
न्यूयॉर्क से विश्व को भारत का संदेश : एकात्मता, समरसता और वसुधैव कुटुम्बकम्
शुभानन मधुसूदन खेमरिया
(युवा लेखक एवं स्तंभकार)
न्यूयॉर्क की पहचान आधुनिक विश्व गति, तकनीक, अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रभाव के केंद्र के रूप में होती है। गगनचुंबी इमारतों और महानगरीय जीवन की इस चकाचौंध के बीच जब भारत की हजारों वर्ष पुरानी सांस्कृतिक चेतना का स्वर सुनाई देता है, तब वह केवल किसी व्यक्ति का संबोधन नहीं रहता, बल्कि एक सभ्यता का संवाद बन जाता है। परमपूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का न्यूयॉर्क प्रवास इसी दृष्टि से एक महत्वपूर्ण अवसर बनकर सामने आया।
यह प्रवास केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं था। इसमें भारतीय अमेरिकी समाज और युवाओं के साथ संवाद, उद्योग एवं प्रौद्योगिकी जगत के लोगों से चर्चा, न्यूयॉर्क के ऐतिहासिक इस्कॉन केंद्र का दर्शन, सेवा गतिविधि में सहभागिता, विभिन्न मत पंथों के प्रतिनिधियों के साथ ‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ के मंच पर संवाद और अंततः मैडिसन स्क्वायर गार्डन में ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ के माध्यम से हजारों लोगों तक भारतीय चिंतन का संदेश पहुंचाना शामिल रहा।
इन सभी गतिविधियों को अलग अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय यदि एक सूत्र में देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि इस पूरे प्रवास के केंद्र में भारतीयता की एकात्म दृष्टि और विश्वबंधुत्व का भाव था।
भारत की विशेषता यह नहीं कि यहां सब एक जैसे हैं। भारत की विशेषता यह है कि यहां भिन्नताओं के बीच भी एकता का अनुभव किया गया। भाषाएं अनेक हैं, पर भाव एक है। पूजा पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन जीवन को देखने की व्यापक दृष्टि मनुष्य को जोड़ती है। वेशभूषा, खान पान और परंपराओं में विविधता है, फिर भी भारत की सांस्कृतिक चेतना उन्हें एक सूत्र में पिरोती आई है।
परमपूज्य सरसंघचालक जी ने न्यूयॉर्क में इसी भारतीय अनुभव को विश्व के सामने रखते हुए कहा कि एकता और विविधता भारत के डीएनए में हैं। यह केवल भाषण का प्रभावशाली वाक्य नहीं, बल्कि भारत के हजारों वर्षों के सांस्कृतिक अनुभव का सार है।
संवाद से प्रारंभ हुई यात्रा
न्यूयॉर्क प्रवास का एक महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय अमेरिकी समुदाय, युवाओं और उद्योग जगत के साथ संवाद रहा। भारत की युवा शक्ति, तकनीक, निवेश, नवाचार और भारत अमेरिका संबंधों जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
यह अपने आप में भारत के बदलते वैश्विक स्वरूप का परिचय है। भारत अपनी परंपरा को लेकर आत्मविश्वासी है, लेकिन वह भविष्य से आंखें नहीं चुराता। वह आधुनिक विज्ञान, तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए भी अपने सांस्कृतिक मूल्यों को अपनी शक्ति का आधार मानता है।
भारतीय चिंतन में ज्ञान और कर्म कभी अलग नहीं रहे। ज्ञान का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण में उसकी सार्थक अभिव्यक्ति है। आज भारत का युवा इसी समन्वय का प्रतिनिधि बन सकता है। हाथ में आधुनिक तकनीक और हृदय में भारतीय संस्कार।
इस्कॉन में साधना के साथ सेवा का संदेश
न्यूयॉर्क प्रवास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव ऐतिहासिक इस्कॉन केंद्र रहा। परमपूज्य सरसंघचालक जी ने वहां पहुंचकर कृष्ण चेतना और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से जुड़े विषयों पर संवाद किया। उन्होंने सेवा गतिविधि के अंतर्गत जरूरतमंद लोगों के लिए भोजन वितरण में भी सहभागिता की।
यह दृश्य भारतीय संस्कृति के मूल स्वभाव को समझने के लिए पर्याप्त है। भारत में साधना और सेवा अलग अलग मार्ग नहीं हैं। हमारे यहां ईश्वर की आराधना का एक स्वाभाविक विस्तार समाज की सेवा में दिखाई देता है।
‘नर सेवा नारायण सेवा’ का भाव इसी भारतीय दृष्टि से निकलता है। मनुष्य में ईश्वर का अंश देखने वाला समाज किसी पीड़ित, वंचित या जरूरतमंद व्यक्ति के प्रति उदासीन कैसे रह सकता है?
इस्कॉन की भूमि पर कृष्ण चेतना और सेवा का यह संगम भी मानो उसी भारतीय संदेश को पुष्ट कर रहा था कि आध्यात्मिकता जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन को अधिक सार्थक बनाने की प्रेरणा है।
वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी : विविधता में एकात्मता
इसके बाद न्यूयॉर्क में ‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ के मंच पर विभिन्न धार्मिक और सामुदायिक परंपराओं के प्रतिनिधियों के साथ संवाद हुआ। यहां परमपूज्य सरसंघचालक जी ने मानवता की एकता और विविधताओं के सम्मान की भारतीय दृष्टि को सामने रखा।
यही भारतीयता की सबसे बड़ी विशेषता है।
भारत ने विविधता को मिटाने का प्रयास नहीं किया। उसने विविधता को स्वीकार किया, उसका सम्मान किया और उसे एक व्यापक सांस्कृतिक एकता के भीतर स्थान दिया। भारतीय चिंतन में एकता का अर्थ एकरूपता नहीं है।
एकता का अर्थ है अलग अलग होते हुए भी एक दूसरे से जुड़े रहना।
आज विश्व इसी प्रश्न से जूझ रहा है। अपनी पहचान की रक्षा करते करते मनुष्य दूसरे की पहचान को नकारने लगता है। संस्कृति की रक्षा के नाम पर संघर्ष खड़ा हो जाता है। मतभेद संवाद की जगह टकराव का कारण बन जाते हैं।
ऐसे समय में भारतीय दृष्टि कहती है कि अपनी पहचान को सुरक्षित रखिए, लेकिन दूसरे की पहचान का भी सम्मान कीजिए।
इसी व्यापक हिंदू दृष्टि को स्पष्ट करते हुए परमपूज्य सरसंघचालक जी ने कहा कि यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह सकता। हिंदू चिंतन मानवता की एकता और प्रत्येक मनुष्य की गरिमा को स्वीकार करता है।
यह कथन भारतीय संस्कृति की समावेशी चेतना को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी है।
मैडिसन स्क्वायर गार्डन : विश्व मंच पर भारतीय चिंतन
न्यूयॉर्क प्रवास का सबसे व्यापक सार्वजनिक पड़ाव रहा मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’।
विश्व के सबसे प्रसिद्ध सार्वजनिक स्थलों में से एक पर हजारों भारतीय अमेरिकियों की उपस्थिति में भारतीय एकात्म दृष्टि का यह उद्घोष अपने आप में महत्वपूर्ण था। कार्यक्रम से 200 से अधिक हिंदू अमेरिकी संगठनों के जुड़ने और लगभग पांच हजार लोगों की उपस्थिति की जानकारी सामने आई। कार्यक्रम की केंद्रीय भावना ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ रही।
यह दृश्य केवल संख्या का विषय नहीं था। इसके पीछे एक विचार था।
न्यूयॉर्क जैसे वैश्विक नगर में भारत की ओर से यह कहना कि संसार केवल राष्ट्रों का समूह नहीं, बल्कि परस्पर जुड़े मनुष्यों का परिवार भी है। यह भारतीय सभ्यता के वैश्विक योगदान की पुनर्स्मृति है।
परमपूज्य सरसंघचालक जी ने कहा कि भारत की एकता और विविधता उसके डीएनए में हैं। उन्होंने अमेरिका की बहुलतावादी परंपरा और भारत की ‘विविधता में एकता’ की अवधारणा के बीच भी एक संवाद स्थापित किया।
भारत के लिए यह कोई नया विचार नहीं है। हजारों वर्षों से यहां यह स्वीकार किया गया कि सत्य की अनुभूति के मार्ग अनेक हो सकते हैं, लेकिन मनुष्य की मूल गरिमा एक है।
धर्म : केवल पूजा नहीं, जीवन का संतुलन
परमपूज्य सरसंघचालक जी के संबोधन में धर्म की भारतीय अवधारणा भी महत्वपूर्ण रही। भारतीय संदर्भ में धर्म का अर्थ केवल किसी विशेष पूजा पद्धति या संप्रदाय से नहीं है। धर्म वह जीवन सिद्धांत है जो व्यक्ति, समाज और व्यापक सृष्टि के बीच संतुलन स्थापित करता है।
आज विश्व में विकास की गति बहुत तेज है, लेकिन क्या विकास के साथ संतुलन भी बढ़ रहा है?
यदि व्यक्ति आगे बढ़े और समाज पीछे छूट जाए, यदि समाज समृद्ध हो और प्रकृति नष्ट हो जाए, यदि भौतिक सुविधाएं बढ़ें लेकिन मनुष्य भीतर से असंतुष्ट रहे, तो क्या इसे पूर्ण विकास कहा जा सकता है?
भारतीय दृष्टि इन प्रश्नों का उत्तर समग्रता में खोजती है। व्यक्ति, समाज और पर्यावरण तीनों साथ आगे बढ़ें। परमपूज्य सरसंघचालक जी ने भी इसी संतुलन पर बल दिया।
यह विचार आज केवल भारत के लिए नहीं, पूरी मानवता के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रवासी भारतीय : जन्मभूमि के संस्कार, कर्मभूमि का कर्तव्य
न्यूयॉर्क में भारतीय मूल के लोगों से संवाद करते हुए कर्मभूमि के प्रति निष्ठा का संदेश भी विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा।
भारतीयता का अर्थ यह नहीं कि विदेश में रहने वाला भारतीय अपनी कर्मभूमि के प्रति अपने दायित्वों को भूल जाए। बल्कि भारत से प्राप्त संस्कार उसे जहां भी रहे, वहां ईमानदारी, कर्तव्य और सेवा के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।
परमपूज्य सरसंघचालक जी ने भारतीय अमेरिकियों को अमेरिका के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाने और वहां सच्चाई एवं निष्ठा से योगदान देने की बात कही। साथ ही भारत से मिले मूल्यों को अपने जीवन में बनाए रखने को महत्वपूर्ण बताया।
यही भारतीयता की परिपक्व अभिव्यक्ति है। जड़ों से जुड़े रहना और वर्तमान कर्मभूमि के प्रति पूर्ण उत्तरदायित्व निभाना।
‘मैं’ से ‘हम’ और ‘हम’ से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’
आधुनिक सभ्यता ने मनुष्य को अनेक सुविधाएं दी हैं, लेकिन उसके सामने एक चुनौती भी खड़ी की है। व्यक्ति का बढ़ता अकेलापन।
भारतीय दर्शन मनुष्य को केवल ‘मैं’ तक सीमित नहीं रखता। वह उसे परिवार से जोड़ता है, समाज से जोड़ता है, राष्ट्र से जोड़ता है और अंततः समस्त सृष्टि से जोड़ देता है।
यही यात्रा है।
मैं से हम।
हम से समाज।
समाज से राष्ट्र।
और राष्ट्र से समस्त मानवता।
इसी भाव का अंतिम विस्तार है।
“वसुधैव कुटुम्बकम्।”
अर्थात पूरी पृथ्वी एक परिवार है।
यह केवल शास्त्र का सुंदर वाक्य नहीं है। यह मानवता के भविष्य के लिए एक जीवन दृष्टि है।
न्यूयॉर्क से विश्व के लिए भारत का संदेश
परमपूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का न्यूयॉर्क प्रवास इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें भारतीयता के अनेक आयाम एक साथ दिखाई दिए।
युवाओं से संवाद। भविष्य का भारत।
उद्योग जगत से संवाद। आधुनिक भारत।
इस्कॉन में उपस्थिति। आध्यात्मिकता और सेवा।
‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’। मानवता की एकता।
मैडिसन स्क्वायर गार्डन। विश्व मंच पर भारतीय एकात्म दृष्टि।
प्रवासी भारतीयों से संवाद। जन्मभूमि के संस्कार और कर्मभूमि के कर्तव्य का संतुलन।
इन सभी को जोड़ने वाला एक ही सूत्र है। एकात्मता।
भारत दुनिया को यह नहीं कहता कि सभी एक जैसे बन जाएं। भारत कहता है कि विविधता के बीच भी आत्मीयता संभव है। मत अलग हो सकते हैं, मार्ग अलग हो सकते हैं, जीवन पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन मनुष्य की मूल गरिमा और मानवता का भाव सबको जोड़ सकता है।
आज जब दुनिया विभाजन, संघर्ष और अविश्वास की चुनौतियों से गुजर रही है, तब भारत की यह दृष्टि और अधिक प्रासंगिक हो जाती है।
वसुधैव कुटुम्बकम् इसलिए केवल भारत की प्राचीन उक्ति नहीं, बल्कि भविष्य की विश्वव्यवस्था के लिए एक संभावित मार्गदर्शन है।
उपनिषदों का उद्घोष है।
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
संकीर्ण मन अपना और पराया देखता है। उदार चरित्र के लिए पूरी पृथ्वी परिवार है।
न्यूयॉर्क में इसी भारतीय चेतना का एक नया वैश्विक परिचय सामने आया।
यह किसी एक मंच का संदेश नहीं था। यह भारत की उस सनातन यात्रा का अगला पड़ाव था जिसमें भारत स्वयं से निकलकर विश्व को अपना मानता है, लेकिन विश्व पर अपना विचार थोपता नहीं। वह संवाद करता है, जोड़ता है और आत्मीयता का मार्ग दिखाता है।
न्यूयॉर्क की धरती से उठी यह आवाज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह आधुनिक विश्व के बीच भारत की प्राचीन आत्मा की पहचान कराती है।
विविधता हमारी शक्ति है।
एकात्मता हमारी चेतना है।
सेवा हमारा संस्कार है।
कर्तव्य हमारा मार्ग है।
और वसुधैव कुटुम्बकम् हमारा विश्व संदेश।
यही भारतीयता का परिचय है।
और यही न्यूयॉर्क से हुआ वह विश्वबंधुत्व का शंखनाद, जिसकी प्रतिध्वनि भारत की सीमाओं से बहुत दूर तक सुनाई देती है।