
सामाजिक समरसता, समानता, अहिंसा के प्रणेता, अग्रवंश के संस्थापक महान, प्रतापी अग्रोदय (अग्रोहा) के महाराजा अग्रसेन जी की जयंती पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
महाराजा अग्रसेन जी का जन्म द्वापर युग के अंतिम चरण में सूर्यवंशी महाराजा वल्लभ देव जी और महारानी भगवती देवी जी के यहां हुआ। ऐसा कहा जाता है कि महाराज अग्रसेन के नाम पर उनके पिताश्री महाराज वल्लभ देव ने अग्र (वर्तमान Agra) शहर की स्थापना की।आपका विवाह नागवंश के महाराज नागराज की सुपुत्री राजकुमारी माधवी देवी जी के साथ हुआ। महाराजा अग्रसेन जी के 18 पुत्र थे और उनकी वंशावली को अग्रवाल कहा जाता है और 18 गौत्र हैं, मित्तल, सिंहल, गर्ग, बंसल, जिंदल, कंसल, बिंदल, मंगल, तायल, गोयल, कुच्छल, नांगल, भंगल, तिंगल, धारण, मधुकुल, कायल, ऐरण। अग्रवंश महालक्ष्मी जी का उपासक है और अपनी आमदनी का एक भाग समाज में दान के लिए अवश्य निकालता है।
महाराजा अग्रसेन जी ने 18 गणराज्य को मिलाकर नवीन साम्राज्य की स्थापना करी, जिसकी राजधानी अग्रोहा थी। वर्तमान में अग्रोहा हरियाणा के हिसार के समीप है।
अहिंसा का श्रेष्ठ उदाहरण मिलता है की आपने अपने साम्राज्य में यज्ञ में दी जाने वाली पशुबलि को निषेध किया, जिससे महाराज का पशु प्रेमी होता और अहिंसा का स्वभाव ध्यान आकर्षित करता है।
उनके राज्य में राजा का पुत्र राजकुमार और प्रजा समाजजन के पुत्र एक ही गुरूकुल में शिक्षा प्राप्त करते थे।
सामाजिक समरसता और समाजवाद का श्रेष्ठ उदहारण उन्होंने अपने राज्य में स्थापित किया और ‘एक ईंट एक रूपया’ की परंपरा की स्थापना की, उनके राज्य में जब कोई नवीन परिवार रहने आता तो सभी उस परिवार को ‘एक ईंट एक रूपया’ देते, जिससे उस परिवार को रहने के लिए स्वयं का भवन निर्माण हेतु ईंट और व्यापार करने एवं अन्य व्यवस्था के लिए धन एकत्रित हो जाता।
इस व्यवस्था से लेनेवाले को भी यह भाव नहीं आता की उसपर कोई दयाकर रहा है, क्योंकि वह भी भविष्य में राज्य में रहने आने वाले नवीन परिवार को ‘एक ईंट एक रूपया’ देंगे और देनेवाले को भी अहंकार नहीं होता।
नये परिवार को आने के साथ ही समाज का सहयोग बिना किसी आग्रह के प्राप्त होने से वह राज्य और समाज के प्रति अनुग्रहीत महसूस करने के साथ, समाज में समरस हो जाता। अग्रवंश महालक्ष्मी जी का उपासक है और सभी अग्रवंशी ( अग्रवाल) अपनी आमदनी का एक भाग, वर्तमान समय में भी समाज में दान के लिए अवश्य निकालते हैं। हम आज कुछ करने के लिए सक्षम हैं और छोटा सा सहयोग अन्य के लिए बडा होगा और कल वो भी किसी को सहयोग करेगा, यही भाव समाज को समरस बनाता है।
महाराजा अग्रसेन जी की एक ही गुरूकुल में बिना ऊंच नीच के सभी बच्चों का शिक्षा प्राप्त करना और ‘एक ईंट एक रूपया’ की नीति, परंपरा वास्तविक सामाजिक समरसता को स्थापित करती है।
महाराजा अग्रसेन जी की जयंती पर समाज के सभी वर्ग को उनसे प्रेरणा लेते हुए समाज के प्रत्येक ब को अपनाते हुए उसके लिए बिना स्वार्थ कुछ सकारात्मक सहयोग करने का भाव रखना चाहिए।
सुजीत सिंहल