Uniform Civil Code से न सात फेरों होंगे बंद ओर न बदलेगा निकाह करने का तरीका

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समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) से न तो सात फेरों की परंपरा बदलेगी न निकाह करने का तरीका बदलेगा

क्या UCC लोगों के धर्मिक अधिकार छीन लेगा?
समान नागरिक संहिता लागू हो जाने से भी लोगों के धर्मिक अधिकार सुरक्षित रहेंगे. वह अपने रीति-रिवाज ओर परम्पराओं का पहले कि तरह अनुसरण करते रहेंगे. लेकिन धार्मिक परम्पराओं के नाम पर किसी को भी किसी अन्य की स्वतंत्रता को छिनने, दुसरो को ठेस पहुचाने एवं मानवमात्र की समानता के सिद्धांत को ठेस पहुंचाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है. हमारे पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश मे सभी धर्मों के नागरिकों को अपने निजी कानून बनाने की स्वतंत्रता दी गई है. इसके चलते समय-समय पर कई समस्याओं का सामना देश और समाज को करना पड़ता है.

\”समाज मे एकरूपता, देश में एकता ओर महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए मिल का पत्थर साबित होगा यूनिफॉर्म सिविल कोड\”

सनातनी, सिक्ख, जैन, बौद्ध सभी हिंदू कोड से अधिनियमित होते है
जब भी इन व्यक्तिगत कानूनों को समाप्त के देश मे एक समान नागरिक कानून लागू करने की बात होती है तो कुछ लोग इसका विरोध करने लगते है. विरोध करने वालो का सबसे पहले तर्क यह होता है कि इससे हमारी रीति-रिवाज ओर परम्पराएँ नष्ट हो जाएगी. जबकि वास्तविकता में ऐसा नहीं है, जब देश मे हिंदू कोड लागू हुआ तब उसमें अलग-अलग रीति-रिवाज ओर परम्पराओं को मानने वाले वैदिक परंपरा वाले सनातनियों के साथ ही अवैदिक जैन ओर बौद्ध परम्पराओं को भी रखा गया था. बौद्ध के धर्मिक क्रियाकलाप तो बाकियों से बिलकुल ही अलग है जबकि सिक्खों के रीति रिवाजों में भी व्यापक अंतर नजर आता है.

छः दशको में नही आया कोई बदलाव
हिंदू कोड लागू होने के 6 दशक बाद भी जब उपरोक्त समूहों के रीति रिवाजों ओर परम्पराओं में कोई फर्क नहीं पड़ा तो फिर किसी अन्य समूह के बारे में ऐसा आंकलन किया जाना बेकार है. यदि संविधान काअनुच्छेद 44 में यूनिफॉर्म सिविल कोड की वकालत करता है तो साथ ही अनुच्छेद 25 और 29 सभी वर्गों को अपनी धार्मिक मान्यताओं और रीति-रिवाजों को मानने की पूरी आजादी देते है. यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू हो जाने के बाद भी सभी सम्प्रदायों के लोगो को अपनी धार्मिक आस्था, रीति-रिवाज, परम्पराओं को मानने से कोई नही रोक सकेगा.

संविधान के मूल भाव को सार्थक बनाएगा UCC
इसके माध्यम से सभी सम्प्रदायों के लोगों को समान कानून के दायरे में लाया जाएगा, जिसके अंतर्गत विवाह, विवाह विच्छेद, संपत्ति के उत्तराधिकार, और दत्तक ग्रहण (गोद लेने) जैसे विषय सम्मिलित होंगे. ये समाज के प्रत्येक वर्ग को विशेषकर महिलाओं को कानूनी आधार पर मजबूत बनाएगा. कई सम्प्रदायों में मध्ययुगीन परम्पराओं के नाम पर महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है, जबकि हमारा संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान करता है. यह कानून संविधान के उसी भाव को सार्थक कर सकेगा.

डॉ. उत्तम मोहन मीणा (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार है)

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