डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी बलिदान दिवस 

( 23 जून 1953)

जीवन वृत्त

  • 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता में डॉ॰ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का जन्म हुआ। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी थे एवं शिक्षाविद् के रूप में विख्यात थे। 
  • उनकी माता का नाम जोगमाया देबी था। उमा प्रसाद मुखोपाध्याय उनके छोटे भाई थे।
  • डॉ॰ मुखर्जी ने 1917 में मैट्रिक किया और 1921 में बी०ए० की उपाधि प्राप्त की। 
  • इसके बाद उन्होंने बंगाली विषय में एम.ए. भी प्रथम स्थान के साथ उत्तीर्ण किया
  • 1923 में लॉ की उपाधि अर्जित करने के पश्चात् वे विदेश चले गये और 1926 में इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे। 
  • सन 1924 में पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट में वकालत के लिए पंजीकरण कराया। 
  • अपने पिता का अनुसरण करते हुए उन्होंने भी अल्पायु में ही विद्याध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएँ अर्जित कर ली थीं। 
  • 33 वर्ष की अल्पायु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। 
  • इस पद पर नियुक्ति पाने वाले वे सबसे कम आयु के कुलपति थे। 
  • डॉ. मुखर्जी इस पद पर सन 1938 तक बने रहे। 
  • सन 1937 में उन्होंने गुरु रविंद्रनाथ टैगोर को कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बांग्ला भाषा में भाषण के लिए आमंत्रित किया। 
  • भारत के किसी भी विश्वविद्यालय के इतिहास में यह पहला अवसर था जब किसी ने दीक्षांत समारोह का भाषण भारतीय भाषा में दिया हो।

शिक्षाविद के रूप में 

शिक्षाविद के रूप में

1934- कुलपति, कलकत्ता विश्वविद्यालय, लगातार दो कार्यकालों के लिए- 1934-38। अध्यक्ष, कला और विज्ञान में स्नातकोत्तर परिषदों के लिए लगातार वर्षों के लिए। कला संकाय के डीन, सदस्य और फिर अध्यक्ष, अंतर-विश्वविद्यालय बोर्ड। कुलपति के रूप में अपनी सेवा के चार वर्षों के दौरान, श्यामा प्रसाद ने समय, ऊर्जा, स्वास्थ्य, सुविधा या जीवन के किसी सुख को वरीयता नहीं दी और यह उन्होंने अपने डॉक्टर्स की सलाह के खिलाफ किया। उन्होंने कुछ नए विभागों और पाठ्यक्रमों की शुरुआत की और मौजूदा विभागों को विकसित और बेहतर बनाया। कुलपति के रूप में उनकी गतिविधियों को इसके तहत संक्षेप में प्रस्तुत किया जा सकता है: 

(I) उस समय की सरकार से किसी प्रोत्साहन के बिना उन्होंने कृषि शिक्षा के लिए एक योजना लागू की और कृषि में डिप्लोमा पाठ्यक्रम शुरू किया। वह महिलाओं की शिक्षा में गहरी रुचि रखते थे और उन्होंने स्वर्गीय विहारीलाल मित्रा की अक्षय निधि के सहयोग से इस उल्लेखनीय योजना को लागू किया।

(II) शिक्षक प्रशिक्षण विभाग का संगठन और हमारे स्कूलों के लिए प्रशिक्षित शिक्षक प्रदान करने के लिए एक अवकाश पाठ्यक्रम सहित अल्पकालिक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों की शुरूआत; चीनी और तिब्बती अध्ययन की स्थापना; भारतीय कला और ललित कला गैलरी के आसुतोष संग्रहालय की नींव; विश्वविद्यालय द्वारा किए गए पुरातात्विक उत्खनन का कार्य; नियुक्ति और सूचना बोर्ड की स्थापना: आधुनिक पद्धति  पर अनुसंधान और पढ़ने के कमरे की सुविधाओं के साथ नए केंद्रीय पुस्तकालय हॉल का निर्माण। बीए पाठ्यक्रम में हिंदी का परिचय और दूसरी भाषाओं के रूप में बंगाली, हिंदी और उर्दू में ऑनर्स पाठ्यक्रमों की शुरुआत की – ये उनकी कुछ उपलब्धियां थीं।

(III) उनके कहने पर, वैज्ञानिक शब्दों की एक बंगाली भाषा शब्दावली तैयार की गई और प्रकाशित की गई और सार्वजनिक सेवा परीक्षा के लिए छात्रों को प्रशिक्षित करने के लिए एक विशेष योजना शुरू की गई।

(IV) ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में बांग्ला प्रकाशनों की एक विशेष श्रृंखला शुरू की गई थी। श्रृंखला का उद्देश्य छात्रों और सामान्य पाठकों के लाभ के लिए था। उनकी पहल पर बंगाली वर्तनी को मानकीकृत किया गया था।

(v) उनके कुलपति पद के दौरान पहली बार कॉलेज कोड तैयार किया गया था और नए मैट्रिकुलेशन विनियम बनाए गए थे और छात्रों की आयु सीमा को समाप्त कर दिया गया था।

(VI) कंपार्टमेंटल परीक्षाओं की प्रणालियां और असफल छात्रों को कॉलेजों में स्वयं को दाखिला दिए बिना परीक्षाओं में शामिल होने के लिए रियायतें, उनके कार्यालय के कार्यकाल के दौरान शुरू की गई थीं।

(VII) छात्रों को सैन्य प्रशिक्षण देने के प्रश्न ने उनका गंभीर ध्यान आकर्षित किया और हतोत्साहित करने वाले कारकों के बावजूद, वह हमारी अध्ययन योजना में सैन्य प्रशिक्षण पाठ्यक्रम शुरू करने में सफल रहे। जब वह कुलपति थे, उन दिनों में यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं थी।

(VIII) युवा पीढ़ी और बड़े पैमाने पर देश का कल्याण वह आदर्श था जिसे उन्होंने अपने सामने रखा था और एकल-दिमागी भक्ति के साथ उन्होंने इसे प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत की थी। इसके लिए उन्होंने हमारे विद्यार्थियों के शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए छात्र कल्याण विभाग को बेहतर बनाने और विस्तारित करने के लिए कदम उठाया और तथाकथित पिछड़े वर्ग से आने वाले छात्रों के लिए आरक्षित छात्रावासों को समाप्त कर दिया, जो कॉलेजों से जुड़े सामान्य छात्रावासों और मेसों में उनके लिए आवास प्रदान करते हैं। मुख्य रूप से उनके बीच भाईचारे की भावना पैदा करने का इरादा था। उन्होंने कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए शुल्क में कमी का भी प्रावधान किया 

(IX) उनके कुलपति काल में ही विश्वविद्यालय स्थापना दिवस (यानी 24 जनवरी) प्रतिवर्ष मनाया जाता था। समारोह में विभिन्न कॉलेजों के छात्रों ने बैनर और बैज के साथ भाग लिया और कॉलेजों और स्कूलों के शिक्षकों ने भी इसमें भाग लिया। यह शिक्षकों और छात्रों को करीबी व्यक्तिगत संबंधों में लाने का एक प्रयास था।

(X) उनके समय के दौरान, कतिपय औद्योगिक वस्तुओं के बड़े पैमाने पर उत्पादन में प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए एप्लाइड केमिस्ट्री विभाग में एक योजना शुरू की गई थी।

(XI) रवीन्द्रनाथ टैगोर को पहली बार 1937 में बांग्ला में दीक्षांत भाषण देने के लिए आमंत्रित किया।

राजनीतिक जीवन की शुरुआत

  • डॉ. मुखर्जी के राजनैतिक जीवन की शुरुआत सन 1929 में हुई जब उन्होंने कांग्रेस पार्टी के टिकट पर बंगाल विधान परिषद् में प्रवेश किया 
  • परन्तु जब कांग्रेस ने विधान परिषद् के बहिष्कार का निर्णय लिया तब उन्होंने इस्तीफा दे दिया। 
  • इसके पश्चात उन्होंने स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और विधानपरिषद के लिए चुने गए। 
  • सन 1937 से 1941 के बीच जब कृषक प्रजा पार्टी और मुस्लिम लीग की साझा सरकार थी तब वो विपक्ष के नेता थे और जब फजलुल हक के नेतृत्व में एक प्रगतिशील सरकार बनी तब सन 1941-42 में वह बंगाल राज्य के वित्त मंत्री रहे। 
  • हालाँकि वित्त मंत्री के पद से 1 साल बाद ही इस्तीफा दे दिया। 
  • इसी समय वे  हिन्दू महासभा में सम्मिलित हुए।
  • सन 1944 में वे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष भी रहे।
  • मुस्लिम लीग की राजनीति से बंगाल सांप्रदायिक तनाव पैदा हो रहा था। 
  • मुस्लिम साम्प्रदायिक लोगों को ब्रिटिश सरकार प्रोत्साहित कर रही थी। 
  • ऐसी विषम परिस्थितियों में उन्होंने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं की उपेक्षा न हो। 
  • इस काल में उन्होंने भारत में होने वाली राजनीतिक गतिविधियों और सरकारी नीतियों के संबंध में खुलकर अपने वक्तव्य तथा सुझाव दिए। 

बंगाल का अकाल 

  • 1943 में बंगाल में पड़े अकाल के दौरान श्यामा प्रसाद का मानवतावादी पक्ष निखर कर सामने आया, जिसे बंगाल के लोग कभी भुला नहीं सकते। 
  • बंगाल पर आए संकट की ओर देश का ध्यान आकर्षित करने के लिए और अकाल-ग्रस्त लोगों के लिए व्यापक पैमाने पर राहत जुटाने के लिए उन्होंने प्रमुख राजनेताओं, व्यापारियों समाजसेवी व्यक्तियों को जरूरतमंद और पीडि़तों को राहत पहुंचाने के उपाय खोजने के लिए आमंत्रित किया। 
  • फलस्वरूप बंगाल राहत समिति गठित की गई और हिन्दू महासभा राहत समिति भी बना दी गई। 
  • श्यामा प्रसाद इन दोनों ही संगठनों के लिए प्रेरणा के स्रोत थे।
  • लोगों से धन देने की उनकी अपील का देशभर में इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि बड़ी-बड़ी राशियां इस प्रयोजनार्थ आनी शुरू हो गई। इस बात का श्रेय उन्हीं का जाता है कि पूरा देश एकजुट होकर राहत देने में लग गया और लाखों लोग मौत के मुंह में जाने से बच गए।
  • वह केवल मौखिक सहानुभूति प्रकट नहीं करते थे बल्कि ऐसे व्यावहारिक सुझाव भी देते थे, जिनमें सहृदय मानव-हृदय की झलक मिलती जो मानव पीड़ा को हरने के लिए सदैव लालायित और तत्पर रहता है। 
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्होंने संसद में एक बार कहा था, ‘‘अब हमें 40 रू. प्रतिदिन मिलते हैं, पता नहीं भविष्य में लोक सभा के सदस्यों के भत्ते क्या होंगे। हमें स्वेच्छा से इस दैनिक भत्ते में 10 रूपए प्रतिदिन की कटौती करनी चाहिए और इस कटौती से प्राप्त धन को हमें इन महिलाओं और बच्चों (अकाल ग्रस्त क्षेत्रों के) के रहने के लिए मकान बनाने और खाने-पीने की व्यवस्था करने के लिए रख देना चाहिए।’’

आजादी के बाद

  • भारत के संविधान सभा और प्रान्तीय संसद के सदस्य बने 
  • स्वतंत्रता के बाद जब पंडित जवाहरलाल नेहरु के नेतृत्व में सरकार बनी तब डॉ. श्यामा
  • प्रसाद मुखर्जी को भारत के पहले मंत्रिमण्डल में शामिल किया गया
  • उन्होंने उद्योग और आपूर्ति मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली। 
  • उद्योग और आपूर्ति मंत्री होने के नाते, उन्होंने देश में विशाल औद्योगिक उपक्रमों अर्थात् चितरंजन लोकोमोटिव फैक्ट्रीज, सिंदरी, उर्वरक निगम और हिन्दुस्तान एयरक्राट्स फैक्टरी, बंगलौर की स्थापना करके देश के औद्योगिक विकास की मजबूत आधारशिला रखी। 
  • सन 1950 में नेहरु-लियाकत समझौते के विरोध में उन्होंने 8 अप्रैल 1950 को मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया।

जनसंघ की स्थापना

  • उन्होंने अक्टूबर, 1951 में ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना की। 
  • सन 1952 के चुनाव में भारतीय जनसंघ ने तीन सीटें जीती, जिसमे एक उनकी खुद की सीट शामिल थी।

संसदविद के रूप में 

  • डा. श्यामा प्रसाद विपक्ष के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति थे। उनकी श्रेष्ठता को सभी जानते थे और उनके मित्रों तथा विरोधियों दोनों ने ही इस बात को स्वीकार किया कि भारत की प्रथम निर्वाचित संसद में वे विपक्ष के प्रमुख प्रवक्ता थे। 
  • उन्होंने संसद में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दल का गठन करने हेतु, जिसके वे निर्वाचित नेता थे, उड़ीसा की गणतंत्र परिषद, पंजाब के अकाली दल, हिन्दू महासभा तथा अनेक निर्दलीय सांसदों सहित कई छोटी-छोटी पार्टियों को एक किया। 
  • वे सभी उन्हें अपना मुख्य प्रवक्ता मानते थे और इन सभी ने उन्हें विपक्ष की ओर से सभी प्रमुख प्रश्नों का उत्तर देने का अधिकार दिया था। यहां तक कि सत्तारूढ़ दल भी उन्हें विपक्ष का अनौपचारिक नेता के रूप में मानती थी।
  • राजनेता के रूप में उनकी महत्ता एवं उनकी कुशाग्रता, उनकी संसदीय प्रवीणता तथा वाकपटुता, देश की समस्याओं के प्रति उनकी गहन सूझबूझ और रचनात्मक दृष्टिकोण तथा संसद के बाहर उनके जनाधार ने उन्हें सरकार का एकमात्र वास्तविक प्रतिद्वंदी बना दिया था। 
  • सत्तारूढ़ दल भी संसद के समक्ष आने वाले विषयों एवं समस्याओं के प्रति उनकी गहन सूझबूझ एवं उनके विवेचन के कारण उनका सम्मान करता था। 
  • सरकार की नीतियों तथा कार्यों के प्रति उनका सूक्ष्म और मर्मज्ञ परीक्षण तथा सत्तारूढ़ दल के तर्कों का उनके द्वारा सहजता एवं निश्चयता से खंडन करना अत्यंत विश्वसनीय प्रतीत होता था।
  • टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा अत्यंत उल्लेखनीय श्रद्धांजलि दी गई, इसमें कहा गया कि ‘‘डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सरकार पटेल की प्रतिमूर्ति थे’’। यह एक अत्यंत उपर्युक्त श्रद्धांजलि थी क्योंकि डा. मुखर्जी नेहरू सरकार पर बाहर से उसी प्रकार का संतुलित और नियंत्रित प्रभाव बनाए हुए थे जिस प्रकार का प्रभाव सरकार पर अपने जीवन काल में सरदार पटेल का था। राष्ट्र-विरोधी और एक दलीय शासनपद्धति की सभी नीतियों तथा प्रवृत्तियों के प्रति उनकी रचनात्मक एवं राष्ट्रवादी विचारधारा तथा उनके प्रबुद्ध एवं सुदृढ़ प्रतिरोध ने उन्हें देश में स्वतंत्रता और लोकतंत्र का प्राचीर बना दिया था। संसद में विपक्ष के नेता के रूप में उनकी भूमिका से उन्हें ‘‘संसद का शेर’’ की उपाधि अर्जित हुई”.

प्रखर राष्ट्रवादी

  • श्यामा प्रसाद मुखर्जी (1901-1953) राष्ट्रभक्ति एवं देश प्रेम की उस महान परंपरा के वाहक हैं जो देश की परतंत्रता के युग तथा स्वतंत्रता के काल में देश की एकता, अखण्डता तथा विघटनकारी शक्तियों के विरुद्ध सतत् जूझते रहे। 
  • उनका जीवन भारतीय धर्म तथा संस्कृति के लिए पूर्णतः समर्पित था। 
  • वे एक महान शिक्षाविद् तथा प्रखर राष्ट्रवादी थे।
  • पारिवारिक परिवेश शिक्षा, संस्कृति तथा हिन्दुत्व के प्रति अनुराग उन्हें परिवार से मिला था। 

जम्मू-कश्मीर 

  • जम्मू कश्मीर और अनुच्छेद 370 डॉ. मुखर्जी जम्मू कश्मीर राज्य को एक अलग दर्जा दिए जाने के घोर विरोधी थे 
  • शेख और नेहरु, दोनों के साथ डॉ मुखर्जी ने निरंतर पत्रव्यवहार किया, लेकिन नेहरु और शेख की जिद्द के चलते  समाधान नहीं निकल सका
  • डॉ. मुखर्जी ने प्रयास किया कि जम्मू-कश्मीर की समस्याओं का निदान के लिए गोलमेज सम्मेलन बुलाना चाहिए 
  • उनका मत था कि जम्मू कश्मीर को भी भारत के अन्य राज्यों की तरह माना जाये। 
  • वो जम्मू कश्मीर के अलग झंडे, अलग प्रधानमंत्री और अलग संविधान के विरोधी थे। 
  • उनको ये बात भी नागवार लगती थी कि वहाँ का मुख्यमन्त्री (वजीरे-आजम) अर्थात् प्रधानमन्त्री कहलाता था। 
  • उन्होंने लोकसभा में अनुच्छेद-370 को समाप्त करने की जोरदार वकालत की।
  • देश में पहली बार उन्होंने बिना परमिट लिए जम्मू कश्मीर में प्रवेश का एलान किया 
  • वे मई 1953 में बिना परमिट के जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े।
  • डॉ. मुखर्जी 8 मई, 1953 की सुबह 6:30 बजे दिल्ली रेलवे स्टेशन से पैसेंजर ट्रेन में अपने समर्थकों के साथ सवार होकर जम्मू के लिए निकले।
  • उनके साथ बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, टेकचंद, गुरुदत्त और कुछ पत्रकार भी थे। 
  • रास्ते में डॉ. मुखर्जी की एक झलक पाने एवं उनका अभिवादन करने के लिए लोगों का सैलाब उमड़ पड़ता था। 
  • जालंधर के बाद उन्होंने बलराज मधोक को वापस भेज दिया और अमृतसर के लिए ट्रेन पकड़ी। 11 मई, 1953 को डॉ. मुखर्जी ने कुख्यात परमिट व्यवस्था का उल्लंघन करके जम्मू एवं कश्मीर की सीमा में प्रवेश किया। प्रवेश करते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 
  • 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनका देहांत हो गया।

अखंड भारत 

  • डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुकर्जी एक भारत की कल्पना में विश्वास रखते थे। हमारे स्वाधीनता सेनानियों और संविधान निर्माताओं ने भी ऐसे ही भारत की कल्पना की थी। 
  • मगर जब आजाद भारत की कमान सँभालने वालों का बर्ताव इस सिद्धांत के खिलाफ हो चला तो हमारे डॉ साहब ने बहुत मुखरता और प्रखरता के साथ ’एक निशान एक विधान और एक प्रधान’ का नारा बुलंद किया.
  • महाराजा हरि सिंह के अधिमिलन पत्र अर्थात इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षार करते ही समूचा जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग हो गया। 
  • बाद में संविधान के शेड्यूल एक के अनुच्छेद एक के माध्यम से जम्मू कश्मीर भारत का 15वां राज्य घोषित हुआ. 
  • ऐसे में जम्मू कश्मीर में भी शासन व् संविधान व्यवस्था उसी प्रकार चलनी चाहिए थी जैसे कि भारत के किसी अन्य राज्य में. 
  • उन्होंने नारा दिया, “एक देश में दो विधान, दो प्रधान, और दो निशान नहीं चलेंगे” 
  • जब ऐसा नहीं हुआ तो मुकर्जी ने अप्रैल 1953 में पटना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुंकारते हुए कहा था कि शेख और उनके मित्रों को यह साबित करना होगा कि भारतीय संविधान जिसके अंतर्गत देश के पैंतीस करोड़ लोग जिनमे चार करोड़ लोग मुसलमान भी हैं, वे खुश रह सकते हैं तो जम्मू कश्मीर में रहने वाले पच्चीस लाख मुसलमान क्यों नही? 
  • उन्होंने शेख को चुनौती देते हुए कहा था कि यदि वह सेकुलर हैं तो वह संवैधानिक संकट क्यों उत्पन्न करना चाहते हैं। आज जब राज्य का एक बड़ा हिस्सा अपने आप को संवैधानिक व्यवस्था से जोड़ना चाहता है तो शेख अब्दुल्ला इसमें रोड़े क्यों अटका रहे हैं? 
  • उनके द्वारा उठाये गए सवालों के जवाब न शेख के पास थे न पंडित नेहरू के पास। इसीलिए दोनों ने कभी डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुकर्जी से सीधे बात करने की कोशिश भी नहीं की।

(Source: JKNOw)

अनुच्छेद 370 तथ्यात्मक विश्लेषण  

  • डॉ श्यामा प्रसाद मुकर्जी जी का स्पष्ट मत था कि समूचे जम्मू कश्मीर राज्य का शासन प्रबन्ध स्वतंत्र भारत के संविधान के अनुसार चलाया जाये। इस खिलाफ शेख अब्दुल्ला भारतीय संविधान के 370 वें अनुच्छेद को आधार बनाते थे। 
  • डॉ मुखर्जी साफ कहते थे कि अनुच्छेद 370 एक अस्थायी व्यवस्था है जो समय के साथ समाप्त हो जायेगी। यह किसी प्रकार का विशेष दर्जा या शक्ति नहीं है। यह संवैधानिक सत्य साफगोई के साथ नेहरु और उनके राजनीतिक कुनबे ने कभी देश के समक्ष नहीं रखा।
  • अनुच्छेद 370 को स्वतः समाप्त हो जाना था लेकिन इसका दुरूपयोग हुआ  
  • एक सत्य यह है कि जम्मू कश्मीर की संविधान सभा के अधिमिलन पर मुहर लगने के साथ ही अनुच्छेद 370 को स्वतः समाप्त हो जाना था किन्तु यहीं से एक नयी समस्या का जन्म हुआ जिसे दिल्ली एकॉर्ड के नाम से जाना जाता है। 
  • न जाने किस दबाव में पंडित नेहरू ने शेख की सभी पृथकतावादी मांगों को मान लिया और यहीं से शेख की मनमानियों का जोर भी बढ़ गया। 
  • इस एकॉर्ड का परिणाम यह हुआ कि राज्य के पास अपना एक अलग से ध्वज हो गया,  राज्य विधानसभा को राज्य के स्थायी निवासियों के विशेष अधिकार निर्धारित करने की शक्ति प्रदान कर दी गई और यह भी तय कर दिया गया कि राज्य में राजप्रमुख सदर-ए-रियासत होगा। 
  • यह अलगाव के बीजों को सींचने वाला काम था. 
  • जैसे-जैसे पंडित नेहरु शेख के आगे नतमस्तक हुए शेख का उत्साह बढ़ने लगा और उसने अपने भाषणो में आजादी की मांग करनी शुरू कर दी। 
  • इस मुकाम पर एक बार फिर साबित हुआ कि जम्मू कश्मीर और शेख को लेकर डॉ मुखर्जी सही थे और पंडित नेहरु की सोच और उनके कार्य गलत।
  • समय साक्षी है कि नेहरू और शेख के बीच हुए 1952 के इस कथित समझौते ने जम्मू काश्मीर की शेष देश के साथ एकात्मता को बड़ी चोट पहुंचायी है। 
  • डॉ मुखर्जी ने अन्य सभी तत्कालीन विपक्ष के नेताओं के साथ बार-बार संसद में इसे चुनौती दी किन्तु सत्ता पक्ष ने बहुमत के बल पर सत्य का गला घोंट दिया। 
  • तब उनके पास जनता के बीच जाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा। देश भर में डॉ मुखर्जी के नेतृत्व में आन्दोलन हुआ जिसकी परिणति उनके बलिदान के रूप में सामने आयी। 

(Source: JKNow)

प्रजा परिषद् आन्दोलन

  1. जम्मू कश्मीर का इतिहास डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुकर्जी के बिना हमेशा अधूरा रहेगा. जब भी जम्मू कश्मीर राज्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर चिंतन – मनन करता किया जाता है तो वह चौंका देता है। जम्मू कश्मीर में स्वतंत्र भारत का पहला आंदोलन हुआ जिसे प्रजा परिषद आंदोलन के नाम से जाना जाता है। 
  2. आज़ादी के बाद, भारत की एकता और अखंडता को बनाये रखने के लिए प्रजा परिषद् पहला आंदोलन था 
  3. इसक नेतृत्व डॉ. मुखर्जी ने किया 
  4. जम्मू-कश्मीर सत्याग्रह के दौरान 2000 से अधिक लोगो ने अपना बलिदान दिया।
  5. ब्रिटिश सरकार जिस प्रकार क्रांतिकारियों और आंदोलनकारियों के प्रति बर्बर तरीके अपनाती थी वैसे ही तरीके तत्कालीन केंद्र और राज्य सरकारों ने जम्मू-कश्मीर सत्याग्रहियों के साथ अपनाये। जिसकी आज तक कोई जांच नहीं हुई।
  6. डॉ. मुखर्जी पहले और अब तक आखिरी ऐसे व्यक्ति है जिन्होंने अपना बलिदान भारत की राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बनाए रखने के लिए दिया। 
  7. जम्मू-कश्मीर सत्याग्रह के दौरान ऐसे कई मामले आये जहाँ सरकार ने लोकतंत्र के मूल्यों को कमजोर किया। 
  8. संसद में जम्मू-कश्मीर राज्य की स्थिति पर चर्चा के दौरान डॉ. मुखर्जी ने सरकार को सुझाव दिया कि वह सभी पक्षों को साथ लेकर चले और एक गोलमेज सम्मेलन कर शांति से इस समस्या का समाधान निकाले। इस पर नेहरू ने अपना मनोभाव खोते हुआ कहा, ‘नहीं’। डॉ मुखर्जी ने जवाब दिया कि कैसे महात्मा गांधी का प्रतिष्ठित चेला आज ‘नहीं’ बोल रहा है। 
  9. यह सत्याग्रह पूर्णतः शांतिपूर्ण था। 
  10. मार्च 1953 में जवाहरलाल नेहरू ने मेरठ में एक जनसभा को संबोधित किया। इसी के तीन दिन बाद डॉ मुखर्जी को भी एक सभा वहां संबोधित करनी थी। लेकिन नेहरू सरकार ने एक नोटिस जारी किया कि डॉ मुखर्जी वहां जा तो सकते है लेकिन जम्मू-कश्मीर पर कुछ नहीं बोल सकते। 
  11. डॉ. मुखर्जी की मृत्यु के बाद शेख अब्दुल्ला ने कहा कि जवाहरलाल नेहरू (नेहरू विदेश यात्रा पर थे) के भारत लौटते ही वे डॉ मुखर्जी को रिहा करने वाले थे। यह अजीब सा तथ्य था नेहरू जब विदेश यात्रा पर थे तो अब्दुल्ला नई दिल्ली में गृह मंत्री व् अन्यों से संपर्क कर डॉ मुखर्जी को रिहा कर सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। 
  12. डॉ. मुखर्जी और उनके अन्य साथी जब श्रीनगर में बंदी थे तब जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री, के. एन. काटजू जम्मू-कश्मीर के दौरे पर आये थे लेकिन दोनों में से किसी ने डॉ. मुखर्जी के बारे में कोई जानकारी वहां की राज्य सरकार ने नहीं ली और न ही रिहाई के सम्बद्ध में कोई प्रतिक्रिया दिखाई। 
  13. यह तथ्य हैं कि जम्मू-कश्मीर जाने के लिए परमिट व्यवस्था की शुरुआत भारत सरकार ने की थी। शेख अब्दुल्ला सरकार ने उन्हें राज्य की सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देकर गिरफ्तार किया था।
  14. उनकी गिरफ्तारी के बाद उन्हें किसी भी ट्रायल के लिए पेश नहीं किया गया था।
  15. आज तक उनकी मृत्यु के कारणों की जाँच के लिए किसी आयोग का गठन नहीं किया गया।
  16. जम्मू-कश्मीर सत्याग्रह को व्यापक जन समर्थन प्राप्त था। देश के लगभग सभी दलों, कांग्रेस और कम्युनिस्ट के अलावा, ने डॉ. मुखर्जी का समर्थन किया। सुचेता कृपलानी, मास्टर तारा सिंह, जे.बी. कृपलानी, एन. सी. चटर्जी, बाबू रामनारायण सिंह, स्वामी करपात्री महाराज, एन. बी. खरे और कई अन्य डॉ. मुखर्जी के साथ थे।

(देवेश खंडेलवाल, एकात्म भारत का संकल्प, दिल्ली: प्रभात प्रकाशन, 2018)

Leave a Reply

Your email address will not be published.

gaziantep escort bayangaziantep escortkayseri escortbakırköy escort şişli escort aksaray escort arnavutköy escort ataköy escort avcılar escort avcılar türbanlı escort avrupa yakası escort bağcılar escort bahçelievler escort bahçeşehir escort bakırköy escort başakşehir escort bayrampaşa escort beşiktaş escort beykent escort beylikdüzü escort beylikdüzü türbanlı escort beyoğlu escort büyükçekmece escort cevizlibağ escort çapa escort çatalca escort esenler escort esenyurt escort esenyurt türbanlı escort etiler escort eyüp escort fatih escort fındıkzade escort florya escort gaziosmanpaşa escort güneşli escort güngören escort halkalı escort ikitelli escort istanbul escort kağıthane escort kayaşehir escort küçükçekmece escort mecidiyeköy escort merter escort nişantaşı escort sarıyer escort sefaköy escort silivri escort sultangazi escort suriyeli escort şirinevler escort şişli escort taksim escort topkapı escort yenibosna escort zeytinburnu escort