
बांगरु-बाण
श्रीपाद अवधूत की कलम से
भारत की संस्कृति को समझने का एक सुंदर तरीका यह है कि हम उसके पर्वों को केवल पूजा-पद्धति के रूप में न देखें, बल्कि यह समझने का प्रयास करें कि किसी विशेष ऋतु, काल और सामाजिक परिस्थिति में उस परंपरा की आवश्यकता क्यों अनुभव हुई होगी..??
सनातन परंपरा की विशेषता यही है कि उसने जीवन के अत्यंत सामान्य कार्यों को भी धर्म, संस्कार, लोकव्यवस्था और आध्यात्मिक चिंतन से जोड़ दिया..!!!
दीप को साफ करना केवल घर की सफाई नहीं अपितु वह प्रकाश की उपासना बन गया।
बच्चों की सुरक्षा की चिंता केवल माता-पिता की चिंता नहीं रही वह देवी-आराधना बन गई।
बुद्धि और विवेक का विकास केवल शिक्षा का विषय नहीं रहा वह बुध और बृहस्पति की आराधना से जुड़ गया।
और वर्षा ऋतु में अंधकार, सर्प-संकट, रोग और बालमृत्यु की आशंका केवल प्राकृतिक समस्या नहीं रही उसे देवकथाओं और व्रतों के माध्यम से समाज की सामूहिक चेतना का हिस्सा बना दिया गया।
यही है भारतीय लोकसंस्कृति का अद्भुत कौशल।
🪔 दीप अमावस्या :- अंधकार से प्रकाश की ओर
महाराष्ट्र की अमान्त परंपरा में आषाढ़ मास की अमावस्या को दीप अमावस्या अथवा दीपपूजन की अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। यह दक्षिण भारतीय श्रावण आरम्भ होने के ठीक पूर्व आती है। इस दिन घर के दीपों को साफ करके उनका पूजन किया जाता है तथा अनेक परिवारों में आटे के दीप बनाकर भी उनका नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
इस परंपरा का एक अत्यंत व्यावहारिक पक्ष भी है।
आज हमारे घरों में बिजली का प्रकाश है। स्विच दबाते ही पूरा घर प्रकाशित हो जाता है। किंतु विद्युत-पूर्व समाज में रात्रि का प्रकाश मुख्यतः तेल, घी, बाती और दीपक पर निर्भर था।
वर्षा ऋतु में बादल, वर्षा, नमी और कम प्राकृतिक प्रकाश के कारण घरेलू प्रकाश की आवश्यकता और बढ़ जाती थी। इसलिए वर्षा ऋतु में घर में उपलब्ध दीपों को निकालना, साफ करना, उनकी स्थिति देखना और उपयोग योग्य बनाना एक अत्यंत व्यावहारिक गृह-व्यवस्था थी।
आज जिसे हम धार्मिक अनुष्ठान के रूप में देखते हैं, उसके भीतर ऋतु-अनुकूल गृह-प्रबंधन का एक पक्ष दिखाई देता है।
यहाँ एक बात समझना आवश्यक है कि लोकपरंपरा ने पर्यावरणीय आवश्यकता को धार्मिक संस्कार का रूप देकर उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा।
यही भारतीय संस्कृति की अनुपम शक्ति है।
🔥 दीप केवल प्रकाश नहीं, प्रतीक भी है वेदों में अग्नि अत्यंत महत्वपूर्ण देवता हैं। ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ही अग्नि से आरम्भ होता है:-
“अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।
होतारं रत्नधातमम्॥
ऋग्वेद 1.1.1
अर्थात अग्नि वैदिक चिंतन में केवल भौतिक अग्नि नहीं है; वह यज्ञ, देवत्व, ऊर्जा, परिवर्तन और मनुष्य तथा देव के मध्य सेतु का भी प्रतीक है।
बाद में उपनिषद् इसी प्रकाश-तत्त्व को अत्यंत गहरे आध्यात्मिक अर्थ में ले जाते हैं—
” असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय॥”
बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28
यहाँ तमस् केवल भौतिक अंधकार नहीं है। वह अज्ञान, अविवेक और आत्मविस्मृति का भी प्रतीक है और ज्योति ज्ञान एवं सत्य की दिशा का प्रतीक है।
इसलिए दीप जलाना दो स्तरों पर अर्थवान हो जाता है।
बाहर का दीप → भौतिक अंधकार दूर करता है।
अंदर का दीप → अज्ञान और भय का अंधकार दूर करने का स्मरण कराता है।
यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में दीपक को केवल प्रकाश देने वाली वस्तु न मानकर मंगल, ज्ञान और चेतना का प्रतीक बनाया गया।
🌧️ वर्षा ऋतु और दीप का व्यावहारिक विज्ञान:-
प्राचीन भारत का अधिकांश जीवन प्रकृति के साथ प्रत्यक्ष संबंध में था। आज हमारे लिए वर्षा का अर्थ है, छाता, बिजली, पक्की सड़क और मोबाइल के मौसम पूर्वानुमान लेकिन
प्राचीन गृहस्थ के लिए वर्षा का अर्थ था।
घर में नमी, ईंधन को सुरक्षित रखना, अनाज को बचाना, पशुओं की देखभाल, कीट-पतंगों की वृद्धि, सर्प और अन्य जीवों का घरों के आसपास आना, रात्रि में सीमित दृश्यता, और वर्षा-जनित रोगों का बढ़ना।
अतः वर्षा ऋतु में दीपों की व्यवस्था करना केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि ऋतु-आधारित घरेलू सुरक्षा व्यवस्था का भी हिस्सा माना जाता था। इसलिए भारतीय परंपरा ने इसे आदेश की भाषा में नहीं, उत्सव की भाषा में कहा।
“दीपों को साफ करो”—लेकिन साथ में कहा—“उनकी पूजा करो।”
इससे उपयोगिता में श्रद्धा जुड़ गई और श्रद्धा के कारण उपयोगिता की परंपरा पीढ़ियों तक बनी रही।
जरा-जीवंतिका :
भारतीय संस्कृति का बाल-संरक्षण संस्कार
अब आते हैं उस अद्भुत परंपरा पर जिसे महाराष्ट्र और कर्नाटक में जिवती/जिवंतिका के रूप में पूजा जाता है।
प्रचलित जिवती-चित्र में सामान्यतः चार प्रमुख दृश्य दिखाई देते हैं—
1.भगवान नृसिंह,
2.कालियामर्दन करते हुए श्रीकृष्ण,
3.बच्चों के साथ जरा-जिवंतिका,
4.बुध और बृहस्पति।
महाराष्ट्र में यह चित्र विशेष रूप से श्रावण के शुक्रवारों में पूजित होता है और इसका केंद्रीय भाव संतान की रक्षा, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना है।
यहाँ भारतीय लोकबुद्धि को समझना बहुत आवश्यक है।
प्राचीन समाज में बालमृत्यु आज की तुलना में बहुत बड़ी सामाजिक चिंता थी। विशेषकर वर्षा ऋतु में संक्रमण, दूषित जल, कीट-पतंग, सर्पदंश और अन्य पर्यावरणीय संकट बच्चों के लिए अधिक गंभीर हो सकते थे।
इसलिए मातृत्व की सबसे स्वाभाविक चिंता
“मेरे बच्चे सुरक्षित रहें।” को धर्म का रूप दे दिया गया।
पहला चित्र : भगवान नृसिंह और बालक प्रह्लाद
जिवती के चित्र में सबसे ऊपर भगवान नृसिंह और बालक प्रह्लाद का दृश्य है। नृसिंह अवतार की कथा का केंद्रीय भाव है भक्त बालक प्रहलाद की रक्षा। इसलिए लोकमानस में नृसिंह केवल हिरण्यकशिपु-वध के देवता नहीं रह जाते वे असहाय बालक प्रहलाद के रक्षक बन जाते हैं। माता जब इस चित्र की पूजा करती है तो उसके मन में एक गहरी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया चलती है।
“जिस प्रकार प्रह्लाद की रक्षा हुई, उसी प्रकार मेरे बालक की भी रक्षा हो।”
यह केवल धार्मिक विश्वास नहीं है। यह माता के भीतर आश्वासन, सुरक्षा-बोध और मानसिक स्थिरता उत्पन्न करता है।
आधुनिक मनोविज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि मनुष्य की सुरक्षा-भावना उसके मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार को प्रभावित करती है। सनातन परंपरा ने इस सुरक्षा-भाव को कथा, प्रतीक और पूजा के माध्यम से सामाजिक संस्कार बना दिया।
दूसरा चित्र : कालियामर्दन करते श्रीकृष्ण
दूसरे दृश्य में श्रीकृष्ण कालिय नाग का मर्दन करते हुए दिखाई देते हैं। यह चित्र वर्षा ऋतु के संदर्भ में विशेष अर्थपूर्ण प्रतीत होता है। भारत के ग्रामीण जीवन में वर्षा के दिनों में सर्पों और अन्य जीवों के साथ मनुष्य का संपर्क बढ़ना असामान्य नहीं था। श्रीकृष्ण का कालियामर्दन इसलिए केवल पुराणकथा नहीं रह जाता। यह भय पर विजय का सांस्कृतिक प्रतीक भी बन जाता है। बालक खेलते हैं। बालक जोखिम नहीं समझते इसलिए बाल्यावस्था की सुरक्षा की चिंता हर माता-पिता के मन में स्वाभाविक है।
नृसिंह और कालियामर्दन कृष्ण को एक ही चित्र में रखने से दो अलग-अलग प्रकार के संकटों का सांस्कृतिक रूपक सामने आता है।
नृसिंह → दुष्ट शक्ति से रक्षा।
श्री कृष्ण → प्राकृतिक/पर्यावरणीय संकट पर विजय।
इस प्रकार धार्मिक चित्र एक प्रकार का स्मृति-संस्कार बन जाता है।
तीसरा चित्र:- जरा और जीवंतिका : मातृशक्ति का लोकस्वरूप
अब इस परंपरा का सबसे रोचक पक्ष आता है—जरा।
महाभारत में जरासंध की जन्मकथा में राजा बृहद्रथ, उनकी दो रानियाँ और ऋषि कौशिक/चण्डकौशिक से संबंधित कथा आती है। फल को दोनों रानियों में बाँटने के बाद दोनों से बालक का आधा-आधा शरीर उत्पन्न हुआ। इन दोनों खंडों को वन में छोड़ दिया गया और वहाँ जरा नामक राक्षसी ने उन्हें जोड़ दिया। दोनों भाग जुड़ने पर एक जीवित बालक उत्पन्न हुआ, जिसे उसके कारण जरासंध कहा गया।
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाषिक संकेत भी है।
जरासंध = जरा + संध।
अर्थात जरा द्वारा जोड़ा गया।
महाभारत की मूल कथा में जरा को आधुनिक जिवती-देवी के समान मातृदेवी के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। बाद की क्षेत्रीय लोकपरंपरा में जरा और जीवंतिका का स्वरूप बालरक्षा और मातृशक्ति से जुड़ता गया। यही भारतीय संस्कृति के विकास का सुंदर उदाहरण है।
महाकाव्य की कथा → लोकस्मृति → क्षेत्रीय देवी-परंपरा → पारिवारिक व्रत।
इसमें धर्म स्थिर नहीं रहता; वह लोकजीवन में उतरकर नए अर्थ ग्रहण करता है।
“जरा” की कथा का मनोवैज्ञानिक अर्थ
जरासंध की जन्मकथा को यदि प्रतीकात्मक दृष्टि से देखें तो इसमें एक अद्भुत संदेश है। जो जीवन अधूरा दिखाई देता है, उसे भी कोई शक्ति जोड़कर पूर्ण कर सकती है। टूटा हुआ शरीर जुड़ सकता है।बिखरा हुआ परिवार जुड़ सकता है। भयभीत मन आश्वस्त हो सकता है। और असहाय बालक संरक्षण पा सकता है।
यही कारण है कि जरा की लोककल्पना धीरे-धीरे जीवन की संरक्षिका मातृशक्ति से जुड़ जाती है।
“जिवती” नाम भी स्वयं जीवित रहने और जीवन की ध्वनि को सामने लाता है। मराठी शब्दकोशीय परंपरा में जिवती को बालक के जन्मोत्तर संरक्षण से जुड़ी देवी के रूप में दर्ज किया गया है।
चौथा चित्र : बुध और बृहस्पति
जिवती के चित्र का सबसे दार्शनिक भाग यही है। “एक ओर बालक की रक्षा। दूसरी ओर बालक की बुद्धि और विवेक की रक्षा।”
यहाँ बुध और बृहस्पति का स्थान अत्यंत अर्थपूर्ण है।
ज्योतिषीय भाषा में बुध और बृहस्पति नवग्रहों में ग्रह-देवता हैं, जबकि नक्षत्र अलग खगोलीय विभाजन है।परंपरागत जिवती चित्र में बुध को हाथी और अंकुश के साथ तथा बृहस्पति/गुरु को शेर और चाबुक के साथ दिखाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
यहाँ लोकव्याख्या एक गहरा मनोवैज्ञानिक संदेश देती है।
बुध — बुद्धि
बुध का संबंध परंपरागत ज्योतिष में बुद्धि, वाणी, तर्क, गणना और कौशल से जोड़ा जाता है। हाथी शक्ति और प्रबलता का प्रतीक है। लेकिन हाथी को नियंत्रित करने के लिए अंकुश चाहिए। अर्थात बुद्धि जितनी प्रबल हो, उतना ही आवश्यक है कि उसके ऊपर विवेक का अंकुश हो।
अत्यंत बुद्धिमान व्यक्ति यदि अपनी बुद्धि को अहंकार, छल या स्वार्थ के अधीन कर दे तो वही बुद्धि विनाशकारी बन सकती है।
बृहस्पति — ज्ञान और गुरु-तत्त्व
बृहस्पति अर्थात गुरु भारतीय चिंतन में केवल ग्रह नहीं, गुरुतत्त्व का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। ज्ञान केवल सूचना नहीं है। शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का साधन नहीं है। सच्ची शिक्षा व्यक्ति में विवेक, संयम, नैतिकता, आध्यात्मिक दृष्टि और कर्तव्यबोध उत्पन्न करे।यह भारतीय शिक्षा-दर्शन की मूल अपेक्षा रही है इसलिए जिवती के चित्र में बालक की रक्षा के साथ बुध और बृहस्पति की उपस्थिति का एक सुंदर सांस्कृतिक प्रस्तुत किया गया है।
माता केवल यह प्रार्थना नहीं करती कि मेरा बच्चा जीवित रहे; वह यह भी चाहती है कि वह बुद्धिमान, विवेकी और संस्कारी बने। यही इस चित्र की सबसे बड़ी विशेषता है। इन परंपराओं में पर्यावरण, व्यवहार, मनोविज्ञान और सामाजिक स्वास्थ्य से जुड़े कई व्यावहारिक तत्व सांस्कृतिक रूप में संरक्षित रहे।
उदाहरण के लिए।
1. दीपों की सफाई
→ घरेलू वस्तुओं का निरीक्षण और रखरखाव।
2. वर्षा ऋतु में प्रकाश की व्यवस्था
→ रात्रिकालीन सुरक्षा।
3. बाल-सुरक्षा की सामूहिक प्रार्थना
→ माता-पिता के भीतर सुरक्षा-बोध।
4. बच्चों को देवकथाओं से जोड़ना
→ नैतिक और साहसिक आदर्शों का निर्माण।
5. बुध-बृहस्पति की पूजा
→ बुद्धि और विवेक को सामाजिक आदर्श बनाना।
6. व्रत और सामूहिक पूजा
→ परिवार तथा समुदाय को एक साथ जोड़ना।
इस प्रकार धार्मिक कर्मकांड के भीतर व्यवहार-संशोधन और सामाजिक शिक्षा का तत्व भी काम करता है।
मनोविज्ञान की दृष्टि से : अनुष्ठान क्यों प्रभावी होते हैं?
मानव मन अमूर्त विचारों को लंबे समय तक केवल सिद्धांत के रूप में नहीं संभालता।
उसे प्रतीक चाहिए।
उसे कथा चाहिए।
उसे पुनरावृत्ति चाहिए।
उसे सामूहिक अनुभव चाहिए।
इसीलिए भारतीय परंपरा ने कहा
“ज्ञान केवल पढ़ो मत दीप जलाओ।”
“सुरक्षा केवल समझो मत,नृसिंह की कथा स्मरण करो।
” भय केवल दबाओ मत,कालियामर्दन कृष्ण को स्मरण करो।”
“बुद्धि का उपयोग केवल करो मत,बुध का स्मरण करो।”
” ज्ञान के साथ विवेक भी चाहिए,गुरु बृहस्पति का स्मरण करो।”
इस प्रकार प्रतीक बार-बार मन में प्रवेश करता है और धीरे-धीरे संस्कार बन जाता है।यही संस्कार-निर्माण भारतीय धर्मव्यवस्था की सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक उपलब्धियों में से एक है।
सामाजिक दृष्टि से यह केवल पूजा नहीं थी इन पर्वों का एक सामाजिक पक्ष भी है।
प्राचीन भारतीय परिवार केवल पति-पत्नी और बच्चों की इकाई नहीं था। वह एक विस्तृत सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा था।
व्रतों और त्योहारों के माध्यम से, महिलाएँ एक-दूसरे से जुड़ती थीं, परिवार एकत्र होता था, बच्चों को कथाएँ सुनाई जाती थीं, बुजुर्ग अपना अनुभव अगली पीढ़ी को देते थे, स्थानीय देवताओं और लोककथाओं की स्मृति बनी रहती थी, और सामूहिक रूप से स्वास्थ्य, संतान और परिवार के मंगल की कामना की जाती थी।
इस दृष्टि से व्रत केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं था; वह सामाजिक संचार का माध्यम भी था। आज हमारे पास इंटरनेट है। तब समाज के पास था कथा, उत्सव, मंदिर, व्रत, लोकगीत और संस्कार और इन्हीं के माध्यम से ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता था।
अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त