भारतीय लोकचेतना की अमर स्वर-साधिका पद्मविभूषण तीजन बाई को विनम्र श्रद्धांजलि

साभार : VSK Bharat

भारतीय लोक संस्कृति की अप्रतिम साधिका, पंडवानी परंपरा की विश्वविख्यात प्रतिनिधि एवं पद्म विभूषण तीजन बाई के महाप्रयाण का समाचार अत्यंत दुःखद है। उनके निधन से भारतीय लोककला जगत ने केवल एक महान कलाकार ही नहीं, बल्कि लोकजीवन की आत्मा को स्वर देने वाली एक युगद्रष्टा सांस्कृतिक विभूति को खो दिया है।

तीजन बाई ने अपनी विलक्षण प्रतिभा, ओजस्वी वाणी, सशक्त अभिनय और आजीवन साधना के माध्यम से छत्तीसगढ़ की पंडवानी परंपरा को वैश्विक प्रतिष्ठा प्रदान की। उन्होंने महाभारत की कथा को लोकभाषा, लोकसंवेदना और भारतीय जीवन-मूल्यों से जोड़ते हुए जिस जीवंतता के साथ प्रस्तुत किया, वह भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का अद्वितीय अध्याय है। उनके स्वर में केवल कथा का प्रवाह नहीं था, बल्कि भारत की लोकस्मृति, सांस्कृतिक चेतना और सनातन जीवन-दृष्टि का स्पंदन सुनाई देता था।

उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन से यह सिद्ध किया कि लोककलाएँ केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना, सांस्कृतिक निरंतरता और सभ्यतागत स्मृति की वाहक होती हैं। भारतीय लोककलाओं को वैश्विक सम्मान दिलाने, नई पीढ़ी में लोक परंपराओं के प्रति गौरवबोध जगाने तथा असंख्य कलाकारों को प्रेरित करने में उनका योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा।

लोकमंथन परिवार के लिए उनका स्नेहिल सान्निध्य एक अमूल्य धरोहर है। वर्ष 2016 में भोपाल में आयोजित लोकमंथन के प्रथम राष्ट्रीय संस्करण में उनकी गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन को विशेष सांस्कृतिक ऊँचाई प्रदान की थी। उनकी ओजस्वी पंडवानी प्रस्तुति ने वहाँ उपस्थित प्रतिनिधियों, विद्वानों, कलाकारों एवं श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया था। उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण उनका युवा कला-साधकों के साथ हुआ आत्मीय संवाद था, जिसमें उन्होंने साधना, लोक परंपरा, सांस्कृतिक उत्तरदायित्व और भारतीय जीवन-मूल्यों के प्रति समर्पण का प्रेरक संदेश दिया। लोकमंथन परिवार आज उन अविस्मरणीय क्षणों को गहन श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ स्मरण करता है।

लोकमंथन भारतीय ज्ञान-परंपरा, लोकजीवन और सांस्कृतिक विमर्श का राष्ट्रीय मंच है। तीजन बाई का जीवन और साधना उन मूल्यों का साकार स्वरूप थे, जिनके संरक्षण, संवर्धन और पुनर्प्रतिष्ठा का संकल्प लोकमंथन ने लिया है। उनकी स्वर-साधना युगों तक भारत की सांस्कृतिक चेतना को आलोकित करती रहेगी तथा आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देती रहेगी।

तीजन बाई का पार्थिव स्वर आज भले ही मौन हो गया हो, किन्तु उनकी साधना, उनकी वाणी और उनके द्वारा जीवंत की गई लोकपरंपरा भारतीय संस्कृति के आकाश में सदैव अनुगुंजित होती रहेगी। यही किसी लोकऋषि-कलाकार की सच्ची अमरता है।

लोकमंथन परिवार दिवंगत पुण्यात्मा के श्रीचरणों में अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है तथा ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वे उन्हें अपने परमधाम में स्थान प्रदान करें। शोकाकुल परिवार, शिष्यों, असंख्य प्रशंसकों तथा संपूर्ण लोककला जगत को यह दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करें।

भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

श्री जे. नंदकुमार

महासचिव, लोकमंथन एवं

अखिल भारतीय संयोजक, प्रज्ञा प्रवाह


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