श्री विजय सिंह के शब्दों में श्री विनोदजी को श्रद्धांजलि

एक संत-साधक जैसा जीवन — विनोद कुमार जी की स्मृतियों में

हमारे परिवार में प्रचारकों का आना-जाना सहज रहा है। अनेक प्रचारक परिवार में आते रहे, उनसे आत्मीय संवाद भी होता रहा; किंतु जब विनोद कुमार जी भाईसाहब घर आते थे, तो वातावरण में एक अलग ही उत्साह और ऊर्जा का संचार हो जाता था। उनके आने मात्र से घर में प्रसन्नता तो होती ही थी, साथ ही बच्चों से लेकर वरिष्ठजनों तक के मन में एक विशेष प्रकार की सकारात्मकता जागृत हो जाती थी।

भाईसाहब के पास अपने दीर्घ प्रचारक जीवन के अनुभवों और संस्मरणों का जैसे एक पूरा संसार था। वे सहजता से प्रसंग सुनाते और बातों-बातों में जीवन का कोई बड़ा सूत्र दे जाते।

मेरी बिटिया यूपीएससी की तैयारी कर रही है, यह जानकर उन्होंने उससे कहा था—
“तू रोज यह सोच कि तूने यूपीएससी उत्तीर्ण कर ली है और तू कलेक्टर बन गई है। फिर भगवान को धन्यवाद देना कि भगवान, आपने मुझे कलेक्टर बना दिया।”

उनकी यह बात सुनकर लगा कि यह केवल सफलता का कोई सूत्र नहीं, बल्कि जीवन को सकारात्मक दृष्टि से देखने की उनकी अपनी साधना थी। इतना सकारात्मक और उत्साह से भरा व्यक्तित्व मैंने अपने जीवन में बहुत कम देखा है। उनकी बातें बच्चे हों या वरिष्ठजन, सभी बड़े ध्यान से सुनते और फिर उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते।

समयबद्धता उनके स्वभाव का हिस्सा थी

भाईसाहब से यदि किसी एक बात को जीवन में सीखना हो तो वह थी—समय का सम्मान और समय का पालन।

विगत दो वर्षों से मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि प्रत्येक सोमवार को भस्म आरती के लिए मैं उन्हें कार्यालय से मंदिर तक लेकर जाता था। उनका एक ही आग्रह रहता—
“पाँच मिनट पहले पहुँचना।”

उन्होंने स्वयं एक बार कहा था कि वे दो वर्षों में कभी देर से नहीं पहुँचे। वास्तव में समय उनके लिए घड़ी की सुई नहीं, बल्कि जीवन का अनुशासन था।
मन में हमेशा यही रहता कि ऐसा न हो कि मेरी वजह से भाईसाहब को अकेले ही मंदिर जाना पड़े।

ठंड हो, बारिश हो या कोई अन्य परिस्थिति—उनके लिए समय और साधना में कोई अंतर नहीं आता था। वे अक्सर कहते—
“मुझे कार का शौक नहीं है। तुम कार से मत लेकर आना, मुझे दोपहिया वाहन पर ही ले जाना।”

यदि उन्होंने किसी समय पर मिलने की बात कह दी, तो वे उसी समय पर वहाँ उपस्थित मिलेंगे। और यदि कोई व्यक्ति नहीं पहुँचा तो वे प्रतीक्षा करते रहने के बजाय अपनी व्यवस्था करके स्वयं पहुँच जाते थे ।

सुख-सुविधाओं से उनका यह सहज विरक्त भाव उनके व्यक्तित्व की विशेष पहचान था। न धन का मोह, न सुविधा का आग्रह—केवल कार्य, साधना और समाज के प्रति अपने दायित्व का भाव।

कार्यकर्ता की चिंता — उनके जीवन का सहज स्वभाव

भाईसाहब से यदि कार्यकर्ता की चिंता करना सीखना हो, तो शायद उससे बेहतर उदाहरण मिलना कठिन है।

वे मुझे हमेशा कहते—
“शाखा नियमित जाया करो, समय पर जाया करो और प्रत्येक स्वयंसेवक की चिंता किया करो।”

किसी कार्यकर्ता के घर मांगलिक कार्यक्रम हो तो वे औपचारिक निमंत्रण की प्रतीक्षा नहीं करते थे। पहले ही सूचना कर देते—
“कल चलना है, समय पर चलना है, आ जाना।”

रात्रि में भोजन न करने का उनका वर्षों से नियम था। कई बार वैवाहिक या अन्य कार्यक्रमों में भोजन रात्रि में होता था, फिर भी कार्यकर्ता के घर जाना उनके लिए अधिक महत्वपूर्ण था। भोजन उनके लिए उद्देश्य नहीं था; कार्यकर्ता के सुख-दुःख में सहभागी होना ही उनके लिए स्नेह और संबंध की अभिव्यक्ति थी।

उनके लिए कार्यकर्ता कोई संख्या नहीं था। प्रत्येक स्वयंसेवक का जीवन, उसका परिवार, उसकी परिस्थिति और उसकी आवश्यकता—इन सबकी उन्हें चिंता रहती थी।

पीड़ा को भी साधना बना लेना

लगभग दस वर्षों से उन्हें हर्पिस के कारण होने वाली जलन और पीड़ा रहती थी। इतनी लंबी पीड़ा के बाद भी मैंने उन्हें उस पीड़ा को लेकर चिंतित या विचलित होते नहीं देखा।

वे सहज भाव से कहते—
“मैं इसकी चिंता नहीं पालता हूँ।”

और फिर अपनी साधना में लगे रहते।

यह बात मेरे मन में हमेशा रहेगी कि उन्होंने पीड़ा को अपने जीवन पर हावी नहीं होने दिया। शरीर अपनी अवस्था में था, किंतु मन अपने ध्येय में स्थिर था। यही तो साधक का जीवन होता है।

नर्मदा परिक्रमा की तैयारी में भी वही सूक्ष्मता

भाईसाहब का नर्मदा परिक्रमा में जाना होता था। यात्रा उनके लिए केवल यात्रा नहीं थी; उसकी तैयारी भी उतनी ही गंभीरता और सूक्ष्मता से होती थी।

किस दिन किस स्थान पर पहुँचना है, कितने बजे पहुँचना है, भोजन कहाँ और कब होगा, कौन कार्यकर्ता वहाँ व्यवस्था करेगा—इन सबका वे पहले से पूरा विवरण तैयार करवाते थे।

यहाँ तक कि यात्रा में कौन-सा स्थान कब आएगा, उसकी दूरी कितनी होगी और कहीं ऐसी स्थिति तो नहीं आएगी कि माँ नर्मदा को पार करना पड़े और परिक्रमा का क्रम खंडित हो—इन बातों तक का वे बारीकी से ध्यान रखते थे।

पूरी यात्रा की एक सूची बनवाते और उसे मुझे देते हुए कहते—
“इसको संभालकर रखना। कोई अधिकारी जाएगा तो उसके काम आएगी।”

उनकी दृष्टि केवल वर्तमान व्यवस्था तक सीमित नहीं थी। वे आने वाले समय की आवश्यकता को भी ध्यान में रखते थे। उनके काम करने का ढंग बताता था कि उनके लिए व्यवस्था केवल व्यवस्था नहीं थी, बल्कि दायित्व के प्रति सजगता और भविष्य के प्रति दूरदृष्टि थी।

स्मृतियों में सदैव जीवित रहेंगे भाईसाहब

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो भाईसाहब के साथ बिताए हुए छोटे-छोटे प्रसंग ही जीवन की बड़ी सीख बनकर सामने आते हैं।

उनकी सकारात्मकता, समयबद्धता, सादगी, साधना, कार्यकर्ता के प्रति आत्मीयता, प्रत्येक व्यक्ति की चिंता, कष्टों के प्रति निर्विकार भाव और अपने दायित्व के प्रति अद्भुत सजगता—इन सबका समन्वय उनके व्यक्तित्व में सहज रूप से दिखाई देता था।

वे केवल बातें नहीं करते थे, अपने आचरण से सिखाते थे।

उनका जीवन देखकर ऐसा लगता था जैसे किसी संत और साधक का जीवन हमारे बीच सहज रूप में चल रहा हो—न कोई प्रदर्शन, न कोई आग्रह, न सुख-सुविधाओं की लालसा; केवल अपने ध्येय के प्रति समर्पण और समाज एवं कार्यकर्ताओं के प्रति आत्मीयता।

भाईसाहब के साथ बिताए हुए ये क्षण मेरे जीवन की अमूल्य निधि हैं। उनके साथ की प्रत्येक स्मृति आज भी मन में उसी आत्मीयता के साथ जीवित है।

विनोद कुमार जी जैसे व्यक्तित्व चले नहीं जाते, वे अपने आचरण, संस्कार और स्मृतियों के माध्यम से सदैव हमारे बीच बने रहते हैं।

उनका जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा का एक उज्ज्वल अध्याय है।

भाईसाहब को शत्-शत् नमन।
ॐ शांति।


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