जब देशभर में प्रसिद्ध पंडित दीनदयालजी अपने गांव पँहुचे…

प्रेरकसंस्मरण

दीनदयालजी तन-मन से संघ के कार्यों के लिए समर्पित थे। एक बार सन् 1961 में उन्हें
संगठन के कार्य से मथुरा जाना पड़ा। अब तक दीनदयालजी देश में बहुत प्रसिद्ध हो गए थे।
उनके बचपन के मित्र एवं जाननेवाले उनसे मिलने के लिए लालायित थे। दीनदयालजी अपने
गाँव पहुँचे। वहाँ उनसे मिलने के लिए भीड़ एकत्र हो चुकी थी। उसमें कई जान-पहचान के लोग
थे तो कई ऐसे भी थे, जो उत्सुकतावश उनसे मिलने चले आए थे। दीनदयालजी को देखकर
एक बुजुर्ग सी महिला बोली, \”अरे, अपना दीना तो अभी भी वैसा-का-वैसा ही है, मुझे तो लगता
था कि दीना का इतना नाम हो गया है तो वह बड़ा साहब हो गया होगा! सूट-बूट पहनता होगा
और अदब से चलता होगा, पर यह तो अभी भी हम जैसा ही है।\” उनकी बात सुनकर दीनदयाल
मुसकराते हुए बोले, “दादी, क्या बड़ा नाम हो जाने से इनसान में सुरखाब के पर निकल आते हैं
या उसके सींग निकल आते हैं? अरे, इनसान कितना भी नाम कमा ले, किंतु उसका रूप-रंग
थोड़े ही बदल जाता है?\” दीनदयाल की बात सुनकर एक युवक बोला, “आप अलग हैं, वरना
आजकल तो लोग जरा से बड़े क्या हुए, उनके चलने के अंदाज बदल जाते हैं, बात करने का
लहजा बदल जाता है और तो और, वे लोग हम जैसे आम लोगों को कीड़े-मकोड़े समझने लगते
हैं।\” दीनदयाल बोले, “भई, मैं तो अभी भी आम हूँ और मुझे खास बनने में कोई दिलचस्पी नहीं
है। मैं तो केवल देशसेवा कर रहा हूँ। हम सभी को देशसेवा करनी चाहिए। सभी देश से प्रेम जो
करते हैं।\” उनके यह सुनते ही सभी युवक उनसे मिलने के लिए आतुर हो उठे। तभी दीनदयाल
एक बुजुर्ग महिला की ओर देखते हुए बोले, “दादी, मुझे उड़द की दाल की खिचड़ी नहीं
खिलाओगी? तुम्हें मालूम है न कि तुम्हारे दीना को उड़द की दाल बहुत पसंद है?\” यह सुनते ही
वृद्धा पुलकित होकर बोली, “जरूर बेटा, अपने दीना को मैं खिचड़ी जरूर खिलाऊँगी। चलो,
मेरे साथ घर चलो।\”
दीनदयालजी की सादगी को देखकर एक युवक बोला, \”काश! हम सब भी दीना जैसी सादगी
के साथ रहना सीख पाएँ तो हमारा जीवन सफल हो जाए।\”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *