मरु केसरी वीर दुर्गादास राठौड़

एम.एक्स. प्लेयर पर हाल ही में छत्रसाल नाम की एक वेबसीरीज आई है, उसमें औरंगजेब परेशान होकर अपने मंत्री से कहता है कि लगता है भारत विजय का मेरा सपना कभी पूरा नहीं हो पायेगा, दक्खन में शिवाजी, पंजाब में तेगबहादुर, राजस्थान में दुर्गादास राठौड़ और बुन्देलखंड में छत्रसाल ने जैसे हमें दिल्ली में कैद कर दिया है।
औरंगजेब ने जब यह बात कही तो दुर्गादास राठौड़ नाम सुनकर आश्चर्य होता है। ऐसा कौन सा व्यक्ति है जो छत्रपति शिवाजी, गुरू तेगबहादुर जैसों के समकक्ष था, जिससे औरंगजेब डरता था और इससे ज्यादा आश्चर्य उनके बारे में पढ़ते समय तब हुआ जब पता चला कि यदि दुर्गादास नहीं होते तो हमें राणा प्रताप नहीं मिल पाते, और उनके जीवन का अंत उज्जैन में हुआ, जो महान चरित्र जीवन भर राजस्थान की आन के लिए जिया उसने अंत में बाबा महाकाल को अपना सर्वस्व क्यों दे दिया। प्रश्न तो यह भी है कि कितने लोग उनके बारे में जानते हैं और पढ़ने पर निष्कर्ष यह निकला कि दुर्गादास भी उन्हीं के षड्यंत्र के शिकार हुए जिनकी भोपाल की रानी कमलापती हुईं।
क्योंकि बाकी देश को तो छोड़ो, उज्जैन में जहां क्षिप्रा तट पर उनकी छतरी बनी हुई है, उस बस्ती के लोगों को भी नहीं पता कि दुर्गादास राठौड़ कौन हैं। तो आज हम आपको दुर्गादास रूपी महाकाव्य की छोटी सी झलक दिखाएँगे।

  • पूत के लक्षण पालने में ………..
    दुर्गा अपने खेत में था, फसल देखकर खुश हो रहा था, तभी कुछ ऊंट उसके खेत में घुसे, दुर्गा ने देखा और उन्हें भगाने लगा, तो ऊंटों के चरवाहों, जिन्हें राइके कहते हैं, ने दुर्गदास को कहा तू जानता नहीं ये महाराजा जसवंतसिंह के शाही घोड़े हैं, इस पर दुर्गादास ने कहा कि हैं तो क्या करूं, राजा के घोड़े होने का मतलब ये तो नहीं कि मेरी फसल बर्बाद करें, किन्तु राइके नहीं माने, वे दुर्गादास को धक्का मारते हुए आगे बढ़े। दुर्गादास ऊंटों को फसल खाने से रोकने लगा तो एक राइको का मुखिया उसे मारने दौड़ा और शाही राइका होने के घमंड में उसने दुर्गादास पर तलवार से वार कर दिया, दुर्गादास पीछे हटा, चारों ओर से राइकों ने उसे घेर लिया था, तभी दुर्गादास हवा में उछला और बगल में रखी तलवार को निकाला और मुखिया पर वार किया तो मुखिया की गर्दन बहुत दूर खेत में जाकर गिरी। फसल लाल हो गई थी और दुर्गादास का मुख भी महिषासुरमर्दिनी दुर्गा के सामान लाल हो गया था, दुर्गादास के इस रौद्र स्वरूप को देखकर बाकी राइके भी जान बचाकर भाग गये। बात महल तक पहुंची, महाराज ने दुर्गा को पकड़ने के लिए सैनिक भेजे, दुर्गादास को दरबार में पेश किया गया।
    नाम क्या है तुम्हारा? सिंहासन से जसवंतसिंह की आवाज आई।
    दुर्गादास राठौड़।
    उम्र?
    17 वर्ष।
    गाँव?
    लुनावा।
    पिता का नाम?
    कोई जवाब नहीं।
    जसवंतसिंह ने फिर कहा पिता का नाम क्या है?
    दुर्गादास ने जैसे बेमन से कहा श्री आसकरण राठौड़।
    कहाँ के? जवाब था सालवा के।

दरअसल दुर्गादास के पिता आसकरण, जसवंतसिंह के प्रधान थे और उन्होंने दुर्गादास और उनकी माँ को अलग कर दिया था, जिसके कारण दुर्गादास के मन में उनके प्रति कुछ रोष था।
खैर राजा ने आगे पूछा, क्या तूने राइकों को मारा?
दुर्गादास ने कहा हाँ हुजूर! वो मेरी फसल उजाड़ रहे थे। शाही राइके होने के अभिमान में प्रजा पर अन्याय कर रहे थे। अन्याय का प्रतिकार करना हमारा धर्म है और मैंने अपने धर्म का पालन किया है। अन्नदाता! आप इस पर मुझे जो सजा दें मुझे स्वीकार है।

राजा जसवंतसिंह, दुर्गादास के देशप्रेम, क्षात्रधर्म, निर्भीकता और स्वीकार करने के गुणों से प्रभावित हुए, उन्होंने कहा- तो जो सजा देंगे वो स्वीकार करोगे?
दुर्गादास ने कहा जी हुजूर!
महाराज ने कहा ठीक है आज से तुम हमारे अंगरक्षक के रूप में काम करोगे, बोलो स्वीकार है तुम्हें?
दुर्गादास के मुंह में शब्द नहीं आ पा रहे थे, वे राजा के चरणों में गिर गये, महाराज ने आगे बढ़कर उठाया और अपने प्रधान और दुर्गादास के पिता आसकरण की ओर देखकर बोले, ‘यह लड़का एक दिन मरूधरा का रक्षक बनेगा।‘

मारवाड़ का मुकुट,जोधपुर का किला
  • मारवाड़ का सूर्याेदय

दुर्गादास अपनी देशभक्ति, रणकौशल और बुद्धिमत्ता के कारण जसवंतसिंह के विश्वस्त होते जा रहे थे। अंगरक्षक से उनको राजा का सलाहकार बना दिया गया और उन्हें पांच गाँवों की जागीर दी गई।
राजा को जिस एक सलाह पर दुर्गादास में सलाहकार के गुण दिखे ,,,वह सलाह जो न केवल मारवाड़ बल्कि भारत के इतिहास में दुर्गादास को महान बना देती है, उसे भी सुनिए।
महाराज जसवन्तसिंह ने दुर्गादास को बुलाया और पूछा ‘दुर्गा! दिल्ली में शाहजहां के चारों बेटों में गद्दी के लिए संघर्ष चल रहा है, किसका साथ देना चाहिए?
दुर्गादास का स्पष्ट जवाब था, ‘अन्नदाता! मुझे तो चारों ही एक जैसे लगते हैं, कोई भी बादशाह बने ,,,,,,,,,,अपना देश तो पराधीन ही रहेगा, हिन्दुओं पर अत्याचार तो होते ही रहेंगे। लेकिन हाँ, इनमें दाराशिकोह कुछ कम है तो हम उसका साथ दे सकते हैं और दूसरी ओर हमें राठौड़ों, मेवाड़ियों, मराठों तथा देश की बाकी बिखरी शक्तियों को एक करके, मुगलों के विरुद्ध विद्रोह की तैयारी भी करते रहना चाहिए।
जसवंतसिंह ने दुर्गादास की बात मानी। सन् 1657 में दाराशिकोह के पक्ष में, दक्षिण से आ रहे औरंगजेब को रोकने के लिए जसवन्तसिंह और दुर्गादास सेना सहित उज्जैन आये, यहीं धरमत गाँव में भयंकर युद्ध हुआ। बड़ी मुश्किल से औरंगजेब जीता, लेकिन वह जसवन्तसिंह और दुर्गादास के महत्व को समझ गया। दोस्ती का हाथ बढ़ाया, दोस्ती की आड़ में राजा जसवंतसिंह को मारना चाहता था, किन्तु दुर्गादास दुष्ट मुगलों की हरकतों को जानते थे इसलिए औरंगजेब कभी भी जसवंतसिंह का कुछ नहीं बिगाड़ पाया।

माँ गोरा धाय टाक
  • जीवन दीप जला कुलदीपक की रक्षा की

किसी अभियान को लेकर जसवंतसिंह, दुर्गादास, अन्य सरदार और सेनाएं काबुल तक, जो अब अफगानिस्तान में है, पहुंच गये थे। राजा की उम्र बढ़ रही थी, मौत सामने थी, ऊपर से यह विकट समस्या कि सन्तान पैदा होती थीं और मर जाती थीं, उत्तराधिकारी नहीं होने पर मुगल राज्य हथिया लेते थे।
जसवंतसिंह ने दुर्गादास से सभी सरदारों को अपने पास बुलाने को कहा। सब आये तो राजा ने कहा, ‘मृत्यु सम्मुख है, दोनों रानियां गर्भवती हैं, राज्य पर मुगलों की गिद्ध-दृष्टि है, आप सबसे विनती है कि मरूधरा के मुकुट का रक्षण करें।‘
सभी सरदारों ने अपनी तलवारें निकालीं और प्रतिज्ञा ली कि हम सभी मारवाड़ के मुकुट की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाज़ी लगा देंगे। इसके बाद 28 नवम्बर 1678 को जसवंतसिंह ने प्राण त्याग दिए। फिर दुर्गादास ने रानियों को उत्तराधिकारयों के जन्म और मारवाड़ के भविष्य के बारे में बताकर प्राणोत्सर्ग करने से रोका, सती होने से रोका, उन्हें उनकी सुरक्षा का वचन दिया।
कुछ महीनों बाद महारानी जादव जी जसकंवर ने अजीतसिंह और नरुकी जी ने दलमंथन को जन्म दिया। लेकिन दुष्ट औरंगजेब कुलदीपकों को जलने से पहले ही बुझाना चाहता था। एक घुड़सवार उसका पत्र लेकर आया, कहा पत्र में औरंगजेब ने दोनों राजकुमारों के जन्म के जश्न को उसके महल में मनाने की बात कही, क्योंकि दोनों राजकुमारों को बुलाकर वह उन्हें मारना चाहता था। दुर्गादास सावधानी के साथ दिल्ली के लिए निकले, इधर औरंगजेब ने जोधपुर किले पर कब्जा कर लिया। जोधपुर किले के देशभक्त पंचोली के श्रीसिंह ने बलिदान दे दिया पर खजाने का पता नहीं बताया।
रास्ते में राजकुमार दलमंथन की बीमारी से मौत हो गयी, सब टूट से गये, दुर्गादास ने सबमें उत्साह जगाया। 1679 की 18 अप्रेल को दल दिल्ली पहुंचा, औरंगजेब ने सरदारों में फूट डालने की कोशिश की लेकिन देशभक्त नहीं माने। फिर दुर्गादास को भी राज्य का मोह दिखाया और कहा कि दुर्गादास तुम जोधपुर के राजा बन जाओ और मुझे अजीतसिंह को सौंप दो।
दुर्गादास इसका अर्थ समझ गया था, तुरंत सरदारों को बुलाकर अजीतसिंह को बाहर निकालने पर चिन्तन होने लगा, लेकिन कैसे निकालें यह बहुत कठिन था। किन्तु इतिहास फिर से दोहराया गया जैसे धाय पन्ना ने उदयसिंह को बचाने के लिए स्वयं के बेटे का बलिदान किया था ऐसे ही अजितसिंह को बचाने के लिए गोरा टांक ने किया, अपने बेटे को कुंवर की जगह रखकर, कुंवर को टोकरी में रखकर दूर जंगल में ले गई और बाद में दुर्गादास से मिलकर मारवाड़ का कुलदीपक, मारवाड़ के रक्षक दुर्गादास के हाथों सौंप दिया।

  • दूसरे भीष्म पितामह

दुर्गादास राठौड़ को दूसरे भीष्म पितामह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, जैसे पितामह भीष्म ने योग्यता होते हुए भी, स्वीकार्यता होते हुए भी कभी भी स्वयं को सम्राट घोषित नहीं किया, जबकि कुलदीपकों पांडु और धृतराष्ट्र का ध्यान रखा, वैसे ही वीर दुर्गादास राठौड़ ने किया। अजीतसिंह की जान के पीछे औरंगजेब पड़ा हुआ था, यदि अजीतसिंह की हत्या हो जाती तो मारवाड़ का भविष्य संकट में आ जाता।
दुर्गादास राठौड़ ने अजितसिंह को संरक्षण देने के लिए न जाने कितने परिचितों के फाटक खटखटाए, पर औरंगजेब की प्रताड़नाओं को याद कर सब दरवाजे बंद हो गये। वेश बदलते-बदलते दल सिरोही पहंुचा, महाराज बेरीसाल से कुंवर अजीतसिंह के संरक्षण का निवेदन किया। बेरीसाल ने कालिंद्री में रहने वाली आनंद कुंवर सा के बारे में एक रहस्य बताया कि वे राजा जसवंतसिंह की ब्याहता हैं और अजीतसिंह उनके पुत्र के सामान ही हैं, वे उसको पाकर खुश होंगी और संरक्षण भी मिलेगा।
कालिंद्री में आनंद कुंवर सा ने अजितसिंह को संरक्षण दिया, दुर्गादास ने अजीतसिंह की शिक्षा दीक्षा और शस्त्र शिक्षा की व्यवस्था कर, मुकुंददास को अजीतसिंह की रक्षा का दायित्व सौंपकर अन्य कार्याें के लिए निकल गये, फिर अकबर को अपने पाले में लाकर औरंगजेब का डर बताकर अकबर के बेटे और बेटी को अपने यह सुरक्षित रखा।
जब भविष्य में कुंवर अजित बड़े हो गये तो औरंगजेब को कहा कि तुम्हारे पोते-पोती को तभी रिहा करूंगा, जब कुंवर अजितसिंह को रियासत दी जाएगी।
अजितसिंह को रियासतें मिलीं, किन्तु दुर्गादास पर ही उन्होंने कुछ अनबन बातें कहीं, और दुर्गादास अपने गाँव लौट गये। वैसे ही जैसे गुरू गोविन्दसिंह दक्षिण में चले गये थे।
भविष्य में सब ठीक हुआ, सब मारवाड़ी एक हुए। जोधपुर पर आक्रमण किया गया और भगवाध्वज शान से जोधपुर के किले पर फिर से लहराया,
दुर्गादास मौन तपस्वी की भाँति काम पूर्ण हुआ जानकर तीर्थयात्रा पर निकल गये, उज्जैन पहुंचे, महाकाल की शरण में रम गये। क्षिप्रा में स्नान करते, महाकाल की स्तुति करते और चाहते कि मेरे प्राण उज्जैन में ही निकलें। हुआ भी यही। 22 नवम्बर 1718 को मरूकेसरी वीर दुर्गादास राठौड़ शिवतत्व में विलीन हो गये। क्षिप्रातट पर चक्रतीर्थ श्मशान में अंतिम संस्कार हुआ और वहीं उनकी भव्य छत्री बनाई गई, जो उनके शौर्य की महान गाथा सुनाती है।

उज्जैन क्षिप्रातट पर बनी वीर दुर्गादास राठौड़ की भव्य छत्री

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