‘मनुस्मृति’ का एक श्लोक पढ़कर महिलाओं को ज्ञान देने निकले राहुल गांधी!

 (संकुचित राजनैतिक विमर्श बनाम शाश्वत सामाजिक सत्य)

डॉ. मयंक चतुर्वेदी 

वैचारिक शून्यता और तात्कालिक राजनैतिक लाभ के इस आधुनिक दौर में, भारत के प्राचीन वाङ्मय को बिना समझे उस पर प्रहार करना एक फैशन बन चुका है। हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा पुणे के एक कार्यक्रम में मनुस्मृति के मात्र एक श्लोक को आधार बनाकर पूरे ग्रंथ की आलोचना करना इसी संकुचित और एकांगी सोच का ताजा उदाहरण है। जब राजनेता किसी वृहद् कालजयी ग्रंथ के किसी एक अंश को संदर्भ से काटकर (Out of Context) जनता के सामने परोसते हैं, तो वे न सिर्फ अपनी ज्ञान परम्परा के साथ अन्याय करते हैं बल्कि समाज में एक भ्रामक विमर्श को भी जन्म देते हैं। 

वस्तुतः मनुस्मृति महर्षि मनु द्वारा रचित एक ऐसी विधि-संहिता (Legal and Social Code) है, जिसने सदियों तक भारतीय समाज को एक सुदृढ़ और अनुशासित ढांचा प्रदान किया। यदि हम इस ग्रंथ का निष्पक्ष, समग्र और पूर्वाग्रह-मुक्त अध्ययन करेंगे, तब अवश्य ही  यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुस्मृति नारी के दमन का नहीं, उसके सर्वोच्च सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों का उद्घोष करने वाला ग्रंथ है। आज के विघटित होते समाज, टूटते परिवारों और बढ़ते अपराधों के दौर में मनुस्मृति के शाश्वत नियम न सिर्फ प्रासंगिक हैं, बल्कि वे वर्तमान सामाजिक विकृतियों का स्वतः ही अंत करने की क्षमता रखते हैं।

राहुल गांधी के दृष्टिकोण की संकीर्णता और एकांगी मूल्यांकन की राजनीति

राजनैतिक मंचों से जब भी मनुस्मृति को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया जाता है, तो प्रायः अध्याय 9 के उस बहुचर्चित श्लोक का सहारा लिया जाता है जिसमें कहा गया है; ‘न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति’ (स्त्री स्वतंत्रता के योग्य नहीं है)। महाराष्ट्र के पुणे स्थित एआईएसएसएमएस कॉलेज ग्राउंड में ‘छत्रों की गूंज’ के चौथे कार्यक्रम में राहुल गांधी ने भी इसी श्लोक की सतही व्याख्या करते हुए पूरी मनुस्मृति को महिला विरोधी और प्रतिगामी घोषित करने का प्रयास किया।  यह दृष्टिकोण अकादमिक और बौद्धिक विमर्श की कसौटी पर पूरी तरह खोखला है। क्योंकि किसी भी प्राचीन विधिक या दार्शनिक ग्रंथ का मूल्यांकन उसके मूल भाव, तात्कालिक कालखंड की परिस्थितियों और ‘परतंत्रता’ बनाम ‘संरक्षण’ के महीन अंतर को समझे बिना नहीं किया जा सकता मनुस्मृति में प्रयुक्त ‘अस्वतन्त्रा’ शब्द का अर्थ आधुनिक अर्थों में ‘गुलामी’ या ‘कैद’ न होकर सामाजिक सुरक्षा और पारिवारिक उत्तरदायित्व’ से है।

महर्षि मनु का स्पष्ट मानना था कि समाज के सबसे संवेदनशील और मूल्यवान हिस्से (जैसे महिलाएं, बच्चे और वृद्ध) को कभी भी समाज की भेड़िया-प्रवृत्ति के सामने असुरक्षित या बेसहारा नहीं छोड़ा जाना चाहिए। यही कारण है कि उन्होंने जीवन के हर पड़ाव पर महिला की सुरक्षा का अनिवार्य दायित्व पुरुष समाज (बचपन में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र) को सौंपा। आज के आधुनिक लोकतंत्र में भी जब हम कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाते हैं, उन्हें मैटरनिटी लीव (मातृत्व अवकाश) देते हैं या घरेलू हिंसा से संरक्षण प्रदान करते हैं, तो राज्य वास्तव में एक ‘संरक्षक’ की भूमिका ही निभा रहा होता है। 

राहुल गांधी का इस महान संरक्षणवादी और सुरक्षात्मक दृष्टिकोण को ‘उत्पीड़न’ के रूप में प्रस्तुत करना वास्तव में उनकी भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और विधिशास्त्र (Jurisprudence) की समझ की कमी को ही उजागर करता है। एक श्लोक के विकृत अर्थ के आधार पर संपूर्ण धर्मशास्त्र को खारिज करना वैसा ही है जैसे किसी आधुनिक संविधान की एक विवादास्पद धारा को देखकर पूरे संविधान को ही जनविरोधी घोषित कर दिया जाए।

 यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते: मनुस्मृति में नारी सम्मान की पराकाष्ठा

यदि मनुस्मृति वास्तव में महिला विरोधी ग्रंथ होती, तो उसमें समाज के किसी भी अन्य समकालीन वैश्विक ग्रंथ की तुलना में नारी को इतना ऊंचा और पवित्र स्थान नहीं दिया गया होता। मनुस्मृति के अध्याय 3 का 56 वां श्लोक संपूर्ण विश्व के स्त्री विमर्श और मानवाधिकारों का मूल मंत्र होना चाहिए ; 

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।

अर्थात, जहाँ नारियों की पूजा (आदर-सम्मान) होती है, वहाँ साक्षात देवता (अर्थात सुख, समृद्धि, शांति और प्रगति) निवास करते हैं। और जहाँ स्त्रियों का सम्मान नहीं होता, वहाँ परिवार, समाज या राष्ट्र द्वारा किए गए सभी बड़े और पवित्र कार्य पूरी तरह निष्फल हो जाते हैं।

वस्तुतः मनु महाराज यहीं नहीं रुकते, वे पुरुषों को चेतावनी देते हुए आगे लिखते हैं कि जिस कुल (परिवार) में बहुएं, बेटियां या पत्नियां उचित सम्मान न मिलने के कारण दुखी होकर आंसू बहाती हैं या श्राप देती हैं, वह परिवार बहुत जल्दी किसी अभिचार या काले जादू से नष्ट हुए घरों की तरह पूरी तरह बर्बाद हो जाता है। अब विचार करें, जो ग्रंथ किसी समाज की प्रगति की पहली शर्त ही नारी का सम्मान मानता हो, उसे नारी-विरोधी कहना राहुल गाँधी का वैचारिक और राजनैतिक दिवालियापन नहीं तो ओर क्या है? 

मातृत्व का गौरव: पिता और गुरु से हजार गुना ऊपर स्थान

मनुस्मृति समाज और परिवार में माता के स्थान को जो अलौकिक और सर्वोच्च गौरव प्रदान करती है, उसकी तुलना दुनिया के किसी भी आधुनिक न्यायशास्त्र या दर्शन से नहीं की जा सकती। ग्रंथ के दूसरे अध्याय के 145 वें श्लोक में महर्षि मनु स्पष्ट रूप से घोषणा करते हैं:

उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता।

सहस्रं तु पितृन्माता गौरवेणातिरिच्यते।।

अर्थात, दस उपाध्यायों (शिक्षकों) से बढ़कर एक आचार्य होता है। सौ आचार्यों से बढ़कर एक पिता होता है। लेकिन, गौरव, आदर और पूजनीयता के मामले में एक माता का स्थान एक हजार पिताओं से भी ऊपर होता है। यह श्लोक अकाट्य प्रमाण है कि मनु की दृष्टि में मातृत्व सिर्फ एक जैविक प्रक्रिया होने तक सीमित नहीं था, वह समाज की सबसे शक्तिशाली और आदरणीय धुरी रहा। आज के आधुनिक पश्चिमी समाज के साथ अब तो भारत में भी अनेक स्‍थानों पर जहाँ माता-पिता को वृद्धाश्रमों में छोड़ दिया जाता हो, वहाँ मनु का यह नियम एक आदर्श प्रस्तुत करता है। 

इसी तरह से मनुस्मृति (अध्याय 8, श्लोक 389) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए समाज द्वारा बहिष्कृत भी कर दिया जाए, तब भी संतान अपनी माता का परित्याग कभी नहीं कर सकती। माता चाहे जैसी भी हो, उसका भरण-पोषण और सम्मान करना संतान का अनिवार्य और परम धर्म है।

आर्थिक स्वतंत्रता और ‘स्त्रीधन’ का क्रांतिकारी विधिक अधिकार

आज के आधुनिक युग में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण (Economic Empowerment) को नारी मुक्ति का सबसे बड़ा साधन माना जाता है। लेकिन यह जानकर गर्व होना चाहिए कि महर्षि मनु ने हजारों वर्ष पूर्व महिलाओं को ‘स्त्रीधन’ के रूप में पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता और विधिक सुरक्षा प्रदान की थी। अध्याय 9 के शूलाक 194 के अनुसार, विवाह के समय अग्नि के समक्ष मिला धन, विदाई के समय माता-पिता, भाई या रिश्तेदारों द्वारा दिए गए उपहार, आभूषण और भूमि,  यह सभी सिर्फ उस महिला की निजी संपत्ति (स्त्रीधन) मानी जाएगी।

मनु का कानून इस विषय में इतना सख्त है कि संकट या दरिद्रता की स्थिति में भी पति, ससुर या परिवार का कोई भी पुरुष सदस्य महिला की अनुमति के बिना उस धन को हाथ नहीं लगा सकता। यदि कोई पुरुष लोभवश या जबरदस्ती स्त्री के धन का उपभोग करता है, तो मनुस्मृति में उसे चोर की श्रेणी में रखकर कड़े दंड और पाप का भागीदार माना गया है। यह व्यवस्था दर्शाती है कि मनु महिलाओं को भावनात्मक रूप के साथ ही आर्थिक रूप से भी स्वतंत्र और सुदृढ़ देखना चाहते थे, ताकि ससुराल में उनका आत्मसम्मान और सिर हमेशा ऊंचा रहे।

पारिवारिक स्थिरता और वैवाहिक निष्ठा: आधुनिक संकटों का समाधान

वर्तमान समय में आधुनिक समाज जिस सबसे बड़े संकट से जूझ रहा है, वह है पारिवारिक ताने-बाने का बिखराव, तलाक के आसमान छूते मामले, घरेलू हिंसा और आपसी अविश्वास। ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ और ‘अहंकार’ के नाम पर आज परिवार टूट रहे हैं, जिसका सबसे बुरा असर बच्चों के भविष्य पर पड़ रहा है। इस वैश्विक समस्या का अचूक और व्यावहारिक समाधान मनुस्मृति के वैवाहिक सिद्धांतों में अंतर्निहित है। मनुस्मृति कहती है- 

सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च।

यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम्।

यहां श्‍लोक का अर्थ है, जिस परिवार में पति अपनी पत्नी से और पत्नी अपने पति से हमेशा संतुष्ट, वफादार और प्रसन्न रहती है, उस कुल का कल्याण और उन्नति निश्चित रूप से होती है। मनु ने विवाह को कोई संविदा (Contract) नहीं माना जिसे जब चाहे अपनी सुविधा के अनुसार तोड़ दिया जाए। उन्होंने इसे एक जन्म-जन्मांतर का पवित्र आत्मिक बंधन माना है। अध्याय 9 के 101वें श्लोक में वे पति-पत्नी को आदेश देते हैं कि उन्हें मृत्यु पर्यंत एक-दूसरे के प्रति पूर्णतः वफादार रहना चाहिए और कभी भी एक-दूसरे को धोखा नहीं देना चाहिए। आज यदि इस एक सिद्धांत को समाज जीवन में पूरी तरह उतार लिया जाए, तो न्यायालयों में लंबित लाखों वैवाहिक विवाद, तलाक के मुकदमे और मानसिक अवसाद जैसी सामाजिक विसंगतियां स्वतः ही समाप्त हो जाएंगी।

कन्या सुरक्षा, भ्रूण हत्या और दहेज प्रथा पर मनु का कड़ा प्रहार

भारतीय समाज को लंबे समय तक कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह और दहेज जैसी कुप्रथाओं ने कलंकित किया जाता रहा है। राहुल गांधी जैसे राजनेता अक्सर इन सामाजिक बुराइयों का ठीकरा प्राचीन हिंदू ग्रंथों पर फोड़ते हैं, जबकि सत्य इसके ठीक विपरीत है। मनुस्मृति ने इन कुप्रथाओं पर अत्यंत कड़ा विधिक प्रहार किया है। मनुस्मृति (अध्याय 3, श्लोक 51) में स्पष्ट निर्देश दिए गए है, जिसके अनुसार- 

न कन्यायाः पिता विद्वान्गृह्णीयाच्छुल्कमण्वपि।

शुल्कं हि गृह्णन्लोभेन स्यादपत्यविक्रयी।।

अर्थात, किसी भी समझदार और धार्मिक पिता को अपनी बेटी के विवाह के बदले सामने वाले पक्ष से थोड़ा सा भी धन या शुल्क (दहेज/कन्या मूल्य) नहीं लेना चाहिए। जो पिता लोभ में आकर ऐसा धन लेता है, वह अपनी ही संतान को बेचने वाले कसाई या पापी के समान माना जाता है। इसी प्रकार, मनुस्मृति बेटे और बेटी में कोई भेद नहीं करती। अध्याय 9 के 130वें श्लोक को इस संदर्भ में देखा जा सकता है, जिसमें मनु लिखते हैं,

‘यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा’ 

अर्थात् जैसी मनुष्य की अपनी आत्मा होती है, वैसा ही उसका पुत्र होता है और पुत्र के समान ही उसकी पुत्री (बेटी) होती है, इसलिए पैतृक संपत्ति पर बेटी का भी उतना ही स्वाभाविक अधिकार है, जितना कि पुत्र का है। आज हमारा संविधान भी यही कहता है। 

मिलावट (प्रक्षेप) का ऐतिहासिक सत्य और पूर्वाग्रही वामपंथी व्याख्याएं

दरअसल, वास्‍तविकता यही है कि मनुस्मृति की आलोचना करने वाले राजनेता और पाश्चात्य बुद्धिजीवी अक्सर एक बहुत बड़े ऐतिहासिक सत्य को चालाकी से छिपा जाते हैं कि वर्तमान में उपलब्ध मनुस्मृति अपने मूल स्वरूप में नहीं है। सदियों के कालखंड में, विदेशी आक्रमणों (मुगलों और अंग्रेजों के काल) के दौरान और मध्यकाल में इस ग्रंथ में व्यापक स्तर पर ‘प्रक्षेप’ (Interpolations) यानी मिलावट की गई। फिर कई वामपंथी और मैकालेवादी इतिहासकारों ने जानबूझकर हिंदू समाज को जातियों और लिंग के आधार पर विभाजित करने तथा उसे प्रतिगामी दिखाने के लिए मनुस्मृति में ऐसे श्लोक जोड़े, जो मूल ग्रंथ के मूल दर्शन से पूरी तरह मेल ही नहीं खाते।

तार्किक रूप से सोचें, जो ग्रंथ एक तरफ नारी को साक्षात लक्ष्मी, पूजनीय और देवताओं के निवास का आधार बताता है, वही ग्रंथ कुछ श्लोकों बाद अचानक स्त्री को प्रताड़ना या अधिकार-हीन कैसे कह सकता है? यह अंतर्विरोध (Contradiction) इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि बाद के समय में स्वार्थी तत्वों और विदेशी षड्यंत्रकारियों द्वारा इसमें मिलावट की गई थी।

महर्षि दयानंद सरस्वती जैसे महान समाज सुधारकों और प्राच्य विद्या के विद्वानों ने भी शोध करके स्पष्ट किया था कि मनुस्मृति के वे हिस्से जो मानवीय गरिमा, लैंगिक समानता और न्याय के विरुद्ध हैं, वे मूल मनु के नहीं हैं बल्कि बाद में जोड़े गए प्रक्षेप हैं। वह उनकी भाषा शैली से भी समझा जा सकता है, इसके लिए हमारे भाषाविज्ञ भी अपनी स्‍पष्‍ट राय दे चुके हैं। अब राहुल गांधी जैसे नेता इस ऐतिहासिक और वैज्ञानिक सत्य को समझे बिना सिर्फ  राजनैतिक रोटियां सेकने के लिए पूरे ग्रंथ पर कालिख पोतने का प्रयास करते हैं, जो निश्‍चित तौर पर उनकी बौद्धिक संकुचितता को उजागर करता है।

व्यावहारिक उपयोगिता: समाज जीवन में समस्याओं का स्वतः समाधान

यदि आज के सामाजिक नजरिए से देखा जाए, तो मनुस्मृति के नियम किसी भी आधुनिक कानून से अधिक प्रभावी और व्यावहारिक हैं। आधुनिक कानून अपराध होने के बाद दंड देने की बात करता है, जबकि मनुस्मृति मनुष्य के भीतर ऐसे ‘संस्कार’ और ‘कर्तव्य बोध’ का निर्माण करती है कि अपराध का विचार ही थम जाए।

 मनुस्मृति में मार्ग देते समय राजा, विद्वान और दूल्हे से भी पहले गर्भवती या संकट में फंसी स्त्री को रास्ता देने का नियम है। इसके लिए अध्याय 2 का श्लोक 138 यह दर्शाता है कि सार्वजनिक जीवन में भी स्त्री की सुरक्षा और सहूलियत सर्वोपरि थी। मनुस्मृति पति को आदेश देती है कि वह घर के वित्तीय प्रबंधन, आय-व्यय, धार्मिक अनुष्ठान और रसोई का पूरा जिम्मा पत्नी को सौंपे और उस पर पूर्ण भरोसा करे। यह आज के ‘विमेन लीडरशिप’ (Women Leadership) का प्राचीन स्वरूप है।

अब केंद्र एवं राज्‍य सरकारों के स्‍तर पर भी विचार करलें, क्‍या हम अपनी स्‍त्र‍ियों, युवतियों, माताओं को संरक्षण नहीं दे रहे, यदि दे रहे हैं तो क्‍या यह राहुल गांधी की भाषा में कहें, उन्‍हें गुलाम बनाना है? फिर क्‍यों महिला आयोग बनाए हैं? पॉक्‍सो एक्‍ट लागू किया है? एक बेटी के जन्‍म से लेकर उसकी मृत्‍यु तक अनेक योजनाएं, नियम, कानून हैं, जिनके माध्‍यम से आज भी हम अपने समाज की स्‍त्री को सम्‍मान दे रहे हैं, उसके हित एवं रक्षा के लिए यथासंभव प्रयास कर रहे हैं, तब तो हम सब भी राहुल की भाषा में नारी का शोषण कर रहे हैं? 

आधुनिक समाज के लिए मनुस्मृति एक प्रकाश स्तंभ

अंततः, ऐसे में यही कहना होगा कि जो स्‍त्री या पुरुष यदि राहुल गांधी के अधुरे एवं असत्‍य ज्ञान को सुनकर सत्‍य मान रहे हैं, वे उनकी कही किसी बात को स्‍वीकार्य नहीं करें, स्‍वयं मनुस्‍मृति का अध्‍ययन करें, फिर किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचें। साथ ही अच्‍छा हो, वे किसी संस्‍कृत के विद्वान से इस ग्रंथ के श्‍लोकों के भावार्थ जानें। कुल मिलाकर मनुस्मृति कोई रूढ़िवादी, जड़ या दमनकारी ग्रंथ नहीं है, वह एक जीवंत और प्रगतिशील सामाजिक नियमावली है। राहुल गांधी द्वारा पुणे में दिया गया वक्तव्य उनके राजनैतिक एजेंडे और तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा तो हो सकता है, पर वह पराम्‍परागत, ऐतिहासिक, सामाजिक और अकादमिक सत्य की कसौटी पर कभी खरा नहीं उतर सकता। एक श्लोक के विकृत संदर्भ के आधार पर संपूर्ण मनुस्मृति को कटघरे में खड़ा करना वैचारिक अंधता है।

आज जब पूरा विश्व नैतिक पतन, अवसाद, बिखरते परिवारों, वृद्धों की उपेक्षा और महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों से त्रस्त है, ऐसे में मनुस्मृति के सिद्धांत एक प्रकाश स्तंभ (Lighthouse) की तरह सही मार्ग दिखाते हैं। माता का सर्वोच्च आदर, पत्नी की सुरक्षा का पुरुष का अनिवार्य उत्तरदायित्व, स्त्रीधन के माध्यम से पूर्ण आर्थिक अधिकार उसे देना, दहेज का पूर्ण निषेध और वैवाहिक निष्ठा, वस्‍तुत: ये ऐसी बातें हैं जो किसी भी काल, देश या परिस्थिति में अप्रासंगिक नहीं हो सकतीं।

अत: मनुस्मृति का समाज जीवन में पालन करने का अर्थ उसके शाश्वत मूल्यों (Eternal Values) को आत्मसात करना है। यदि हमारा समाज इन जीवन-मूल्यों को पुनः अपना लेता है, तब आप विश्‍वास करें कि वर्तमान की अधिकांश सामाजिक, पारिवारिक और कानूनी समस्याओं का समाधान बिना किसी पुलिस या न्यायालय के स्वतः ही हो जाएगा और समाज में समस्याएं जन्म ही नहीं लेंगी। वास्‍तव में यही समाज जीवन के लिए “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की आदर्श व्‍यवस्‍था है।


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