डॉ. हेडगेवार जी ने सामान्य व्यक्तियों को राष्ट्रकार्य के लिए प्रेरित किया – सुनील आंबेकर जी

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कानपुर, 25 अगस्त 2026।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, कानपुर द्वारा गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज के ऑडिटोरियम में ‘युवा व्यवसायी समागम’ का आयोजन किया गया। संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में शहर के सैकड़ों प्रमुख युवा उद्यमियों, व्यवसायियों, उद्योगपतियों, चिकित्सकों, प्राध्यापकों एवं प्रबुद्ध नागरिकों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ मुख्य अतिथि अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी, प्रान्त संघचालक भवानी भीख जी तथा विभाग संघचालक डॉ. श्याम बाबू गुप्ता जी ने दीप प्रज्ज्वलन एवं भारत माता के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया। तत्पश्चात राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ का गायन हुआ।

अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने संघ की 100 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा और इसके मूल उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने की थी, उनके साथ जुड़े अधिकांश युवा साथी महज 20 वर्ष के थे।

डॉ. हेडगेवार जी स्वयं 1931 के आंदोलन के दौरान जेल गए थे। ब्रिटिश हुकूमत की उन पर कड़ी नजर थी। अंग्रेजों ने न केवल राजनीतिक और आर्थिक, बल्कि भारत पर सांस्कृतिक और धार्मिक आक्रमण भी किए थे। डॉ. साहब का स्पष्ट मानना था कि भारत को केवल राजनीतिक स्वाधीनता ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानसिक गुलामी से भी पूरी तरह मुक्त कराना होगा।

1936 में जब महात्मा गांधी सेवाग्राम में संघ के वर्ग में आए और उन्होंने डॉ. साहब से कांग्रेस के अंतर्गत कार्य करने का सुझाव दिया, तब डॉ. हेडगेवार जी ने विनम्रतापूर्वक स्पष्ट किया कि राष्ट्र के स्थायी पुनरुत्थान के लिए चरित्र निर्माण करने वाली एक स्वतंत्र और निष्काम इकाई की आवश्यकता है।

उस दौर में यह धारणा थी कि बड़े कार्यों के लिए केवल बड़े नेताओं की आवश्यकता होती है, परंतु डॉ. साहब ने इस सोच को बदला। उन्होंने सामान्य नागरिकों को राष्ट्रकार्य के लिए प्रेरित किया और शाखा पद्धति के माध्यम से अनुशासन, राष्ट्रभक्ति एवं खेल-खेल में व्यक्तित्व निर्माण का तंत्र विकसित किया।

सुनील आंबेकर जी ने संघ के ऐतिहासिक संघर्षों का उल्लेख करते हुए बताया कि संघ का एकमात्र लक्ष्य राष्ट्रभक्त नागरिकों का निर्माण करना रहा है।

1947 में देश के दुखद विभाजन के समय संघ स्वयंसेवकों और श्री गुरुजी (द्वितीय सरसंघचालक) ने अपनी पूरी शक्ति समाज की रक्षा में झोंक दी और अनेक कार्यकर्ताओं ने अपने प्राणों की आहुति दी। 1948 में गांधी जी की हत्या के झूठे आरोपों के तहत संघ पर प्रतिबंध लगाया गया, जिसे बाद में सरकार को बिना किसी शर्त के वापस लेना पड़ा।

1975 में जब देश पर आपातकाल थोपा गया और नागरिक अधिकार छीन लिए गए, तब संघ के स्वयंसेवकों ने लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए अभूतपूर्व संघर्ष किया। आपातकाल के पश्चात जब सरकार बदली, तब तीसरे सरसंघचालक पूजनीय बालासाहब देवरस जी ने ‘भूल जाओ और आगे बढ़ो’ का आह्वान करते हुए समाज को पुनः एकजुट करने का कार्य किया।

1963 में कर्नाटक के उडुपि सम्मेलन में सभी पूज्य संतों को एक मंच पर लाकर ऐतिहासिक घोषणा की गई – ‘न हिन्दू पतिता भवेत्’ (अर्थात कोई भी हिन्दू पतित या अछूत नहीं है)। जब हर व्यक्ति में ईश्वर का अंश विद्यमान है, तो समाज में छुआछूत और जातिगत भेदभाव का कोई स्थान नहीं हो सकता।

सुनील जी ने वर्तमान समय की वैश्विक एवं राष्ट्रीय चुनौतियों की चर्चा करते हुए समाज से संघ द्वारा प्रस्तावित ‘पंच परिवर्तन’ के संकल्पों को अपनाने का आह्वान किया –

सामाजिक समरसता: जाति, पंथ और वर्ग के भेदभाव को समाप्त कर प्रत्येक परिवार को समरसता की पहल करनी होगी।
कुटुंब प्रबोधन (पारिवारिक मूल्य): भारतीय संस्कृति का मुख्य आधार परिवार है। आज अमेरिका जैसे विकसित देशों में 62% लोग परिवार से अलग एकाकी जीवन जी रहे हैं। हमें अपने बच्चों को समय देना होगा, परिवार के साथ बैठकर भोजन करना होगा और घर में संस्कारयुक्त वातावरण निर्मित करना होगा।
पर्यावरण संरक्षण: प्रकृति और पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनानी होगी।
‘स्व’ का भाव (स्वदेशी व स्वाभिमान): अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान पर गर्व करें। अपनी भाषा में हस्ताक्षर करने का स्वाभिमान जगाएं और विदेशी मानसिकता से मुक्त हों।
नागरिक कर्तव्य: प्रत्येक नागरिक को अपने मौलिक कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि राम मंदिर का निर्माण और धारा 370 का निरसन केवल सरकार की पहल से नहीं, बल्कि जब पूरे समाज ने एकजुट होकर संकल्प लिया, तब संभव हुआ। देश के सामने आज धर्मांतरण, ‘लव जिहाद’ और समाज को बांटने वाली विघटनकारी शक्तियों की गंभीर चुनौतियां हैं। समाज को लाचार बनने की बजाय स्वयं सजग होकर इन चुनौतियों से निपटना होगा।

उन्होंने बताया कि आज संघ व विविध संगठनों द्वारा देशभर में 1.50 लाख से अधिक सेवा कार्य संचालित किए जा रहे हैं। दूरस्थ जनजातीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वावलंबन प्रदान करने के लिए एकल विद्यालय और सेवा भारती का विशाल नेटवर्क कार्य कर रहा है। कोरोना महामारी के दौरान हिन्दू समाज और संघ कार्यकर्ताओं ने जिस तन्मयता से राहत कार्य किए, उसने वैश्विक स्तर पर एक उदाहरण प्रस्तुत किया।

उन्होंने युवा व्यवसायियों, पेशेवरों, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और प्रबुद्ध वर्ग से आह्वान किया कि वे संघ की शाखा में आएं, इसके विचार और कार्यपद्धति को समझें तथा संघ के सेवा प्रकल्पों में अपना सक्रिय योगदान दें।

कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के सामूहिक गायन के साथ हुआ।


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