
डॉ सौरभ मारू
बीज ही जीवन का “बीज” (मूल) है। जीवन का “आदि” और इस जीवन चक्र का “अंत” भी बीज ही है, जिसे इस चक्र को पुनः प्रारंभ करने का सामर्थ्य भी है। इसी से जीवन का सातत्य है और चराचर की प्रायिकता का केंद्र “बीज” ही है।
इसलिए भारत की संस्कृति के “बीज सूक्त” “वेद-उपनिषद” सृष्टि की सनातन प्रकृति को पोषित करने के लिए सर्व मानव वृष्टि को बीज की बहुलता के लिए कृत संकल्पित करते हैं, “व्रत” करवाकर अन्न को आवश्यकता से भी अधिक पैदा करने के “व्रती” बनाते हैं।
अन्नं बहु कुर्वीत।
तद् व्रतम्।
-तैत्तिरीय उपनिषद्
वेदों-उपनिषदों के ये “व्रती” आज के समय में “किसान” कहे जाते हैं, जो आज भी स्थूल से जीवन की रचना ही नहीं वरन सृष्टि के मूल की रक्षा और वृद्धि भी कर रहे हैं। पर तात्कालिक समय में ये “रचनात्मकता के सर्वोच्च शिखर”, सम्मान के पायदान पर कहीं नहीं हैं। परिभाषाएं बदल गई है।
रचनात्मकता की पराकाष्ठा “शिक्षक” भी regulatory bodies की बेड़ियों में strict parameters पर खरा उतरने में अपनी पूरी रचनात्मकता के साथ दम तोड़ रहा है। कक्षाओं के हर पल की guidelines तय है। Guidelines की दो धारी तलवार पर नट की तरह विद्यार्थियों को खुश रखकर, अच्छे feedback के पन्नों (विद्यार्थियों द्वारा दिए certificates) पर नौकरी करने वाले, पदोन्नति लेने वाले शिक्षकों का IQ अवश्य बड़ा हो सकता है, पर क्या “रचनात्मकता” की “प्रकृति”, रचनात्मकता को इस कसी हुई “कृत्रिम वातावरण” वाली चार दीवारी में पल्लवित होने दे सकती है? कक्षाओं में CC TV के surveillance में, AC की शीतल बहती हवा और regulatory bodies की guidelines से बंधी संकरी पगडंडी से, रचनात्मकता और ज्ञान की कितनी निर्बाध गंगा बहती होगी यह समझ पाना बहुत कठिन है।
Regulatory bodies द्वारा दिया यह तरीका, इच्छा-अनिच्छा, या जीवनयापन के लिए बनें तथाकथित शिक्षकों को चलाने के लिए बहुत बढ़िया तरीका हो सकता है, पर इसमें कोई चाणक्य, रामकृष्ण परमहंस, या सी वी रमन चल सकेंगे? तो चंद्रगुप्त, विवेकानंद, होमी भाभा या विक्रम साराभाई कहां से आएंगे? यह संभावनाएं स्वत: ही समाप्त हो जाती है।
भर-भरकर पेस्टीसाइड और खाद डालकर तो खेती हो जाएगी, लाखों रुपए लगाकर controlled conditions या मियावाकी पद्धति द्वारा कृत्रिम competition से हुई पैदावार भी मिल जाएगी पर क्या “प्राकृतिक खेती” करने वाला किसान जी भी पाएगा?
क्या पेस्टीसाइड मुक्त खेती हो सकेगी? (research के लिए प्रयोगशाला के जानवरों में Parkinson’s बीमारी पैदा करने के लिए 10-15 दिन बहुत थोड़ी मात्रा में pesticides खिलाया जाता है, Aluminium देने से Alzheimer’s बीमारी हो जाती है। हम में से कितने लोग Aluminium के बर्तन उपयोग करते हैं? गांव में तो सर्वत्र Aluminium ही है)।
मैं किसान और शिक्षक को बहुत कुछ एक जैसा पाता हूं। खून-पसीने की मेहनत ही एक तरीका है फसल को अच्छा करने का, पर खराब होने के हजारों कारण हैं।
कृष्ण बिहारी नूर ने अद्भुत पंक्तियां लिखी है:
“सच घटे या बढ़े तो सच न रहे, झूठ की कोई इंतहा ही नहीं”।
इसलिए किसान और शिक्षक स्वत: ही आध्यात्मिक होते हैं। कर्म पर विश्वास करते हुए हर परिस्थितियों में ये पूरी जीजीविषा के साथ वर्षा के अभाव में एक बार रोपित बीज के खराब हो जाने के बाद भी, पुनः और पुनः बीजारोपण करते रहते हैं।
क्या यह “व्रत” नहीं? और अन्य “व्रतों” की तरह क्या यह “व्रत” भी पुण्यार्जक होता है?
किसान का सदियों से सतत चल रहा यह “व्रत” ही हमारी “संस्कृति के सनातन” होने का प्रमाण है।
आज भारत की परंपराएं नाम के लिए ही “सनातन” बची है। बहुत द्रुत गति से इसका ह्रास होता हमें समझ नहीं नहीं आ रहा, पर मैरे जैसे कई लोग होंगे जिन्होंने इसे मर्म तक महसूस किया होगा और इसलिए हमारे जीवन के मायने बदल चुकें हैं…
बहरहाल, गिरते-पड़ते-दौडते-संभलते, सुख-दुख, अपनों के भी अवरोध-प्रतिरोध, साथ ही साथी-मित्रों के अनंत-प्रेम, बिना शर्त सहयोग-समर्थन की ठंडी छांव, सब कुछ होते हुए भी कार्य सतत जारी है…
बीजों के आदान-प्रदान की परंपरा का “उत्सव” “सनातन” रहे, इसके लिए हम कृत संकल्पित है….