
मंडप की तड़क-भड़क से मुर्दाघर तक के आंसु यह दर्शाते हैं कि कैसे मंडप की भव्यता के बीच हमारे पारंपरिक पारिवारिक मूल्य तार-तार हो रहे हैं।
आज शादियों का बजट बढ़ रहा है और रिश्तों की उम्र घट रही है। ‘भव्य मंडप – रिश्ते तार-तार’ केवल एक शीर्षक नहीं, बल्कि हमारे आधुनिक समाज का एक कड़वा आईना है। आज का समाज विवाह के आयोजन पर तो पूरा ध्यान दे रहा हैं, लेकिन विवाह की पवित्रता को भूलता जा रहा है। जब तक मंडप की भव्यता से ज्यादा महत्व आपसी मूल्यों, धैर्य और समझदारी को नहीं दिया जाएगा, तब तक शादियां इसी तरह कानूनी विवादों, क्लेश और कोर्ट के चक्करों में बिखरती रहेंगी।क्या सात फेरों के सात वचन अब केवल कैमरों के सामने दोहराने वाली रस्म बनकर रह गए हैं? आज का समाज शादी के प्रदर्शन पर जितना खर्च करता है, उसका एक प्रतिशत भी रिश्तों को निभाने के लिए जरूरी ‘मानव मूल्यों’ पर खर्च नहीं करता। नतीजा हमारे सामने है- विवाह विच्छेद, घरेलू हिंसा और मानसिक तनाव।
पिछले महीने नोएडा में एक 29 वर्षीय महिला की कथित तौर पर उसके पति ने गला घोंटकर हत्या कर दी। यह घटना उनके डेस्टिनेशन विवाह के वीडियो वायरल होने के कुछ दिनों बाद हुई। पिछले वर्ष इंदौर के एक व्यवसायी की मेघालय में हनीमून के दौरान कथित तौर पर पत्नी ने सुपारी देकर हत्या करवा दी ।
इन दो सुर्खियों के बीच हमारे समय का अनकहा सच छिपा है: भव्य विवाह, जर्जर रिश्ते।
हम एक ऐसे समाज का अंग बनते जा रहे हैं जो दिखावे में सिद्धहस्त है और आचरण में दरिद्र। हम तमाशे पर निवेश करते हैं और आत्मा को भूखा रखते हैं।
वैवाहिक अनुबंध: वाचा से हादसे तक:
पति द्वारा पत्नी की हत्या अब पुलिस की डायरी की कोई अपवाद घटना नहीं रही। यह एक लक्षण है।
आज का विवाह एक नैतिक वाचा कम और एक नाट्य-प्रस्तुति अधिक बन गया है। हम 500 मेहमानों और 5 फोटोग्राफरों के साथ तीन दिन का विवाह रचते हैं, पर दस मिनट की बिना मोबाइल वाली बातचीत के लिए समय नहीं निकाल पाते। संगति, रेड फ्लैग और एग्जिट ऑप्शन जैसे शब्दों ने सहनशीलता, त्याग और क्षमा की जगह ले ली है। मतभेद होते ही प्रतिक्रिया सुलह नहीं, प्रतिशोध बन गई है – कानूनी, भावनात्मक और चरम स्थिति में घातक। एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती हैं कि महिलाओं के विरुद्ध अपराधों का एक बड़ा हिस्सा घर की चारदीवारी के भीतर होता है। और उसे अंजाम देने वाले वही होते हैं जिन्होंने रक्षा का वचन दिया था।
हम गृहस्थ धर्म के खोखलेपन को देख रहे हैं। मंडप सोने से मढ़ा है, पर जिस विश्वास पर उसे टिकना चाहिए था, वह गिरवी रखा जा चुका है।
बिहार से आई भ्रातृ-हत्या की खबर भी उतनी ही शिक्षा देती है। डॉ हेडगेवार जिस संयुक्त परिवार को भारतीय समाज की रीढ़ कहते थे, वह अब मुकदमेबाजी वाले व्यक्तिवाद में घुल रहा है।
सामीप्य से ऊपर संपत्ति हो गई है। जमीन, विरासत और पद ने स्नेह और सम्मान की जगह ले ली है। जो भाई कभी एक थाली में खाते थे, वे अब अदालत में आमने-सामने होते हैं।
इन कारणों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि मध्यस्थता का अभाव है। गांव की पंचायत, घर के बुजुर्ग, विवाद सुलझाने के अनौपचारिक जैसे तंत्र सनातनी की जगह व्हाट्सएप फॉरवर्ड और एफआईआर ने ले ली है। हम तनाव कम करने की कला भूल गए हैं।
जब रक्त के सबसे निकट के रिश्ते ही टूट जाएं, तो नागरिक भ्रातृत्व की क्या आशा करें? वृद्धाश्रम और अनाथालय नए आश्रय बनते जा रहे हैं।
घर का यह विघटन निजी नहीं रहता। यह फैलता है।
जिन माता-पिता ने अपनी जमा-पूंजी बच्चों की शिक्षा और भव्य विवाहों में लगा दी, वे आज वृद्धाश्रमों में हैं। देखभाल का पुराना लेन-देन टूट गया है। हम उनकी सेवानिवृत्ति पर पार्टी तो करते हैं, पर अपनी उपस्थिति नहीं देते। टूटते विवाह, आर्थिक तंगी और विस्तारित परिवारों के ढहने से अनाथालयों की संख्या बढ़ी है। बच्चे वयस्कों के अहंकार की लड़ाई में हताहत बन रहे हैं।
ये संस्थाएं आवश्यक हैं। पर जब वे अंतिम विकल्प नहीं, पहला विकल्प बन जाएं, तो यह एक सभ्यतागत विफलता है।
विखंडन की पुनरावृत्ति पर अंग्रेजी लेखक
टी.एस. इलियट ने लिखा था, “घर शांत है और दुनिया जंगली है।” पर जब घर ही जंगली हो जाए, तो दुनिया कैसी होगी।
लेन-देन पर टिके घरों से लेन-देन वाले नागरिक बनेंगे। डाइनिंग टेबल पर जो संवेदना नहीं सीखी, वह सार्वजनिक जीवन में नहीं आएगी। पति-पत्नी, भाई-भाई, माता-पिता और संतान के बीच का अविश्वास अंततः समुदाय-समुदाय और नागरिक-राज्य के बीच के विश्वास को भी खा जाएगा।
हमें उत्सव का त्याग नहीं करना है। पर उसे इरादे से जोड़ना होगा।
फ़ालतू और स्वार्थी मेहमानों की सूची घटाएं। सुनने के घंटे बढ़ाएं। वैवाहिक जीवन को एक आदर्श और सुखी जीवन भांति जीना है जिसमें आपसी प्रेम, अटूट विश्वास, सम्मान और एक-दूसरे को समझने की भावना पर टिका होना चाहिए। सिर्फ शारीरिक भूख मिटाने वाले भाव नहीं आने चाहिए।
विवाद , हिंसा या परित्याग तक पहुंचे, उससे पहले सामुदायिक और पारिवारिक समाधान के तंत्र फिर से खड़े करें। नीति और समाज दोनों को अंतर-पीढ़ी में सामंजस्य स्थापित करने को प्रोत्साहित करना होगा।
सार यह है कि त्रासदी यह नहीं कि हमारे विवाह भव्य हैं। त्रासदी यह है कि हमने भव्यता को गंभीरता समझ लिया। जब तक हम घर की दरारें नहीं भरेंगे, तब तक हम पति द्वारा पत्नी की हत्या और भाई द्वारा भाई की हत्या की खबरें पढ़ते रहेंगे। तब तक हमारे वृद्धाश्रम और अनाथालय बढ़ते रहेंगे – उन रिश्तों के मूक स्मारक जिन्हें हमने बचाने का चुनाव नहीं किया।
याद रखिए: किसी राष्ट्र का निर्माण मंडपों की चमक से नहीं, घर के सौहार्दपूर्ण वातावरण से होता है।
आइए रिश्तों को बचाएं।घर- आंगन स्थाई आनंद की बेल फैलाएं।
श्री बाला राम परमार