
श्री प्राँजल शुकुल
अपनी समस्या को लेकर विरोध प्रदर्शन करना व्यक्ति का मूलभूत अधिकार है। विरोध प्रदर्शन करके अपनी बात रखना तथा उसका समाधान सुनिश्चित करना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अंग है।
परंतु यही विरोध प्रदर्शन विरोधाभासी तब बन जाता है जब इसमें ऐसे लोग बड़ी संख्या में सम्मिलित हो जाते हैं जिनका मूल समस्या से कोई विशेष लेना देना नहीं हो।
ऐसे लोग जिनका समस्या से संबंध नही है तो उनकी समाधान में क्या ही रुचि होगी।
NEET परीक्षा के विषय में यही बात लागू होती है।
पेपर लीक होने से लेकर पुनः परीक्षा के होने तक हम सभी के मन में व्यवस्थागत खामियों को लेकर क्षोभ था।विद्यार्थियों के साथ अभिभावकों को भी चिन्ता थी कि इतनी महत्वपूर्ण परीक्षा में इतनी भारी चूक कैसे हो गयी और भविष्य में यह ना हो इसे लेकर सरकार तथा परीक्षा प्रशासक कितने गंभीर हैं।
भारतीय समाज के अंदर तक सहनशीलता का गहरा भाव विध्यमान है और यहां का बहुसंख्य समाज अपनी जायज मांगो को मनवाने के लिए धैर्यपूर्वक संघर्षशील रहता है और रहता भी आया है।
परंतु NEET पेपर लीक को लेकर जैसे ही काॅकरोच पार्टी का नाम आया तब ही अधिकांश सभ्य समाज के लोगों ने समझ लिया कि इतनी महत्वपूर्ण समस्या की आड़ में कतिपय गिरोहों ने इसे hijack कर लिया है।
पहली बात तो यह कि कोई भी आत्मसम्मान रखने वाला विद्यार्थी या अभिभावक अपने को कॉकरोच कहलाना कतई स्वीकार नहीं करेगा।
दूसरा यह कि इसके संस्थापक तथा सहयोगियों का NEET अथवा भारतीय शिक्षा प्रबंधन से कोई लेना देना ही नहीं था।
तीसरी बात यह थी कि NEET के माध्यम से अपना कैरियर बनाने की आकांक्षा लिए serious students पुनः परीक्षा की तैयारी में जुट गये। अब तो परीक्षा का परिणाम आ भी गया है और अपने परिश्रम से अर्जित rank के अनुसार वे सभी admission व counselling की प्रक्रिया में busy हो गये हैं।
तो अब प्रश्न यह उठता है कि विगत माह दो माह से वो कौन लोग हैं जो इसे लेकर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं? क्या इनमें से किसी का भी NEET , JEE , CBSE से कुछ भी लेना देना है ?
और तो और जंतर-मंतर में जो तमाशा चल रहा था वो देखने में ही non serious type दिखता था तथा वहां हो रहे भाषण एवं चर्चाओं में मूल विषय से सरोकार भी नजर नहीं आता था। अधिकांश VIP visitors , वक्ता , तमाशाई तथा गिने चुने धरना कर्ताओं का प्रायोजन सरकार विरोध से लेकर भारतीय संस्कृति के विरोध तक सीमित रहा। किसी ने भी कोई ऐसा formula या detailed कार्य योजना पर ना तो कोई योजना प्रस्तुत की और ना ही इसे लेकर कोई चिंतन प्रक्रिया सामने आई।
अगर समस्या बड़ी हो तो समाधान भी बड़ा ही होना चाहिए। समाधान पर विचार करने वाला समूह भी बड़े स्तर के विद्वानों का होना चाहिए। समाधान प्राप्त करने के लिए ज्ञान,बुद्धि,विवेक तथा धैर्य का होना तो नितांत आवश्यक होता ही है साथ ही इसके नेतृत्व कर्ताओं का track record भी असंदिग्ध होना चाहिए।
विडम्बना यही है कि जंतर-मंतर में पहले दिन से anti-establishment छू-मंतरी मदारियों का स्पष्ट प्रभाव दिखाई दिया। यहीं से यह आदोलन वास्तविक रूप में de-rail हो गया।
20 जुलाई आते आते NEET पेपर लीक से प्रभावित बच्चे और उनके परिवार भविष्य के academics में व्यस्त हो गये और वहां जंतर-मंतर में ulterior motives लिए आंदोलन-जीवी अपना चोला उतार फेंक उनके वास्तविक urban-naxals के हिंसक स्वरूप में सुरक्षा बलों पर तथा सार्वजनिक संपत्तियों पर टूट पड़े।
उनका यथोचित इलाज हुआ और बड़े अच्छे से हुआ। और जैसे जैसे evidence आएंगे तो दरारों में छिपे बड़े तिलचट्टों की भी शल्य चिकित्सा होगी इसमें संदेह नहीं।
140 करोड़ के देश में दो पांच हजार उपद्रवी अगर यह दिवास्वप्न लेकर बैठे हैं कि यहां भी श्रीलंका-बंग्लादेश-नेपाल जैसे हालात निर्मित करने में सफल हो जाएंगे तो यह उनकी तथा उनके पालन-कर्ताओं की बड़ी भूल है।
यह हमारा देश है , यह हमारी मातृभूमि है – इसका प्रत्येक कण हमारे लिए पूज्यनीय है। हमारे पूर्वजों ने हजार वर्ष संघर्ष करके भी हमारी सांस्कृतिक चेतना , हमारा मूल धर्म और हमारा स्वाभिमान बचाए रखा – हम इसे कुछ मुठ्ठीभर स्वार्थी तत्वों और उनके भूखे आकाओं की लोलुपता के हवाले नहीं होने देंगे और ना ही अपनी होनहार युवा पीढ़ी को इनके मायावी जाल में फंसने देंगे।
उन्हे गुमराह नहीं होने देंगे।
हमारी समस्या का हल हम अपने विवेक से , अपने साहस एवं परिश्रम से निकाल ही लेंगे।
संघर्ष करेंगे पर धैर्यपूर्वक करेंगे।
समाधान प्राप्त करेंगे पर अराजकता से नहीं।
अपने भारत के उत्कर्ष में मेरा भी योगदान होगा।
मेरा आत्मगौरव मेरे भारत के गौरव से जुड़ा है।
॥ राष्ट्र सर्वोपरी ॥