
✍️ लेखक: कैलाश चन्द्र
वतन की मिट्टी से बिछुड़ने का दर्द, उजड़े घरों की स्मृतियाँ और बँट गए दिलों की अनकही पीड़ा
भारत का विभाजन केवल भूगोल का विभाजन नहीं था। 1947 में एक राजनीतिक सीमा खींची गई, लेकिन उसके साथ करोड़ों मनुष्यों के जीवन, परिवार, स्मृतियों और संबंधों पर भी एक ऐसी रेखा खिंच गई जिसकी पीड़ा पीढ़ियों तक बनी रही। अभी भी हजारों परिवारों में वो कसक शेष है। उनके घर छूटे, गाँव छूटे, खेत-खलिहान छूटे, रिश्ते छूटे और सबसे बढ़कर वह मिट्टी छूट गई जिसे लोग अपना देश, अपना वतन कहते थे।
विभाजन की त्रासदी को इतिहास की पुस्तकों में आँकड़ों, घटनाओं और राजनीतिक निर्णयों के माध्यम से पढ़ा जा सकता है; लेकिन उसकी मानवीय पीड़ा को समझने के लिए साहित्य, कविता, कहानी और सिनेमा की ओर देखना पड़ता है। हिन्दी सिनेमा ने विभाजन को अनेक बार परदे पर उतारा और फिल्मी गीतों ने उस पीड़ा को ऐसी भावनात्मक भाषा दी, जिसे सुनकर आज भी विस्थापन की वेदना को अनुभूत किया जा सकता है।
विभाजन के बाद बने भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा भले ही निश्चित हो गई, लेकिन स्मृतियों की कोई सीमा नहीं बनी। गीतों में बार-बार वही प्रश्न लौटता रहा—जिस घर को अपना समझकर जीवन बिताया, उसे अचानक पराया कैसे मान लें?
“वतन” जब एक स्मृति बन गया
स्वतंत्रता से पहले ‘वतन’ शब्द का अर्थ था—अपनी धरती, अपना देश और स्वतंत्रता की आकांक्षा। लेकिन विभाजन के बाद ‘वतन’ का एक नया अर्थ उभरा—वह जगह जहाँ मनुष्य का बचपन बीता था।
अब वतन केवल भारत या पाकिस्तान नहीं था। किसी के लिए लाहौर वतन था, किसी के लिए अमृतसर, किसी के लिए रावलपिंडी, मुल्तान, पेशावर, ढाका या कराची। किसी के लिए वतन वह गाँव था जहाँ पीढ़ियों से घर खड़ा था।
यही कारण है कि विभाजन पर बने अनेक गीतों में राष्ट्र की तुलना में घर, माँ, मिट्टी, गलियाँ, बचपन और बिछुड़े रिश्ते अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देते हैं।
विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदी यही थी कि लाखों लोगों को यह निर्णय स्वयं नहीं लेना था कि उनका घर कहाँ होगा। सीमाओं ने उनके लिए तय कर दिया कि वे अब कहाँ के नागरिक हैं।
‘वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हो…’
1948 की फिल्म ‘शहीद’ स्वतंत्रता के तुरंत बाद आई महत्वपूर्ण फिल्मों में थी। इसका गीत—
“वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हो…”
स्वतंत्रता और बलिदान की भावना का गीत था। लेकिन 1947 के बाद ‘वतन’ शब्द का भाव और भी जटिल हो गया था। स्वतंत्रता मिली थी, मगर उसी स्वतंत्रता की कीमत विभाजन और विस्थापन के रूप में भी सामने आई।
एक ओर स्वतंत्रता का पर्व था, दूसरी ओर शरणार्थियों की बिलखती टोलियाँ। एक ओर अपना तिरंगा लहरा रहा था, दूसरी ओर अपने घरों से उजड़े लोग अपने भविष्य की तलाश में भटक रहे थे। यही भारतीय इतिहास का वह विरोधाभास है जिसे केवल राजनीतिक घटनाओं से नहीं समझा जा सकता।
‘ऐ मेरे प्यारे वतन…’
विभाजन की पीड़ा को सीधे-सीधे व्यक्त करने वाले गीतों में फिल्म ‘काबुलीवाला’ (1961) का गीत “ऐ मेरे प्यारे वतन, तुझपे दिल कुर्बान” अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यह गीत वास्तव में अफगानिस्तान पूर्व का गांधार से दूर रह रहे एक व्यक्ति की मातृभूमि के प्रति भावनात्मक पुकार है। लेकिन विभाजन के बाद के भारतीय मानस ने इसमें अपने बिछड़े हुए वतन की पीड़ा भी महसूस की।
जब कोई व्यक्ति अपनी जन्मभूमि से हजारों मील दूर हो जाता है, तो ‘वतन’ भौगोलिक स्थान नहीं रहता—वह स्मृति बन जाता है।
और स्मृति को कोई सीमा नहीं रोक सकती। यही कारण है कि यह गीत विभाजन की सामूहिक स्मृति के संदर्भ में भी मार्मिक प्रतीत होता है।
‘वो सुबह कभी तो आएगी’
साहिर लुधियानवी की कविता और फिल्मी गीतों में स्वतंत्रता के बाद के भारत की सामाजिक बेचैनी दिखाई देती है।
“वो सुबह कभी तो आएगी…”
यह केवल भविष्य की आशा नहीं है; यह उस पीढ़ी की आकांक्षा है जिसने स्वतंत्रता देखी, लेकिन स्वतंत्रता के साथ गरीबी, विस्थापन, हिंसा और सामाजिक असमानता भी देखी।
विभाजन के बाद करोड़ों लोगों के सामने एक नया जीवन शुरू करने की चुनौती थी। उनके लिए आजादी का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं था; वह सुरक्षित घर, सम्मानजनक जीवन और अपनेपन की तलाश भी थी। इसलिए उस समय के गीतों में उत्सव के साथ-साथ उम्मीद और पीड़ा दोनों साथ चलते हैं।
‘जिन्हें नाज़ है हिन्द पर…’
सिनेमा ने विभाजन की पीड़ा को केवल विस्थापितों की कहानी बनाकर नहीं छोड़ा। उसने स्वतंत्रता के बाद पैदा हुई सामाजिक विषमताओं पर भी प्रश्न उठाए।
साहिर की रचनाओं में यह प्रश्न बार-बार दिखाई देता है कि यदि देश स्वतंत्र हो गया है तो क्या हर नागरिक स्वतंत्र, सुरक्षित और सम्मानित भी हुआ?
यही प्रश्न ‘प्यासा’ जैसे सिनेमा में दिखाई देता है।
विभाजन के बाद का भारत केवल राष्ट्रनिर्माण का भारत नहीं था; वह अपने आपको (स्व, चित्ति) खोजता हुआ भारत भी था।
‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…’
‘प्यासा’ (1957) का संसार सीधे विभाजन की कहानी नहीं कहता, लेकिन उसके भीतर युद्धोत्तर और विभाजनोत्तर समाज की बेचैनी सुनाई देती है। साहिर लुधियानवी की दृष्टि में मनुष्य की कीमत धन और सत्ता से बड़ी है।
विभाजन ने मनुष्य को अचानक ‘शरणार्थी’, ‘हिन्दू’, ‘मुस्लिम’, ‘सिख’, ‘भारतीय’ या ‘पाकिस्तानी’ जैसी पहचान में बाँट दिया था। लेकिन उसके पहले वह एक मनुष्य था—जिसका घर था, परिवार था, पड़ोसी थे और स्मृतियाँ थीं। विभाजन के गुनहगार कौन? क्या सिनेमा की कला एवं मनोरंजन की मानवीय दृष्टि इस मूल सत्य को बार-बार याद दिला सकी? ऐसे कुछ प्रश्न भी मन में चिरस्थायी है।
‘अजीब दास्तां है ये…’
फिल्म ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ (1960) का गीत—
“अजीब दास्तां है ये, कहाँ शुरू कहाँ ख़तम…”
विभाजन पर लिखा गीत नहीं है, लेकिन इसके भाव विभाजन की कहानी को समझने में अद्भुत रूपक बन जाते हैं।
विभाजन भी ऐसी ही एक ‘अजीब दास्तान’ था।
एक दिन तक जो पड़ोसी थे, वे अचानक दूसरी ओर के लोग हो गए। जो घर अपना था, वह पराया हो गया। जो मार्ग नित्य का था, वह सीमा के उस पार चला गया। और जिन रिश्तों को पीढ़ियों ने बनाया था, वे राजनीति के एक निर्णय से टूट गए।
‘घर आया मेरा परदेसी…’
भारतीय सिनेमा में घर लौटने का भाव बार-बार आता है। लेकिन विभाजन की पीढ़ी के लिए घर लौटना हमेशा संभव नहीं था।
कई लोगों के घर अब दूसरे देश में थे। कई घरों में दूसरे लोग बस चुके थे। कई घर जल चुके थे। कई घरों का केवल नाम बचा था।
इसलिए फिल्मी गीतों में ‘घर’ का भाव विभाजन के बाद विशेष रूप से मार्मिक बन जाता है।
घर केवल चार दीवारें नहीं था।
घर था—आँगन, नीम का पेड़, पड़ोसी, मंदिर-गुरुद्वारे, मठो की आवाजें, खेत, कुआँ, स्कूल, बाजार और बचपन की स्मृतियाँ।
जब यह सब छूट गया, तो विस्थापन केवल स्थान परिवर्तन नहीं रहा; वह स्मृति का स्थायी घाव बन गया।
‘कर चले हम फ़िदा…’ और विभाजन के बाद का सैनिक
1964 की फिल्म ‘हकीकत’ का गीत—
“कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियो…”
1962 के भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि में था। यह विभाजन पर आधारित गीत नहीं है, लेकिन स्वतंत्र भारत के उस मानस को व्यक्त करता है जिसने 1947 के बाद राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा को सर्वोच्च कर्तव्य के रूप में देखा।
विभाजन के बाद सीमाएँ केवल नक्शे पर बनी रेखाएँ नहीं थीं। वे करोड़ों लोगों के जीवन की वास्तविकता बन गई थीं।
1947 के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में तनाव और युद्धों ने उस विभाजन की स्मृति को लगातार जीवित रखा।
इसलिए सैनिकों पर बने गीतों में एक ओर राष्ट्र की रक्षा का संकल्प है, तो दूसरी ओर उस विभाजित उपमहाद्वीप की लगातार चलती पीड़ा भी कहीं न कहीं मौजूद है।
‘संदेसे आते हैं…’
फिल्म ‘बॉर्डर’ (1997) का गीत—
“संदेसे आते हैं, हमें तड़पाते हैं…”
सैनिक और उसके परिवार के बीच की दूरी का गीत है।
लेकिन विभाजन की पीढ़ी के लिए ‘दूरी’ का अर्थ इससे भी बड़ा था।
कई परिवारों में दूरी केवल कुछ महीनों या वर्षों की नहीं थी। वे पीढ़ियों तक अपने बिछुड़े रिश्तेदारों से नहीं मिल पाए।
एक पत्र सीमा पार नहीं जा सकता था। एक संदेश वर्षों तक नहीं पहुँचता था। किसी भाई को पता नहीं था कि बहन कहाँ है।
किसी माँ को नहीं पता था कि उसका बेटा जीवित है या नहीं।
इसलिए “संदेसे आते हैं” जैसी भावनाएँ विभाजन की सामूहिक स्मृति से भी जुड़ जाती हैं।
विभाजन और ‘माँ’ का रूपक
भारतीय सिनेमा में मातृभूमि को ‘माँ’ कहने की परंपरा पुरानी है।
‘मदर इंडिया’ में माँ केवल परिवार की माँ नहीं है; वह भारतीय किसान समाज और धरती का प्रतीक बन जाती है।
विभाजन ने ‘माँ’ के इस रूपक को और जटिल बना दिया।
जिस धरती को माँ माना गया, वही धरती दो राष्ट्रों में बाँट दी गई।
एक व्यक्ति कह सकता था—“मेरा देश भारत है।”
दूसरा कह सकता था—“मेरा देश पाकिस्तान है।”
लेकिन दोनों की स्मृतियों में कभी-कभी वही नदी, वही खेत, वही भाषा और वही संस्कृति जीवित थी।
इसलिए विभाजन की सबसे गहरी पीड़ा शायद यह थी कि राजनीतिक सीमा ने स्मृतियों का विभाजन नहीं किया।
फिल्मी गीतों में ‘बिछड़ना’ : विभाजन का सबसे मानवीय शब्द
विभाजन को समझने के लिए एक शब्द सबसे महत्वपूर्ण है—बिछड़ना। लोग केवल देश से नहीं बिछड़े। वे— घर से बिछड़े, परिवार से बिछड़े, दोस्तों से बिछड़े, पड़ोसियों से बिछड़े, अपनी भाषा के वातावरण से बिछड़े, अपनी मिट्टी से बिछड़े।
इसीलिए हिन्दी फिल्मों के प्रेम, विरह और घर-वापसी के अनेक गीत विभाजन की स्मृतियों के साथ नए अर्थ ग्रहण करते रहे।
गीतों ने उन भावनाओं को शब्द दिए जिन्हें इतिहास की भाषा अक्सर व्यक्त नहीं कर पाती।
सिनेमा ने विभाजन को कैसे याद रखा?
विभाजन की प्रत्यक्ष स्मृति पर आधारित फिल्मों में बाद के दशकों में कई महत्वपूर्ण उदाहरण सामने आए।
‘गरम हवा’ (1973) ने विभाजन के बाद भारत में रह गए एक मुस्लिम परिवार की असुरक्षा और विस्थापन की मनःस्थिति को सामने रखा।
‘तमस’ (1987) ने विभाजन की हिंसा को कठोर यथार्थ के साथ प्रस्तुत किया।
‘अर्थ’ और अन्य फिल्मों ने अलग-अलग स्तरों पर टूटते परिवारों और बदलते सामाजिक संबंधों को सामने रखा।
बाद में ‘पिंजर’ (2003) ने विभाजन के बीच स्त्री, अपहरण, धर्म और मानवता के प्रश्नों को उठाया।
‘भाग मिल्खा भाग’ जैसे सिनेमा ने विभाजन के शरणार्थी बने एक बच्चे की कहानी को राष्ट्रीय उपलब्धि की यात्रा से जोड़ा। मिल्खा सिंह का जीवन इस बात का उदाहरण बन गया कि विभाजन की राख से भी नई जीवन-गाथा जन्म ले सकती है।
विभाजन : पीड़ा से पुनर्निर्माण तक
विभाजन की कहानी केवल विनाश की कहानी नहीं है। यह पुनर्निर्माण की कहानी भी है। करोड़ों विस्थापितों ने नए शहर बसाए। नई दुकानें खोलीं। नए उद्योग खड़े किए। बच्चों को पढ़ाया। नई पीढ़ी को आगे बढ़ाया। भारत ने भी अपनी लोकतांत्रिक यात्रा शुरू की। इसलिए विभाजन के गीतों में आँसू के साथ आशा भी दिखाई देती है। जीवन का प्रेरणादायी जीवंत संघर्ष दिखाई देता है। घर छूटा, लेकिन जीवन नहीं छूटा। मिट्टी छूटी, लेकिन स्मृति नहीं छूटी। रिश्ते टूटे, लेकिन मानवता की संभावना नहीं टूटी।
गीतों में बचा हुआ वह हिन्दुस्तान
विभाजन की विभीषिका को केवल मृत्यु और विस्थापन के आँकड़ों से नहीं समझा जा सकता। उसे समझने के लिए उस बूढ़े व्यक्ति की आँखों में देखना होगा जो आज भी लाहौर की अपनी गली को याद करता है।
उस माँ की स्मृति सुननी होगी जिसका बेटा सीमा के उस पार रह गया। दूसरी ओर से कह सकते हैं कि बेटा सीमाओं की रक्षा करते वहीं पर इस दुनिया से ही विदा हो गया है। बहुत सी स्मृति बंटवारे ने खड़ी की है।
उस शरणार्थी परिवार की कहानी सुननी होगी जिसने दिल्ली, अमृतसर, जयपुर, मुंबई या किसी दूसरे शहर में अपना जीवन फिर से शुरू किया।
और उस गीत को सुनना होगा जिसमें कोई दूर बैठा व्यक्ति कहता है—
“ऐ मेरे प्यारे वतन, तुझपे दिल कुर्बान…”
क्योंकि विभाजन ने नक्शा बाँटा था, स्मृतियाँ नहीं।
उसने राजनीतिक सीमाएँ बनाई थीं, भावनाओं की सीमाएँ नहीं।
उसने लोगों को अलग देशों का नागरिक बना दिया, लेकिन उनकी भाषा, संगीत, भोजन, लोक-स्मृतियों और बचपन की गलियों को एक झटके में अलग नहीं कर पाया।
इसीलिए भारतीय सिनेमा के गीतों में विभाजन आज भी कभी वतन की पुकार, कभी घर की याद, कभी बिछड़े रिश्ते, कभी सैनिक का बलिदान और कभी नई पीढ़ी के पुनर्निर्माण के रूप में सुनाई देता है।
“तेरे दामन से जो आए उन हवाओं को सलाम….” जिस वतन की धरती को मैं छू नहीं सकता, उसकी हवा ही मेरे पास आ जाए तो मैं उसे भी अपने सौभाग्य की तरह स्वीकार करूँगा।
यही भाव विभाजन के बाद विस्थापित पीढ़ी की सबसे गहरी पीड़ा को व्यक्त करता है—वतन से दूरी इतनी बढ़ गई कि वहाँ से आती हवा भी मिलन का माध्यम बन गई।
इतिहास कहता है—1947 में भारत का विभाजन हुआ। लेकिन गीत कहते हैं—एक पीढ़ी अपने भीतर एक पूरा घर लेकर विस्थापित हुई थी। और शायद यही विभाजन की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है— सीमा जमीन पर खिंची थी, लेकिन उसकी रेखा मनुष्यों के हृदयों पर भी पड़ी। जमीन बँट गई, देश बँट गए, पर स्मृतियों का हिन्दुस्तान आज भी गीतों में, भावना और एहसास में जीवित है। जो कह रहा है कि तुम्हारा प्यारा अखंड भारत कहां है जिसे दिल ढूंढ़ रहा है। जिसे दिल ढूंढ़ रहा है।