
उज्जैन के गीता भवन में 3 दिवसीय ‘युवा धर्म संसद-2026 अवन्तिका’ का भव्य शुभारम्भ हुआ। आरएसएस सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि धर्म केवल धार्मिक अनुष्ठानों या वृद्धावस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन भर आचरण और कर्तव्यों का मार्गदर्शन करता है।
उज्जैन: सेवाज्ञ संस्थानम् के राष्ट्रीय उपक्रम ‘युवा धर्म संसद-2026 अवन्तिका’ के तीन दिवसीय आयोजन का भव्य शुभारंभ उज्जैन के गीता भवन में हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने ‘युवा धर्म संसद अवंतिका’ का विधिवत उद्घाटन किया। इस अवसर पर सेवाज्ञ संस्थानम् के संरक्षक आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी तथा संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष आशीष कुमार आशु सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। युवा धर्म संसद में देशभर के 25 राज्यों से आए लगभग 1600 युवा प्रतिभागी तथा 300 से अधिक शिक्षाविद, शोधकर्ता एवं धर्माचार्य शामिल होकर धर्म, संस्कृति, शिक्षा, तकनीक, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र निर्माण से जुड़े विषयों पर संवाद कर रहे हैं।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात स्वामी विवेकानंद एवं भारत माता के चित्र पर माल्यार्पण किया गया और राष्ट्रगीत के साथ उद्घाटन सत्र की औपचारिक शुरुआत हुई। स्वागत वक्तव्य में आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण ने युवाओं को आत्मनिर्माण और भारत-बोध का संदेश देते हुए कहा कि अपने से नीचे को जीतने में वास्तविक विजय नहीं है, बल्कि जो आपसे उच्च है, उसे सिद्ध करने में विजय है। उन्होंने कहा कि भारतीय युवा केवल युवा होने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने निर्माण के साथ भारत को पहचानें। युवाओं के प्रश्नों में स्वयं युवा उपस्थित रहें और अपने प्रश्नों को बाजार, राजनीति अथवा अन्य बाहरी परिदृश्यों से प्रभावित होने के बजाय अपनी आत्मचेतना और जीवन-मूल्यों से जोड़कर देखें।
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने युवाओं को भारत की ज्ञान परंपरा और आत्मबोध से जोड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि युवाओं को ‘इंडिया से भारत’ की ओर ले जाने वाली चेतना के साथ आत्मवान बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी के भीतर आत्मविश्वास, ज्ञान और भारतीय दृष्टि का विकास ही समाज और राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।
उद्घाटन सत्र का मुख्य आकर्षण सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का युवाओं को संबोधन रहा। उन्होंने धर्म को केवल वृद्धावस्था या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित मानने की धारणा को अस्वीकार करते हुए कहा कि धर्म का विचार युवावस्था से ही शुरू होना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म जीवन के प्रारंभ से अंत तक मनुष्य के आचरण और निर्णयों को दिशा देने वाला तत्व है। उनके अनुसार, सुख-दुख आते-जाते रहते हैं, लेकिन धर्म नित्य रहता है और मनुष्य के जीवन में उसके कर्तव्यों, आचरण और उत्तरदायित्व को निर्धारित करता है।
डॉ. भागवत ने धर्म और ‘रिलीजन’ के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि धर्म को केवल ‘रिलीजन’ के अर्थ में समझना उचित नहीं है। उन्होंने धर्म को ‘धृ’ धातु से जोड़ते हुए बताया कि इसका अर्थ ‘धारण करना’ है। उनके अनुसार, धर्म व्यक्ति और समाज को जोड़ने, उन्हें बिखरने से बचाने तथा निरंतर उन्नति की ओर ले जाने वाला अनुशासन है। उन्होंने कहा कि धर्म जीवन से दूर जाने या सब कुछ छोड़ देने का नाम नहीं है, बल्कि भौतिक जीवन के साथ आध्यात्मिक उन्नति और सामाजिक उत्तरदायित्व का संतुलन स्थापित करने की दृष्टि है।
युवाओं से संवाद करते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि मनुष्य प्रकृति की दृष्टि से अत्यंत सीमित क्षमताओं वाला प्राणी होते हुए भी अपनी बुद्धि के बल पर सृष्टि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सका है। इसलिए उस पर सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व भी है। उन्होंने युवाओं को जीवन में परिश्रम और आर्थिक प्रगति के साथ सामाजिक जिम्मेदारी निभाने का संदेश देते हुए कहा कि मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ दूसरों के हित और कल्याण का भी ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने सत्य, करुणा, शुचिता और तप को मानवीय धर्म के महत्वपूर्ण आधारों के रूप में रेखांकित किया।
उन्होंने धर्म को दैनिक जीवन के सामान्य आचरण से जोड़ते हुए कहा कि धर्म केवल बड़े-बड़े सिद्धांतों और व्याख्यानों तक सीमित नहीं है। भोजन के बाद कचरा न फैलाना, यातायात के नियमों का पालन करना, दूसरों को कष्ट न देना, अपने कर्तव्यों का पालन करना और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी धर्म का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक स्वरूप पुस्तकों को पढ़ने या उसके बारे में बोलने से अधिक उसके व्यवहार में उतरने से प्रकट होता है।
उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि व्यक्तिगत सफलता को व्यापक सामाजिक सफलता से जोड़कर देखा जाए। व्यक्ति की जीत तभी सार्थक है, जब उसकी जीत में दूसरों की भी जीत शामिल हो। उन्होंने युवाओं को ज्ञान, दान और दुर्बलों के संरक्षण की भावना के साथ आगे बढ़ने का संदेश दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि अपनी उपासना और परंपरा के प्रति दृढ़ रहते हुए अन्य उपासनाओं के प्रति सम्मान रखना भी भारतीय जीवन-दृष्टि का महत्वपूर्ण पक्ष है।
उल्लेखनीय है कि सेवाज्ञ संस्थानम् के संरक्षक आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण के मार्गदर्शन में आयोजित युवा धर्म संसद का यह छठा संस्करण है। इससे पूर्व काशी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार और कांचीपुरम में इसके आयोजन हो चुके हैं। आयोजन का उद्देश्य युवाओं को भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति, धर्म, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र निर्माण के प्रश्नों पर विचार करने के लिए एक राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराना है।
युवा धर्म संसद के छठे संस्करण में देश के 25 राज्यों से आए लगभग 1600 युवा प्रतिभागियों और 300 से अधिक शिक्षाविदों की भागीदारी इसे राष्ट्रीय स्तर का व्यापक युवा संवाद बना रही है। तीन दिवसीय आयोजन में धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा एवं चारित्रिक उत्तरदायित्व, भारतीय संस्कृति, शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीक, सूचना एवं विचार का संघर्ष, मानवीय मूल्य तथा राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका जैसे समसामयिक विषयों पर विभिन्न सत्रों में संवाद और मंथन किया जा रहा है।




