पिठोरी अमावस्या एवं बैल पोळा: मातृत्व, कृषि, पशु और प्रकृति के सह-अस्तित्व का सनातन दर्शन।

बांगरू-बाण

श्रीपाद अवधूत की कलम से

भारत के पर्व केवल पंचांग पर अंकित तिथियाँ नहीं हैं। वे भारतीय समाज की सामूहिक स्मृति, मनोविज्ञान, अर्थव्यवस्था, कृषि-विज्ञान, पारिवारिक व्यवस्था और प्रकृति-दर्शन को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत रखने वाली सांस्कृतिक संस्थाएँ हैं। भाद्रपद अमावस्या को इसी समग्र दृष्टि से देखना चाहिए।

एक ओर घर के भीतर माता अपने बच्चों के दीर्घायुष्य और परिवार के मंगल की कामना करती है, दूसरी ओर घर की देहरी पर किसान उस मूक पशु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है जिसने खेत, अन्न और आजीविका के लिए अपना पसीना बहाया है। अर्थात् एक ही सांस्कृतिक धरातल पर दो उदात्त भाव एक साथ स्पंदित होते हैं—“संतान की रक्षा” और “अन्न के सहचर की रक्षा।” भारतीय चिंतन में जीवन को कभी एकांगी नहीं देखा गया; यहाँ मनुष्य, परिवार, पशु, वनस्पति, जल, भूमि और अन्न—सब परस्पर गुंथी हुई एक चैतन्य जीवन-व्यवस्था के अंग हैं।

“पिठोरी अमावस्या: मातृत्व की सामूहिक प्रार्थना”

पिठोरी अमावस्या की परंपरा मुख्यतः माताओं द्वारा संतान के स्वास्थ्य, आरोग्य, परिवार की समृद्धि और कुल की निरंतरता से जुड़ी है। इस दिन चावल के आटे (पिठ्ठी) से देवी-प्रतिमाएँ बनाकर चौंसठ योगिनियों तथा मातृशक्तियों का पूजन किया जाता है। पौराणिक आख्यानों में देवी पार्वती द्वारा इंद्राणी को इस व्रत का उपदेश देने का प्रसंग मिलता है। यद्यपि चौंसठ योगिनी की उपासना परंपरा मुख्यतः शाक्त और तांत्रिक आगमों से विकसित हुई है, किंतु इसके मूल में विद्यमान तत्व मातृशक्ति, प्रजनन, संतान-सुरक्षा और पोषण वैदिक काल से ही भारतीय चेतना का केंद्र रहे हैं। पिठोरी का महत्त्व केवल एक उपवास तक सीमित नहीं है। यह भारतीय नारी के उस उदात्त मनोविज्ञान का प्रकटीकरण है, जहाँ संतान केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि आने वाले समाज की धरोहर है और उसका रक्षण एक सामूहिक उत्तरदायित्व है।

“बैल पोळा: कृतज्ञता का पावन अनुष्ठान”

महाराष्ट्र, मध्य भारत, छत्तीसगढ़ और दक्खन के कृषि-प्रधान अंचलों में इसी दिन ‘बैल पोळा’ (या ‘बेन्दूर’) मनाया जाता है। किसान अपने बैलों को आत्मीयता से नहलाता है, उनके सींगों को रंगता है, नई रस्सियाँ, मोरपंख और घंटियाँ पहनाता है, उनकी आरती उतारता है और उन्हें मिष्ठान्न अर्पित करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस दिन बैलों को हर प्रकार के कृषि-श्रम से पूर्ण विश्राम दिया जाता है। जिस पशु से वर्ष भर हल चलवाया, बोझ उठवाया, उसके प्रति वर्ष में कम-से-कम एक दिन यह भाव रखना कि “आज तुम्हारा दिन है, आज तुम केवल हमारे प्रेम और सेवा के अधिकारी हो”। संसार की किसी अन्य संस्कृति में दुर्लभ है। यह केवल एक लोकपर्व नहीं, कृतज्ञता का संस्कार (Psychology of Gratitude) है।

“वैदिक वांग्मय में कृषि और गोवंश”

यद्यपि ‘बैल पोळा’ जैसा लौकिक नाम वेदों में नहीं मिलता, किंतु भूमि, हल, वृषभ और पर्जन्य (मेघ) का यह अन्योन्याश्रित संबंध वैदिक ऋचाओं में अत्यंत विशद रूप से वर्णित है।

ऋग्वेद के क्षेत्रपति सूक्त (4.57.4) में प्रार्थना है!”

” शुनं वाहाः शुनं नरः शुनं कृषतु लाङ्गलम्। शुनं वरत्रा बध्यन्तां शुनमष्ट्रामुदिङ्गय॥”

 ( भावार्थ :- “हमारे वाहक पशु सुखपूर्वक रहें, कृषक सुख और शांति से कर्म करें, हल मंगलपूर्वक भूमि को जोते, जोतने की रस्सियाँ सुखद बँधी रहें और चाबुक सुखपूर्वक उठाई जाए।”)

इसी सूक्त में आगे (ऋग्वेद 4.57.8) प्रार्थना की गई है।

” शुनं नः फाला वि कृषन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अभि यन्तु वाहैः। शुनं पर्जन्यो मधुना पयोभिः शुनासीरा शुनमस्मासु धत्तम्॥”

(भावार्थ :- ” हल के फाल भूमि को मंगलपूर्वक जोतें, किसान बैलों के साथ आनंदपूर्वक आगे बढ़ें, पर्जन्य देव अमृतमय जल की वर्षा करें, और शुन व सीर (वायु और सूर्य) हमें सुख-समृद्धि प्रदान करें।)”

अथर्ववेद (6.59.2) में गोधन के आरोग्य की कामना करते हुए ऋषि कहते हैं!

 “करत् पयस्वन्तं गोष्ठमयक्ष्मां उत पूरुषान्॥”

 (भावार्थ :- “हमारा गोष्ठ दूध से संपन्न हो और हमारे पशु तथा मनुष्य सभी रोगमुक्त रहें।”) पशु वैदिक काल में केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि परिवार के आरोग्य और कल्याण के आधार थे।

” उपनिषद्:-अन्न और श्रम का अद्वैत”

तैत्तिरीय उपनिषद् (भृगुवल्ली) में अन्न को साक्षात् ब्रह्म का रूप माना गया है:

 “अन्नाद् भूतानि जायन्ते। जातान्यन्नेन वर्धन्ते। अद्यतेऽत्ति च भूतानि। तस्मादन्नं तदुच्यत इति॥”

 ( भावार्थ:- ” अन्न से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्न से ही पोषित होते हैं, अन्न में ही लीन होते हैं।”) और इसी आधार पर उपनिषद् एक कठोर अनुशासन देता है—‘अन्नं न निन्द्यात्। तद् व्रतम्’ (अन्न की कभी निंदा न करो, यह जीवन-व्रत बनाओ)। जब अन्न ब्रह्म है, तो उस अन्न को उपजाने वाला हल और उसे खींचने वाला वृषभ उस यज्ञ का प्रधान पुरोहित बन जाता है। बैल पोळा का वास्तविक अर्थ अन्न-चक्र के इस मौन साधक के प्रति शीश झुकाना है।

“वृषभ: श्रम से धर्म तक की यात्रा”

भारतीय दर्शन में बैल केवल पेशी-बल (muscular power) का प्रतीक नहीं है:।

 पुराणों में: वृषभ साक्षात् धर्म का चतुष्पाद स्वरूप है—‘वृषो हि भगवान् धर्मः’।

 शैव परंपरा में: नंदी के रूप में वह शिव का प्रथम गण, अखंड तप, सेवा और निष्काम निष्ठा का विग्रह है।

 श्रमण परंपरा (जैन दर्शन) में: प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का लांछन ही ‘वृषभ’ है, जिन्होंने समाज को ‘असि, मसि और कृषि’ की शिक्षा देकर आजीविका और अहिंसक श्रम का मार्ग प्रशस्त किया।

अत: जब किसान बैल के मस्तक पर रोली-अक्षत लगाता है, तो वह किसी पशु की नहीं, बल्कि साक्षात् धर्म, श्रम और धैर्य की अर्चना करता है।

” आज के संदर्भ में इसका संदेश: मशीन या संतुलन?”

आज ट्रैक्टर और आधुनिक मशीनों की अपनी उपादेयता है, उनकी गति और सुविधा को नकारा नहीं जा सकता। किंतु प्रश्न “ट्रैक्टर बनाम बैल” का नहीं है? प्रश्न यह है कि “क्या हमारी कृषि व्यवस्था प्रकृति के साथ समरस है?” अत्यधिक मशीनीकरण और रासायनिक उर्वरकों ने मिट्टी की आंतरिक जीवन-ऊर्जा (microbiome) और हवा-पानी को संकट में डाल दिया है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए गोवंश-आधारित मिश्रित कृषि आज भी सर्वाधिक टिकाऊ (sustainable), विषमुक्त और शून्य-लागत मॉडल है। गोबर और गोमूत्र धरती की उर्वरा शक्ति लौटाते हैं। पशु और खेत का यह जैविक चक्र पर्यावरण के लिए संजीवनी है।

“संस्कार जो जीवित रहने चाहिए”

” परंपराएँ केवल जड़ अनुष्ठान नहीं हैं; वे हमें हमारे अस्तित्व की जड़ों से बाँधे रखने वाले सेतु हैं। बैल पोळा हमें सिखाता है कि जिस रोटी से हमारा तन पलता है, उसके पीछे।

 धरती का असीम धैर्य है।

 बादलों का स्नेहमय वरदान है।

 किसान का अहर्निश पसीना है।

 और मूक गोवंश का अकथनीय परिश्रम है।

जिस दिन हम और हमारी आने वाली पीढ़ी इस मूक श्रम की कीमत समझ लेंगे, उस दिन समाज में अन्न का एक कण भी व्यर्थ नहीं जाएगा और न ही किसी वृद्ध पशु को बेसहारा छोड़ा जाएगा।

“आइए, इस पावन अवसर पर हम अपनी संतानों को केवल यह न बताएं कि “आज पोळा है”, बल्कि उनके कोमल मन में यह संस्कार भी रोपें कि प्रकृति पर अंधाधुंध विजय पाना विकास नहीं, बल्कि प्रकृति और उसके जीवों के साथ कृतज्ञतापूर्वक सह-अस्तित्व में जीना ही सच्चा सनातन धर्म है। संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, वह भविष्य की पीढ़ियों को सौंपा जाने वाला जीवन-मूल्य है।”

“धर्मो रक्षति रक्षितः।”

॥ अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त ॥


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