
“अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।”
— कालिदास, कुमारसंभव
लेखक – राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
भारतीय सभ्यता को यदि किसी एक प्राकृतिक प्रतीक में अभिव्यक्त करना हो, तो वह निस्संदेह हिमालय होगा। हिमालय केवल पर्वतों का समूह नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन, साधना, तप, ज्ञान और सांस्कृतिक निरंतरता का साक्षात् प्रतीक है। इसी हिमालय की विराट गोद में स्थित कैलास पर्वत और मानसरोवर झील सहस्राब्दियों से भारतीय जनमानस की श्रद्धा, साधना और आध्यात्मिक आकांक्षा के सर्वोच्च केंद्र रहे हैं। कैलास का स्मरण होते ही भगवान शिव, ऋषियों की तपस्या, योग की परंपरा, हिमालय की नीरवता और आत्मचिंतन का वह विराट संसार सामने उपस्थित हो जाता है, जिसने भारतीय संस्कृति को उसकी विशिष्ट पहचान दी।
वर्ष 2026 में कैलास मानसरोवर यात्रा का पुनः आरंभ केवल एक तीर्थयात्रा का प्रारंभ नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक स्मृति के पुनर्जागरण का अवसर भी है। ऐसे समय में, जब विश्व तीव्र भौतिक प्रगति के साथ-साथ मानसिक अशांति, सांस्कृतिक विखंडन और पर्यावरणीय संकटों का सामना कर रहा है, कैलास का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह संदेश है—संयम का, संतुलन का, प्रकृति के प्रति श्रद्धा का और आत्मबोध का।
भारतीय मनीषा ने कभी भूगोल को केवल मानचित्र पर अंकित सीमाओं के रूप में नहीं देखा। हमारे लिए नदियाँ मातृस्वरूपा हैं, पर्वत देवस्वरूप हैं और वन तपोभूमियाँ हैं। इसलिए कैलास का महत्व किसी राजनीतिक सीमा से नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना से निर्धारित होता है जो हजारों वर्षों से भारतीय समाज की आत्मा में प्रवाहित होती रही है।
विष्णु पुराण का प्रसिद्ध श्लोक भारतीय सांस्कृतिक एकात्मता का अद्भुत उद्घोष करता है—
“उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः॥”
यह श्लोक किसी आधुनिक राष्ट्र-राज्य की सीमा निर्धारित नहीं करता, बल्कि उस सांस्कृतिक भूगोल का बोध कराता है जिसमें हिमालय भारत की पहचान का अविभाज्य अंग है। इसी हिमालय की आध्यात्मिक परंपरा में कैलास सर्वोच्च स्थान प्राप्त करता है।
सनातन परंपरा में भगवान शिव केवल पूजा के देवता नहीं हैं। वे योग के आदि गुरु हैं। वे शक्ति और करुणा का अद्भुत संतुलन हैं। उनके मस्तक पर गंगा है, जटाओं में चंद्रमा है, गले में विष है और हृदय में समस्त सृष्टि के प्रति करुणा। यही कारण है कि भारतीय दर्शन में शिव का अर्थ केवल एक देवता नहीं, बल्कि चेतना की सर्वोच्च अवस्था माना गया है।
कैलास की यात्रा इसीलिए केवल दर्शन की यात्रा नहीं है। यह मनुष्य के भीतर स्थित अहंकार से विनमुक्त होकर आत्मबोध की ओर बढ़ने का प्रयत्न है। जो यात्री हजारों किलोमीटर की कठिन यात्रा, बर्फीले मार्ग, कम ऑक्सीजन और विपरीत परिस्थितियों को स्वीकार करता है, वह केवल एक पर्वत तक नहीं पहुँचता; वह अपने भीतर के धैर्य, श्रद्धा और आत्मविश्वास से भी परिचित होता है।
भारतीय संस्कृति में तीर्थों का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहा। तीर्थ समाज को जोड़ते हैं, मनुष्य को विनम्र बनाते हैं और उसे यह अनुभव कराते हैं कि वह प्रकृति की विराट व्यवस्था का एक छोटा-सा अंग है। यही कारण है कि हमारे यहाँ चारधाम, द्वादश ज्योतिर्लिंग, शक्तिपीठ और कैलास जैसी यात्राएँ जीवन के संस्कार मानी गई हैं।
कैलास-मानसरोवर का उल्लेख अनेक पुराणों, बौद्ध परंपराओं, जैन ग्रंथों और तिब्बती धार्मिक परंपराओं में भी मिलता है। यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है कि कैलास केवल एक समुदाय की आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि एशिया की अनेक प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं के लिए भी पवित्र स्थल रहा है। यह उसकी सार्वभौमिक आध्यात्मिक महत्ता का प्रमाण है।
इतिहास साक्षी है कि भारत और तिब्बत के बीच सदियों तक धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक संपर्क बने रहे। हिमालय बाधा नहीं, बल्कि संवाद का सेतु था। भारतीय आचार्य, बौद्ध भिक्षु, साधु-संत और व्यापारी इन मार्गों से आवागमन करते रहे। तिब्बत में भारतीय दर्शन, संस्कृत साहित्य और बौद्ध ज्ञान परंपरा का प्रभाव इसी ऐतिहासिक संपर्क का परिणाम है।
बीसवीं शताब्दी के मध्य में तिब्बत की राजनीतिक परिस्थितियों में परिवर्तन आया और उसके बाद कैलास-मानसरोवर तक पहुँचने की व्यवस्था भी बदल गई। आज यात्रा अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के अंतर्गत होती है। किंतु इससे भारतीय जनमानस में कैलास के प्रति श्रद्धा कभी कम नहीं हुई। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि सांस्कृतिक संबंध केवल राजनीतिक व्यवस्थाओं पर आधारित नहीं होते; वे सभ्यता की गहराइयों में बसे होते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि कैलास को केवल पर्यटन या रोमांच की दृष्टि से न देखा जाए। यह यात्रा भारतीय संस्कृति के उस दर्शन का जीवंत प्रतीक है जिसमें तप, त्याग, अनुशासन, प्रकृति के प्रति श्रद्धा और आत्मसंयम को जीवन की सर्वोच्च उपलब्धियाँ माना गया है। जब कोई श्रद्धालु कैलास की ओर बढ़ता है, तो वह वस्तुतः अपने भीतर स्थित शिवत्व की खोज में निकलता है।
इसीलिए कैलास की यात्रा केवल पैरों से नहीं, श्रद्धा से पूरी होती है; केवल शरीर से नहीं, बल्कि मन और आत्मा से भी। (क्रमशः)
लेखक – जनमत जागरण के प्रधान संपादक, वरिष्ठ पत्रकार, समसामयिक विश्लेषक एवं भारतीय संस्कृति के अध्येता।