कश्मीर में हिन्दुओं के नरसंहार का जीवित प्रमाण है ‘द कश्मीर फाइल्स’

“खटखट-खटखट….खटखट-खटखट
खटखट-खटखट….दरवाजे पर खड़े कुछ आतंकवादी हाथों में एके-47 रायफल लियें जोर जोर से उसे ठोक रहें थे…परिवार की महिला अपने पति को बचाने के उसे छूपने के लिए कहती है और पति परिवार के खातिर घर में ऊपर की ओर एक लकड़ी के संदूक में छिप जाता है जिसमें परिवार चावल जमाकर कर रखता था। आतंकी, परिवार के मुस्लिम पड़ोसी की ओर देखता है और वह मुस्लिम पड़ोसी हिन्दू पड़ोसी पुरूष के ऊपर छिपे होने का संकेत देता है। सभी आतंकवादी घर में घुसते है, परिवार की महिला के विरोध के बाद भी चावल के संदूक पर अंधाधुंध गोलियां चलाकर पुरूष को मार देते है, और महिला को कहते यदि अपने बाकी परिवार की सलामती चाहती है तो अपने मरें हुए पति के खून से भीगे चावल उसे खाना होंगें और परिवार की खातिर वह महिला उन चावलों को खाती है और परिवार की रक्षा करती है।’ –
विभत्स कर देने वाला यह दृश्य है ‘द कश्मीर फाइल्स’ मूवी का जिसे विवेक अग्निहोत्री और उनकी टीम ने बनाया है। 19 जनवरी 1990 की वो भयानक रात जब कश्मीर में इस्लामिक आतंकवादीयो के द्वारा बम-बंदूक के दम पर हिन्दुओं को कश्मीर से भगाया गया। विवेक अग्निहोत्री ने अपनी इस फिल्म में वो सभी कुछ बताने का प्रयास किया जो उस समय वहां हुआ था, जिसे सभी को जानना जरूरी है। सिर्फ एक रात ही भयावह नहीं थी, वो रात भयानकता की शुरुआत थी और आने वालें समय में कश्मीर के गांव-गांव में आतंकियों ने हिन्दुओं को ढूंढ-ढूंढकर मारा। गांव के गांव जला दिए गए। महिलाओं-बच्चों समेत सभी को क्रूरता से मारा गया। ऊपर बताया गया दृश्य केवल संकेत है वास्तविक घटनाएं अधिक विक्राल थी। फिल्म के एक दृश्य में आतंवादियों द्वारा एक साथ 24 हिन्दुओं को मारा जाता है जिसमें बच्चे, महिलाएं, गर्भवती महिलाएं, बूढ़े पूरूष, जवान सभी थें। थिएटर में बैठा शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसकी आंखों में उस समय आंसू ना होंगें। फिल्म के एक दृश्य में एक हिन्दू पुरूष एक आतंकवादी से कहता है ‘मैंने तुझे पढ़ाया है।’ इस एक वाक्य सें यह दर्शाया गया है कि 1990 में कश्मीर में आतंकवादी बाहर से नहीं आए थें बल्कि वही रहने वालें स्थानीय थें। फिल्म के दृश्य में बताया गया है जब हिन्दू महिला ऐक बेटे को स्कूल छोड़ने जाती है और वहां एक मौलवी से कहती है कि स्कूल में विज्ञान क्यों नहीं पढाया जाता जिसके जवाब में मौलवी महिला को बदनीयत से धर्म परिवर्तन कर शादी करने के लिए कहता है लेकिन उक्त महिला अपनी जान देकर धर्म की रक्षा करती हुई बलिदान हो जाती है, हिन्दू महिला की मौत का दृश्य हमें अंदर तक थर-थरा देता है और मुगलों द्वारा किए नरसंहार की याद दिलाता है। मूवी में ईमानदारी से बताया गया है कि कश्मीर के मुस्लिम कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते है क्योंकि धारा370 ने उन्हें अपना संविधान और अपना झंडा दिया है। कश्मीर के राजनेताओं को भी अहंकार है कि उनका अलग संविधान है और अलग झंडा है और वहां कि सरकार का आतंवादियों को खुला समर्थन है। लेकिन वर्तमान में धारा370 इतिहास की बात हो चुकी है।
‘सच जब तक जूते पहनता है, तब तक झूठ सारी दुनिया का चक्कर लगाकर जाता है।’
यह फिल्म के एक दृश्य में संवाद है। कश्मीर में हुए हिन्दुओं के नरसंहार की भी यही कहानी है, इस फिल्म रूपी सच को जूतें पहनने में भी 30 वर्ष का समय लगा तब तक कश्मीर का झूठ संसार के हजारों चक्कर लगा चुका है। जनवरी 1990 में कश्मीर में हुआ नरसंहार दो अलग-अलग मोर्चों पर एक साथ किया जा रहा था। बम-बंदूक के दम पर कश्मीर में जो रहा था वह एक मोर्चा था लेकिन दूसरें मोर्चे पर बौद्धिक नरसंहार भी किया जा रहा था, जो कुछ भी उस समय कश्मीर में घट रहा था उसे बाकी भारत को जानने ही नहीं दिया जा रहा था, केवल एक तरफा रिपोर्टिंग की जा थी। उस समय जो घट रहा था उसे छुपाया जा रहा था और उसके बाद से लगातार भारत विरोधी ईकोसिस्टम ने कश्मीर के सच को कभी सच बनने ही नहीं दिया गया। एक दृश्य में कहा जाता है भले ही सरकार उनकी हो लेकिन सिस्टम तो हमारा है। यह संवाद दर्शाता है कि उस समय से लेकर वर्तमान तक किस प्रकार से एक स्ट्रेटजिकली वहां के हिन्दुओं को भागने के लिए मजबूर करने से लेकर सच को कभी बाकी भारत के सामने आने ही नहीं दिया गया। और केवल 1947 के बाद को कश्मीर कि इतिहास माना गया। लेकिन कश्मीर के विराट इतिहास को भी इस फिल्म में बहुत ही रोचक ढंग से सामने लाया गया है। इसके अलावा 1300 ई. से 1990 तक कश्मीर में हुए हिन्दुओं के नरसंहार को बताने का प्रयास सराहनीय है।
‘द कश्मीर फाइल्स’ एक मूवी ना होकर एक विडियों डॉक्युमेंट है। जिसे हर भारतीय को पढ़ना चाहिए, यहां में इस मूवी को पढ़ने की बात ही कर रहा हूं। वर्तमान युवा को भारत की उस भयानक घटना को जानना और समझना बहुत जरुरी है। ताकि फिर कभी ऐसा ना हो कि हम अपने परिवार के साथ रात में भोजन कर रहें हो और चार लोग हाथों में हथियार लेकर आएं और हमसें कहें कि अपने घर की महिलाओं को हमें सौंप दों और यहां से भाग जाओं।
लेखक- सनी राजपूत, उज्जैन

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