भोजशाला के विषय में ऐतिहासिक निर्णय आने के बाद संपूर्ण देश में जो उत्साह है वह अद्भुत है।
धार में देश के प्रमुख पत्रकार डेरा जमाये हुए है, भोजशाला के सत्याग्रहियों से, भोजशाला की मुक्ति के लिए बलिदान हुए हिन्दुओ के परिजनों से और धार के सामान्य जनों से पिछले लगभग 720 वर्षों के संघर्ष के बारें में जानकारी ले रहें है।
भोजशाला केवल हिन्दू-मुसलमान या मंदिर -मस्जिद के अधिकार का संघर्ष नहीं था। केवल मंदिर का होता तो शायद हिन्दू समाज कोई दूसरा सरस्वती मंदिर बना लेता। यह संघर्ष श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के समान ही था। जिस तरह राम मंदिर अनेकों हो सकतें है, किंतु दुनिया में वह दूसरी जमींन नहीं हो सकती, जहाँ रामलला सरकार का प्राकट्य हुआ हो।
इसी तरह जिस भारतीय ज्ञान परम्परा (Bhartiya Knowledge System) और स्वत्व (Selfhood) के पुनर्स्थापन और जागरण की चर्चा चली है, उसका वैश्विक केन्द्र यदि कोई स्थान हो सकता है, तो वह “भोजशाला” ही है।
भोजशाला के महत्व और राजा भोज के जीवन को इसी तरह प्रस्तुत करने के लिए विश्व संवाद केंद्र मालवा ने 6-7 वर्ष पहले कार्य करना शुरू किया। चाहे भोजशाला के अंदर से पहली ग्राउंड रिपोर्ट होना, जिसमे भोजशाला के अंदर सेकड़ो हिंदू प्रतीकों के दर्शन होना हो, जिनका स्पर्श कर अंधा भी कह उठे कि- यह हिन्दू स्थान ही है।
इसके बाद धार में ही अतीव प्रतिष्ठित और अत्यंत उपादेय पूर्ण नर्मदा साहित्य मंथन के दो संस्करण का आयोजित होना, इन दोनों सौपान का शीर्षक भी “भोजपर्व” ही रखा गया।
राजा भोज के काल के शस्त्र, पत्र और जीवन संबंधी दस्तावेजों को खोजकर विराट प्रदर्शनी बनाई गई।
प्रतिष्ठित जाग्रत मालवा के विशेषांक भी राजा भोज के साहित्य, शौर्य और समग्र जीवन पर आधारित ही प्रकाशित किये गए।
इन दोनों सौपान में भोजशाला को समर्पित सत्र तो थे ही ही, किंतु प्रत्येक सत्र में राजा भोज और भोजशाला संबंधी कुछ न कुछ संवाद अवश्य ही हुआ।
अपने नाम के आगे लार्ड लगाने वाले सारे अंग्रेजो के नाम एक तरफ़ लिखें जायें और अकेले महाराज भोज के नाम के आगे लगने वालें विरुद अथवा उपाधि दूसरी तरफ़ लिखेंगे तो इन अंग्रेजो के नाम कम पड जाएँगे, यह भी साहित्य मंथन ने सबको आत्मसात करवाया।
और अत्यंत विशेष प्रयोग – साहित्य मंथन के दौरान “भोजशाला से विजय मंदिर तक हेरिटेज वॉक” – धार की गलियों में देश के प्रमुख संगठनों के प्रमुख, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्तागण, प्रमुख मीडिया संस्थानों के संपादक और अनेकानेक साहित्यकार, शोधार्थी, कुलगुरु समेत प्रत्येक क्षेत्र के प्रमुख निकले।
भोजशाला और विजय मंदिर मे एक-एक हिन्दू प्रतीकों को देखकर, भोजशाला के मध्य में बने हवन कुंड में विद्यार्थियों और महिलाओं की प्राणाहुति का प्रसंग सुनकर, सब भावविहल हो रहें थे।
नर्मदा साहित्य मंथन के इन दो सौपान ने देश के प्रबुद्ध -प्रभावी वर्ग को भोजशाला पर फिर से सोचने को विवश कर दिया।
सोशल मीडिया का उपयोग कर #भोजशालामेंवाग्देवी का पूरे देश में ट्रेंड करना हो, भोजशाला के इतिहास के प्रति युवाओ की रुचि जाग्रत होना है, यह सब पिछले कुछ वर्षों में बहुत बड़ा है।
उच्च न्यायालय ने भी भोजशाला का निर्णय सुनाते हुए कहा कि यह “शिक्षा का केंद्र” रही है अर्थात “Center of Learning” रहीं है।
सरस्वती सदन भोजशाला मुक्त हो गई है अब भगवती वाग्देवी भी मुक्त होकर भोजशाला में स्थापित हो और भारतीय ज्ञान परंपरा से विश्व आच्छादित हो।
श्री अमन व्यास