
आज एक साधारण सी वेशभूषा में असाधारण व्यक्तित्व का अवसान अनेक मनों व हृदयों को व्यथित कर गया। मध्य क्षेत्र के पूर्व में क्षेत्र प्रचारक रहे श्रीमान विनोद कुमारजी ने आज लगभग तीन महीने की कष्टप्रद अस्वस्थता की यात्रा के बाद अपने सरीर को त्याग दिया। वे 1972 में मोदीनगर बैठक से संघ के विस्तारक निकले। बाद में फिरोजाबाद, आगरा महानगर मथुरा जिला फिर 1982 से 1990 तक आगरा विभाग प्रचारक रहे। 1990 से 1996 तक बरेली के विभाग व सम्भाग प्रचारक के साथ-साथ ब्रज प्रांत शारीरिक प्रमुख व सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश क्षेत्र के शारीरिक प्रमुख भी रहे। जुलाई 1996 में सह प्रांत प्रचारक होकर महाकौशल प्रांत में आ गए। जुलाई 1999 में प्रांत प्रचारक और मार्च 2005 में मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ (मध्य) क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक व 2012 में अखिल भारतीय सह प्रचारक प्रमुख बने। वे 2018 में अ.भा. कार्यकारिणी के सदस्य बनाये गये।
श्री विनोद कुमारजी को किसी भी स्तर की अनुशासनहीनता नापसन्द थी।यद्यपि वे स्वयं के प्रति कठोर व सामने वाले के प्रति संवेदनशील रहते थे। 1990 के संघ शिक्षा वर्ग एटा (उप्र) में वे मुख्य शिक्षक थे। रविवार का दिन था। महाभारत धारावाहिक का आकर्षण रहाता ही था। महाभारत दिखाने की व्यवस्था भी की जाती श्री, परन्तु इस दिन सूचनाओं में वह सूचना नहीं दी गयी थी। शिक्षार्थी अधीर हो गये। ध्वज प्रणाम के पश्चात् जैसे ही ध्वजावतरण प्रारंभ हुआ, तभी एकदम जोर से आवाज आयी- महाभारत। बस फिर क्या था? ध्वजवतरण रोककर विनोद जी ध्वनिवर्द्धक पकड़कर तो गरजे मेरे हृदय में आग लग गयी है। आप लोगों ने भगवा ध्वज अर्थात् गुरु का असहनीय अपमान किया है। मैं बहुत आहत हो गया हूँ
तुम्हारे इस अनुशासनहीन व्यवहार से, आज कोई महाभारत नहीं दिखाया जाएगा। और दोपहर को महाभारत नहीं दिखाया गया। परन्तु वे संवेदनशील भी थे तो रिकार्डिग कराके रात्रि कार्यक्रम में दिखाया गया महाभारत।
विनोदजी स्वयं अति मितव्ययी थे। कई बार भोजन नहीं होता था। भूख की सहनशीलता चुक जाती थी तो चवन्नी के दो केले व चवन्नी का एक पाव दूध लेकर अठन्नी में पेट भर लेते थे। जीवन चलाने के बहुत से सस्ते रास्ते उनको मालूम थे। सहयोगी प्रचारकों को सब सिखाते भी थे। उनकी मितव्ययता व कंजूसी में हेयर लाइन डिफरेन्स था, क्योंकि उनकी मितव्ययता सामाजिक धन के प्रति थी। प्रचारकों के व्यय पत्रक बारीकों से निरीक्षण करते थे। किसी ने अधिक व्यय या अनपेक्षित मद पर व्यय किया तो बुलाकर समझाइस देते थे। अनुशासन में डॉ. नित्यानन्दजी व आय-व्यय में रज्जू भैया उनके आदर्श थे। वे दोनों विनोद जी के बारे में ऐसा मानते भी थे। एक बार मैंने डॉ नित्यानन्दजी से संघ कार्य से सम्बन्धित कुछ बातें पूछी तो उन्होंने बताया तो अवश्य , परन्तु साथ में यह भी बताया कि तुम स्वयं विनोद जी के साथ रहते हो तो कहीं और पूछने की क्या आवश्यकता है। विनोद जी बड़े अधिकारियों की चिन्ता तो करते ही थे,
लेकिन अपने से छोटों को तो स्नेह-प्रेम-लाड-दुलार करके पालते थे। बरेली में विभाग प्रचारक रहते के समय की बात है, अखिल भारतीय अधिकारी प्रवास में महानगर के स्वयंसेवकों क प्रातः 6.30 बजे एकत्रीकरण होना था। देर रात्रि तक मंच बन रहा था तभी विनोद जी ने पूछा कि रात को मंच व ध्वज की सुरक्षा में कौन होगा? सभी ने वहाँ सोने के लिए मना कर दिया। एक नगर प्रचापक ने कहा कि विनोद जी मैं सो जाऊंगा। विनोद जी उस से बोले कि तुम तो फालतू हो न? बाकी सब काम के लोग है। अपने-अपने घर सोयेंगे। तुम यहाँ सोओ। विनोद जी उस नगर प्रचारक के साथ वही रुके ।महाकौशल प्रान्त में एक विभाग प्रचारक बीमार हो गये थे।
वे दो दिन विनोद जी (प्रांत प्रचारक) के पास रुके थे। विनोदजी ने उनकी पूरी सेवा की और उनके कपड़े भी धोये। विनोद जी अपने साथ के सभी प्रचारकों से वर्ष में एक व्यक्तिगत लम्बी बात अवश्य करते थे। प्रचारक भी उनसे बात करने को लालायित रहते थे। जब वे असिल भारतीय सह प्रचारक प्रमुख बने तो यह क्रम उन्होंने सारे देश के प्रचारकों के साथ अपनाया।
परिश्रमी तो प्रत्येक प्रचारक को होना ही चाहिए। विनोद जी ने 20-20 घण्टे लगातार काम किया। प्रवास हो या संघ शिक्षा वर्ग की व्यवस्था संघ शिक्षा वर्ग लगने वाला है। पता चलता था कि विनोद जी 20 दिन पूर्व ही वर्ग स्थान पर आकर बैठ गये। कार्यकर्ताओं से कैसे काम लेना और श्रेष्ठतम व्यवस्था कैसे निर्माण करना मानो इस प्रबन्धन में वे डी. लिट् थे। रामलाल जी भाईसाहब कहते थे कि अव्यवस्था में व्यवस्था का निर्माण विनोदी से सीखना होगा। दिनेशजी भाईसाहब विनोदजी को हनुमानजी कहते थे। हनुमानजी अर्थात आदर्श स्वयंसेवक।
विनोदजी का स्वभाव हर काम एडवांस करने का था। बैठकों में जाते थे तो सारे काम वृत्त हो वा श्री गुरुदक्षिणा का हिसाब, सब कुछ अपने स्थान से तैयार करके ले जाते थे। वहाँ जाकर दूसरों का देखते या सहायता करते थे।
अपने साकारियों से सदैव सहज़ मधुरता रखना उनकी प्रवृत्ति थी। घरों में माता-बहनों से भी अच्छी बात होती थी। ‘चूल्हे तक के सम्बन्स’ जिसे कहा जाता है।
सदैव सकारात्मक सोचते । संघ पद्धति के तज्ञ थे। प्रारंभ में पढ़ने का स्वभाव तो नहीं था, परन्तु अपने का सब जानते थे। संघ का संविधान जिला प्रचारक रहते समय से ही रटा हुआ था। बौद्धिक तो नहीं देते थे, परंतु बैठ बहुत अच्छी लेते थे। फिर संभाग प्रचारक बनने के साथ पुस्तक पढ़ना प्रारम्भ किया और बौद्धिक भी बहुत अच्छा कर लिया । वे एक-निष्ठ थे। वे संघ निष्ठ थे। बाद में भक्ति में लगे से पूरी तरह भक्त ही हो गये। वे किसी के नहीं थे परन्तु उनके सब थे। वे प्रेम के सागर थे
पूज्य डॉक्टर जी के एक सच्चे अनुयायी थे। विनोद जी गुणों का खजाना थे। स्थान की सीमा है, अधिक नहीं लिखा जा सकता, बोला तो बिल्कुल भी नहीं जा सकता। परन्तु उन्होने हमें पुकारा, हमने उनकी वाणी सुनी और हम उनके हो गये। उनकी वह वाणी बाहर सुनने को भले न मिले, परन्तु हमारे हृदय में वह अवश्य गुंजायमान है और सदैव रहेगी। विनोद जी सदैव याद आयेंगे। हम सभी स्वयंसेवकों की ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
लेखक- वरिष्ठ प्रचारक, क्षेत्र बौद्धिक प्रमुख (राजस्थान) डॉ . श्रीकांत जी