में हिन्दुकुश तक हर एक हिन्दुविरोधी को लपेटे चलेगी। हाँ, अगर आपको तमिलनाडु की राजनीति को समझना है तो भाजपा से ऊपर उठना पड़ेगा।

कौन था हिन्दुओं से घृणा करने वाला पेरियार? द्रविड़ आंदोलन का बाप कह लीजिए, जिसकी बनाई विचारधारा पर डीएमके और एआईडीएमके जैसी पार्टियाँ निकलीं। कौन हैं सुपरस्टार रजनीकांत? पेरियार का बाप। मित्रों, तमिलनाडु की राजनीति और फ़िल्म को पिछले 12 वर्षों से देख रहा हूँ, मेरा विश्लेषण शायद ही ग़लत हो। आज महानायक ने दोनों द्रविड़ पार्टियों को उस मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ वो न तो खुल कर हिन्दू देवी-देवताओं को पहले की तरह गालियाँ बक सकती हैं और न ही पेरियार को लेकर सुपरस्टार के ख़िलाफ़ ज़हर उगल सकती हैं। तमिलनाडु ऐसा न था दोस्तों। वहाँ भगवान राम की इंजीनियरिंग की डिग्री माँगने वाला करूणानिधि 6 दशक तक प्रभावी रहा था। समय बदल रहा है। वो दौर दूसरा था, ये दौर दूसरा है।

तमिल राजनीति में सुपरस्टार और सुब्रह्मण्यम स्वामी की दुश्मनी किसी से छिपी नहीं है। स्वामी कभी रजनी को देखना नहीं चाहते थे, उन्हें कम दिमाग वाला बताते थे और फ्लिप-फ्लॉप विचारधारा वाला व्यक्ति मानते थे। समय का तकाजा देखिए कि आज वही स्वामी रजनी के लिए कोर्ट जाने को तैयार हैं। स्पष्ट हैं, दोनों द्रविड़ पार्टियों के सैंकड़ों नेता कोर्ट जाएँगे और स्वामी-सुपरस्टार की जुगलबंदी को उनका सामना करना पड़ेगा। दोनों ने दशकों बाद फोन कॉल पर बातचीत की। महाराष्ट्र में बाल ठाकरे से 10 ज़्यादा गुना प्रभाव रहा है पेरियार का तमिलनाडु में। उसकी शह पर ही करुणानिधि ब्राह्मणों को गाली देकर मुख्यमंत्री बनता था। द्रविड़ आंदोलन की कमर टूट रही है।

उत्तर भारत के लोग रजनीकांत से इसीलिए भी उतने परिचित नहीं हैं क्योंकि 80s व 90s में कुछेक हिंदीं फ़िल्में करने के बाद उन्होंने हिंदी सिनेमा को लगभग अलविदा कह दिया। ये वो व्यक्ति है, जो एक ही फ़िल्म से ₹800 करोड़ रुपए कलेक्शन देने का ताक़त रखता है। जो किसी पार्टी के ख़िलाफ़ प्रचार कर के उसकी सरकार गिरा सकता है। जो ‘छपाक’ और ‘तान्हाजी’ के बीच अपनी फ़िल्म को रिलीज कर 10 दिनों में ₹250 करोड़ बटोर सकता है। सादा जीवन-उच्च विचार जीने वाले एक महानायक को गाली देने की हिम्मत फिलहाल किसी में नहीं है, सिवाय तमिलनाडु में मरी हुई कॉन्ग्रेस के दोयम दर्जे के नेता कार्ति चिदंबरम जैसों के। तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति को कुछ यूँ समझें।

आर्य-द्रविड़ की बेकार थ्योरी का अगर सबसे ज़्यादा फ़ायदा किसी ने उठाया है तो वो तमिलनाडु की द्रविड़ पार्टियाँ रही हैं। पेरियार ने 1959 में भगवान राम के चित्र को खुलेआम जलाया था और उसके बाद गिरफ़्तार भी हुआ था। उसका मानना था कि हिन्दू धर्म का एक ही मतलब है और वो है ब्राह्मणों का प्रभुत्व। वहीं इस्लाम को लेकर वो अच्छी बातें बोलता था। पेरियार कहता था कि इस्लाम भी एक तरह की द्रविड़ विचारधारा ही है। वो अपनी रैलियों में इस्लाम और ईसाइयत की ख़ूब बड़ाई करता था और दोनों को अपने दिल के निकट बताता था। बस यही तमिलनडु की राजनीति का आधार बन गया। वो ऐसा ज़हरीला इंसान था कि उसके मरने के बाद उसकी पत्नी ने राम, सीता और लक्ष्मण प्रतिमाएँ जलाई थीं। क्यों? क्योंकि पूरे देश में रावण, कुम्भकरण और मेघनाद को जलाया जाता है।

रजनीकांत भाजपा के साथ आएँ या नहीं, उन्होंने वो कर दिखाया है जिसे करने से भाजपा दशकों से हिंचकती रही थी। सुपरस्टार ने परियर को लातों तले रौंदते हुए अपनी राजनीतिक संग्राम की शुरुआत की है। अब देखना ये है कि सुपरस्टार ने जिस मुद्दे को जन्म दिया है, उसपर वो कायम रहते हैं कि नहीं। क्योंकि ये रास्ता काफ़ी कठिन होने वाला है। पेरियार ने समाज के कुछ तबकों को ब्राह्मणों के ख़िलाफ़ ऐसा भड़काया था कि वो सिर्फ़ एक हिन्दू प्रतिमाओं को अपमानित करने वाला नहीं रहा, उसे एक देवता के रूप में स्थापित कर दिया गया। वो देवता, जिसने निचले तबकों को ऊपर उठाया। ऐसी इमेज के कारण उसकी हिन्दुत्वविरोधी छवि को वापस मुख्यधारा में लाना आसान कार्य नहीं था।

अगर पेरियार कुछ दिन और ज़िंदा रहता तो उसने पूरे दक्षिण भारत को कश्मीर बना दिया होता। वो द्रविड़नाडु की बात करता था और कहता था कि उत्तर भारत उनलोगों को लूट रहा है। वो भारत के दूसरा जिन्ना था, जो अँग्रेजों को ख़ुश करने में सफल नहीं हो पाया। वो जिन्ना, जिसने 1940 में कांचीपुरम में आयोजित एक कार्यक्रम में द्रविड़नाडु के एक अलग नक्शा भी जारी कर दिया था। अगर वो अँग्रेजों को मनाने में कामयाब रहता तो शायद भारत का एक टुकड़ा और होता। तमिल जिन्ना के आज इसी देश में इतने अनुयायी हैं, ये अपनेआप में चौंकाने वाली बात है। ये वो देशद्रोही था, जिसने 1955 में भारत का राष्ट्रीय झंडा जलाने की योजना बनाई थी। जी हाँ, तिरंगे को जलाने की इच्छा रखने वाला पेरियार आज इस देश के हज़ारों नेताओं करोड़ों लोगों का आइडल है। ऐसा देश है मेरा!

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