हिंदवी स्वराज्य का अमर उद्घोष

ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी (27 जून), हिंदू साम्राज्य दिवस पर विशेष-

शुभानन मधुसूदन खेमरिया- युवा लेखक एवं स्तंभकार सागर (मध्यप्रदेश)

6 जून 1674 केवल एक राज्याभिषेक नहीं था, बल्कि भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम क्षण था जब सदियों की पराधीनता के बीच हिंदवी स्वराज्य का सूर्य उदित हुआ। छत्रपति शिवाजी महाराज ने सिद्ध किया कि राष्ट्र की शक्ति केवल शस्त्रों में नहीं, बल्कि सुशासन, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, नारी सम्मान और जनशक्ति में निहित होती है। उनका जीवन आज भी विकसित, आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी भारत की सबसे बड़ी प्रेरणा है।

इतिहास में कुछ तिथियाँ ऐसी होती हैं, जो केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं रहतीं, बल्कि वे किसी राष्ट्र की आत्मा का पुनर्जन्म बन जाती हैं। 6 जून 1674 ऐसी ही एक ऐतिहासिक तिथि है। इसी दिन रायगढ़ दुर्ग पर छत्रपति शिवाजी महाराज का वैदिक विधि-विधान से राज्याभिषेक हुआ और हिंदवी स्वराज्य को औपचारिक स्वरूप मिला। यह केवल एक राजा के राज्यारोहण का समारोह नहीं था, बल्कि सदियों की पराधीनता के बाद भारतीय आत्मसम्मान, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वदेशी शासन के पुनर्जागरण का उद्घोष था।

यदि भारतीय इतिहास को केवल राजवंशों और युद्धों का क्रम मान लिया जाए, तो यह घटना एक सामान्य राजनीतिक परिवर्तन प्रतीत हो सकती है। किंतु यदि भारत को एक सनातन सभ्यता के रूप में देखा जाए, तो यह वह क्षण था जब भारत ने स्वयं को पुनः पहचाना। यही कारण है कि हिंदू साम्राज्य दिवस केवल मराठा इतिहास का उत्सव नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत की राष्ट्रीय चेतना का पर्व है।

सत्रहवीं शताब्दी का भारत विदेशी साम्राज्यवादी विस्तार, धार्मिक असहिष्णुता और राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। अनेक प्राचीन मंदिरों को क्षति पहुँचाई जा रही थी, सांस्कृतिक प्रतीकों पर आघात हो रहे थे और सामान्य जन भय के वातावरण में जीवन व्यतीत कर रहा था। ऐसे समय में सह्याद्रि की पर्वतमालाओं से एक युवा वीर ने यह संकल्प लिया कि इस भूमि पर शासन भय का नहीं, न्याय का होगा; सत्ता दमन का नहीं, लोककल्याण का माध्यम बनेगी। यही संकल्प आगे चलकर हिंदवी स्वराज्य के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।

शिवाजी महाराज का संघर्ष किसी धर्म के सामान्य अनुयायियों के विरुद्ध नहीं था। उनका संघर्ष अत्याचार, अन्याय और दमनकारी सत्ता के विरुद्ध था। उनके प्रशासन में योग्यता को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। विभिन्न समुदायों के योग्य लोगों को सेना और शासन में महत्वपूर्ण दायित्व दिए गए। उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था और प्रजा का कल्याण ही शासन का सर्वोच्च धर्म।

हिंदवी स्वराज्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का विचार नहीं था। इसका अर्थ था—ऐसा शासन जहाँ समाज में समानता हो, समरसता हो, न्याय सबके लिए समान हो, किसान सुरक्षित हो, व्यापार उन्नति करे, महिलाओं का सम्मान सर्वोच्च हो और शासन जनता के प्रति उत्तरदायी हो। शिवाजी महाराज ने युद्ध के समय भी महिलाओं के सम्मान की रक्षा के कठोर नियम बनाए। शत्रु पक्ष की महिलाओं तक के सम्मान की रक्षा की गई। उस समय यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की सर्वोच्च मर्यादा थी।

वे केवल अद्वितीय योद्धा ही नहीं, बल्कि कुशल प्रशासक, दूरदर्शी राष्ट्रनिर्माता और उत्कृष्ट संगठनकर्ता भी थे। उन्होंने दुर्गों का अभेद्य तंत्र विकसित किया, प्रशासन को संगठित किया तथा भारत के इतिहास में संगठित नौसेना की स्थापना कर समुद्री सुरक्षा को नई दिशा दी। सिंधुदुर्ग और विजयदुर्ग जैसे समुद्री किले आज भी उनकी दूरदृष्टि के साक्षी हैं। उन्होंने सिद्ध किया कि जो राष्ट्र अपने समुद्रों की रक्षा नहीं करता, वह अपनी समृद्धि और स्वतंत्रता की रक्षा भी नहीं कर सकता।

मराठा शक्ति की नींव इतनी सुदृढ़ थी कि आगे चलकर उसी शक्ति ने विदेशी साम्राज्यवादी वर्चस्व को निर्णायक चुनौती दी। शिवाजी महाराज ने केवल राज्य का विस्तार नहीं किया, बल्कि जनमानस में आत्मविश्वास का निर्माण किया। उनके लिए भगवा ध्वज केवल विजय का प्रतीक नहीं था, बल्कि धर्म, कर्तव्य, न्याय और राष्ट्रधर्म का प्रतीक था।

समकालीन वीर-रस के अमर कवि भूषण ने शिवाजी महाराज को “हिंदूपति” कहकर सम्मानित किया। आगे चलकर उनके स्थापित हिंदवी स्वराज्य ने हिंदूपद पादशाही की उस अवधारणा को आधार प्रदान किया, जिसने भारतीय स्वाभिमान और स्वदेशी शासन की चेतना को नई दिशा दी।

शिवाजी महाराज की युद्धनीति का लोहा उनके विरोधियों ने भी माना। अनेक अंग्रेज इतिहासकारों और विदेशी सैन्य विश्लेषकों ने उनकी गुरिल्ला युद्ध प्रणाली, दुर्ग प्रबंधन और नेतृत्व क्षमता की प्रशंसा की है। सीमित संसाधनों के बल पर एक विशाल साम्राज्य को चुनौती देने की उनकी क्षमता आज भी विश्व के सैन्य अध्ययन का विषय है।

महात्मा गांधी ने भी शिवाजी महाराज के स्वराज्य, आत्मबल और जनशक्ति को भारत के लिए प्रेरणा माना। स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक सेनानियों ने उनके जीवन से साहस, संगठन और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा प्राप्त की। शिवाजी महाराज के दुर्ग केवल पत्थरों के बने किले नहीं हैं, बल्कि भारतीय स्वाभिमान के जीवंत तीर्थ हैं।

वीर-रस के अमर कवि भूषण ने शिवाजी महाराज के पराक्रम का वर्णन करते हुए लिखा—

“इंद्र जिमि जंभ पर, बाडव सुअंभ पर,
रावन सदंभ पर, रघुकुल राज हैं।
पौन बारिबाह पर, संभु रतिनाह पर,
ज्यों सहस्रबाह पर, राम द्विजराज हैं।
दावा द्रुमदंड पर, चीता मृगझुंड पर,
भूषण वितुंड पर, जैसे मृगराज है।
तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर,
त्यों म्लेच्छ बंस पर, सेर सिवराज हैं॥”

एक अन्य प्रसिद्ध छंद में वे लिखते हैं—

“कुम्भकरण असुर अवतारी औरंगजेब, काशी प्रयाग में दुहाई फेरी रब की।
तोड़ डाले देवी-देव शहर मुहल्लों के, लाखों मुसलमान किए माला तोड़ी सबकी।।
‘भूषण’ भणत भाग्यो काशीपति विश्वनाथ, और कौन गिनती में भूली गति भव की।
काशी कर्बला होती, मथुरा मदीना होती,
शिवाजी न होते तो सुन्नत होती सबकी॥”

ये छंद उस युग के वीर-रस साहित्य की अभिव्यक्ति हैं और उस कालखंड की ऐतिहासिक परिस्थितियों में शिवाजी महाराज के प्रति कवि की श्रद्धा को व्यक्त करते हैं।

आज, राज्याभिषेक के 352 वर्ष बाद भी हिंदवी स्वराज्य केवल इतिहास का विषय नहीं है। यह विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत, सुशासन, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्र सर्वोपरि की भावना का शाश्वत विचार है।

हिंदू साम्राज्य दिवस हमें स्मरण कराता है कि राष्ट्र का उत्थान केवल आर्थिक समृद्धि से नहीं, बल्कि अपने इतिहास पर गर्व, संस्कृति के प्रति आस्था, समाज की एकता और न्यायपूर्ण शासन से होता है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने जीवन से सिद्ध किया कि सीमित संसाधन कभी बाधा नहीं बनते; यदि संकल्प राष्ट्रहित का हो तो इतिहास की दिशा बदली जा सकती है।

आज आवश्यकता केवल शिवाजी महाराज का स्मरण करने की नहीं, बल्कि उनके आदर्शों—स्वराज्य, सुशासन, सामाजिक समरसता, नारी सम्मान, राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक आत्मविश्वास—को अपने जीवन और राष्ट्रीय चरित्र का आधार बनाने की है। यही हिंदू साम्राज्य दिवस का वास्तविक संदेश है।


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