सम्राट विक्रमादित्य द्वारा क्षिप्रा तट पर स्थापित भूखीमाता मंदिर

उज्जैन नगर की सिद्ध देवी भूखीमाता
नवरात्रों में आज हम बात करेंगे उज्जैन की क्षिप्रा नदी के तट पर स्थापित भूखीमाता मंदिर की, जिसकी स्थापना को लेकर मान्यता है कि माताजी को इस स्थान और स्थापित स्वयं राजा विक्रमादित्य ने किया था। इस मंदिर में भूखी माता के अलावा उनकी बहन भुवनेश्वरी माता की प्रतिमा भी प्रतिष्ठित है। नगर की सीमा ओर माता क्षिप्रा से लगे इस मंदिर में माता की अलौकिक शक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव होता है। दोनो माताओं की प्रतिमा इतनी चैतन्य है कि भक्त भाव विभोर हो कर देखते ही रह जाते है, मानो माँ उनके समक्ष बैठी है और बोल पड़ेगी। नवरात्रों सहित वर्षभर यहां श्रद्धालुओं का ताता लगा रहता है।

मंदिर की स्थापना को लेकर जो मान्यता
मंदिर की स्थापना को लेकर जो मान्यता है उसके बारे में मंदिर के पुजारी श्री विकास महाराज ने बताया कि,
\”प्राचीन समय में भूखीमाता अपने अन्य बहनों से साथ अवंतिका नगरी में विराजमान थी। ऐसी मान्यता है कि नगर की सुख समृद्धि के लिए तब प्रतिदिन एक मानव बलि माताओं को चढ़ाई जाती थी। बलि के लिए जिसका चयन किया जाता था उसे एक दिवस का राजा भी बनाया जाता था। एक बार जब राजा विक्रमादित्य अवंतिका नगरी में प्रजा का हालचाल जानने पहुचे तो एक बूढ़े मातापिता को दुखी देख उनसे कारण जानना चाहा। बुजुर्ग दम्पत्ति ने अपनी परेशानी का सारा वृतांत राजा को सुनाया। जब माता के द्वारपाल आए तो स्वयं राजा उनके साथ चले गए और माताओं को प्रसन्न करने के लिए नगर के उस स्थान जहा नर बलि दी जाती थी पर विभिन्न प्रकार के मेवे-मिष्ठान ओर स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ रखवा दिए। माताएं प्रसन्नता से आई और भोज्य पदार्थों को ग्रहण करती गई, वह सभी इतना तृप्त हो गई कि अब नर बलि की कामना नही रही।

सभी माताएं राजा से प्रसन्न हुई और बोली यदि यह स्थायी रूप से राजा रहेगा तो रोज हमारे पूजन-भोग आदि का अच्छा ध्यान रखेगा। अतः सभी ने नर बलि के लिए मना कर दिया किन्तु एक माता अब भी भूखी रख गई और उन्होंने नर बलि लेने की बात कही। राजा ने नर बलि के निर्धारित स्थान पर मेवे-मिश्री से एक पुतला बनवाकर उस पर चादर चढ़वा दी और स्वयं उस खाट के नीचे छुप गए। माता ने पुतले का अंगूठा तोड़ कर खाया और वह इतनी प्रसन्न हुई कि बोली जो कोई मानव मुझे सुन रहा हो उसको में मनवांछित वरदान देने के लिए तैयार हूं। राजा तुरंत खाट के नीचे से निकल कर माता के सामने नतमस्तक हो गए और वरदान में एक वचन मांगा। माता ने कहा कि वचन क्या मांगते हो कोई बड़ा वरदान मांगो, लेकिन राजा वचन के लिए ही याचना करते रहे। वचन में उन्होंने माता को नगर के बाहर निवास करने का आग्रह किया जिसे माता ने स्वीकार कर लिया। राजा विक्रम को चक्रवर्ती सम्राट बनने का आशीर्वाद दे माता ने नगर के बाहर स्थान ग्रहण किया। अनेक व्यंजन खाने के बाद भी भूखी रह जाने के चलते माता की अन्य बहनों ने उन्हें भूखीमाता नाम दिया।\”

अब भी पशु बलि स्वीकार करती है माँ
भूखीमाता अब भी पशुओं की बाली स्वीकार करती है। पुरातन समय मे राजा और सैन्य कर्म वाले लोग युद्ध मे विजय की कामना से माता को पशुबलि दिया करते थे। आज भी लोग अपने मनोगत ( मान-मन्नत ) पूरे होने पर माता को पशुबलि अर्पित करते है। जिन लोगो के कठिन और असंभव से काम माता की मन्नत करने पर सिद्ध होते है वो लोग आए दिन यहां बलि अर्पित करने आते है। सामान्यतः यहां बकरे की ही बलि दी जाती है, जबकि कुछ लोग मुर्गे की भी बलि अर्पित करते है। कई लोग बकरों को अमरिया ( कान काट के अर्पित ) कर छोड़ देते है। बलि की परंपरा का एक मनोवैज्ञानिक कारण भी है, युद्धपेशा लोगो का मन खून और मरते हुए की छटपटाहट देख कमजोर न पड़े और वह कठिन परिस्थितियों में भी दृढ़तापूर्वक डटे रहे इसलिए हिंदुओं में माता को पशुबलि की भेट दी जाती है।

सर्व हिन्दू समाज की आस्था जुड़ी है भूखीमाता से
भूखीमाता मंदिर मालवा क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध देवी मंदिरों में से एक है। मालवा ही नही देशभर से भक्त भूखीमाता के दर्शन करने आते है। हिदुओं की समस्त जातीय समाजों में भूखीमाता के प्रति असीम श्रद्धा का भाव है लेकिन मालवा क्षेत्र की अनुसूचित जातियों में तो भूखीमाता का स्थान बहुत विशेष है, किसी भी प्रकार से शुभकार्य से पहले वह भूखीमाता का पूजन करते हैं। एक स्थानीय भक्त श्री रामदयाल मालवीय ने बताया कि उनकी ही जाति के कुछ परिवार बहकावे में आकर ईसाई बन गए थे, लेकिन सभी परिवारों के मुखिया के सपने में भूखीमाता ने दर्शन दिए। माता के दर्शन के बाद सभी ने ईसाई मिशनरियों को छोड़ पुनः अपने धर्म का पालन शुरू कर दिया। एक यात्री ने बताया कि यदि किसी को शत्रु पर विजय पाना हो तो भूखीमाता से की गई प्रार्थना कभी खाली नही जाती, यह यश और विजय दिलाने वाली देवी है।

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