द्रोण–एकलव्य का मिथ्यांकन : भारतीय स्मृति पर वामपंथी वैचारिक आक्रमण

✍️ कैलाश चन्द्र 

भारतीय संस्कृति पर आक्रमण तलवारों से नहीं, कथाओं से हुआ है। जो सभ्यता पाँच हज़ार वर्ष तक किसी विदेशी साम्राज्य के सामने नहीं झुकी, वह बीते पचास वर्षों में एक अजीब हथियार से घायल हुई—कथा–विकृति से। महाभारत के द्रोण–एकलव्य जैसा प्रसंग, जो गुरु–शिष्य परम्परा और तपस्या का प्रतीक था, उसे मार्क्सवादी–वामपंथी विचारों ने शोषण का प्रतीक बना दिया। यह केवल कहानी का अपहरण नहीं था, बल्कि एक समूची संस्कृति के नैरेटिव को तोड़कर उसे अपराधी साबित करने की संगठित साजिश थी। जब कोई सभ्यता अपने नायकों को समझना छोड़ दे और शत्रु उसके लिए व्याख्या तैयार करे—तो पराजय सिर्फ समय की बात रह जाती है। यही भारत ने सहा है।

आज ‘‘अब किसी द्रोणाचार्य को एकलव्य का अंगूठा नहीं कटवाने दिया जाएगा’’ जैसे वाक्य नए–युग के राजनीतिक ‘बज़–वर्ड’ बन चुके हैं। पर यह वाक्य जितना सुनने में कर्णप्रिय है, उतना ही कपटपूर्ण भी। यह वाक्य भारतीय परम्परा पर दोषारोपण की एक निरंतर प्रक्रिया का हिस्सा है। द्रोणाचार्य को अत्याचारी, एकलव्य को शोषित, और समूची गुरु–शिष्य परम्परा को सामंती–जातिवादी घोषित करना वामपंथी विमर्श की पुरानी रणनीति है। पर सच्चाई यह है कि उस युग में द्रोण राजगुरु थे, राजधर्म से बंधे थे, और युद्ध–राजनीति के नियमों का पालन कर रहे थे। उन्हें अपनी शिक्षा का संतुलन और हस्तिनापुर की रणनीतिक संरचना बनाए रखनी थी। यह निर्णय आलोचना से परे नहीं है, पर उसे आज की जातिगत–राजनीति में फिट कर देना वैचारिक अपराध है।

लेकिन आधुनिक विमर्श की समस्या :

लेकिन आधुनिक विमर्श की समस्या यह है कि वह कथा को इतिहास मान लेता है और इतिहास को राजनीतिक ईंधन। जो लोग आज द्रोणाचार्य को “दलित–विरोधी” कहकर कोसते हैं, वे यह नहीं बताते कि एकलव्य स्वयं निषाद–राजा का पुत्र था, आदिवासी समाज में जन्मा एक युवा नहीं—एक शक्तिशाली जनजातीय राजकुमार। परंतु वामपंथी विचारधारा की मजबूरी है कि उसे पीड़ित–शोषित मॉडल चाहिए, इसलिए एकलव्य को “उत्पीड़ित आदिवासी” बना दिया गया। भारत की विविधता को समझने की जगह उसे वर्ग–युद्ध की कसौटी पर बांटा गया।

यह कथा–अपहरण अकेला नहीं है :

होलिका–प्रह्लाद का प्रसंग भी इसी तरह विकृत किया गया। शास्त्रों में होलिका राक्षसी है, अपने ही भतीजे को मारने का प्रयत्न करने वाली अधर्म की प्रतीक। परंतु वामपंथी व्याख्याओं में उसे ‘‘पितृसत्तात्मक उत्पीड़न का शिकार स्त्री’’ कह दिया गया, और प्रह्लाद जैसे भक्त–बालक को ‘‘धार्मिक कट्टरता द्वारा प्रभावित बाल मन’’ कहकर प्रस्तुत किया गया। यह वही पद्धति है जिसमें राक्षस नायक और नायक अपराधी बनाए जाते हैं, ताकि समाज स्वयं से घृणा करना सीखे। इसी तर्ज़ पर रावण को ‘‘द्रविड़ नायक’’ और राम को ‘‘आर्य आक्रांता’’ कहा गया। दुर्गा को ‘‘आर्य देवी’’ और महिषासुर को ‘‘आदिवासी–नायक’’ घोषित कर दिया गया। वामपंथी विश्वविद्यालयों में ‘‘महिषासुर शहादत दिवस’’ मनाया जाता है, ताकि देवी–पूजा पर प्रश्नचिह्न लगाया जा सके। यह वही रणनीति है—कथा बदलो, अर्थ बदलो, और समाज की स्मृति को खोखला कर दो।

यहाँ तक कि श्रीकृष्ण को भी नहीं छोड़ा :

यहाँ तक कि श्रीकृष्ण को भी नहीं छोड़ा गया। भारत के महानतम दार्शनिक–राजनीतिक नायक कृष्ण को ‘‘चरवाहा–कबीले का बाहुबली’’ कहा गया और गीता को ‘‘युद्ध का औचित्य साबित करने का ग्रंथ’’। बुद्ध को ‘‘पहला विद्रोही’’ और कबीर को ‘‘धर्म–विरोधी सुधारक’’ घोषित किया गया—जबकि दोनों भारतीय संस्कृति के भीतर से उपजे दिव्य सूत्रधार थे।

यह सब इसलिए किया गया ताकि भारतीय समाज अपनी संस्कृति पर संदेह करे, अपनी परंपरा को बोझ समझे, और आने वाली पीढ़ियाँ अपने नायकों से विमुख हो जाएँ। कथा–अपहरण ही वैचारिक उपनिवेशवाद की पहली सीढ़ी है। यह वही करतूत है जो औपनिवेशिक इतिहासकारों ने रामायण–महाभारत को ‘‘काल्पनिक कबीलाई संघर्ष’’ कहकर की थी। आज वही कार्य भारत के भीतर बैठे वैचारिक एजेंट कर रहे हैं।

द्रोण–एकलव्य की कहानी :

द्रोण–एकलव्य की कहानी को समझने के लिए हमें ‘युगधर्म’ और ‘राजधर्म’ की दृष्टि अपनानी होगी। द्रोण स्वयं लक्ष्य, नियम और संतुलन के प्रतीक थे। वे कठिन निर्णय लेने वाले गुरु थे, कोई निजी स्वार्थी ब्राह्मण नहीं। अगर द्रोण में जातीय अहंकार होता तो वे वेद–धनुर्वेद दोनों के ज्ञान का प्रसार राजकीय सीमाओं से बाहर नहीं करते। पर उन्होंने किया। परंपरा में द्रोण को कभी अत्याचारी नहीं कहा गया; उन्हें न्यायधर्म का पालन करने वाला कठोर किंतु निष्पक्ष शिक्षक माना गया। पर आधुनिक वामपंथी विमर्श इन्हें उसी चश्मे से देखता है जिससे वह हर उद्योगपति को पूँजीपति और हर ब्राह्मण को शोषक घोषित करता है।

लेकिन आज का भारत द्रोणाचार्य को शोषक नहीं मानता। आज का भारत तो हर गाँव में खड़े सरकारी शिक्षक, हर खेल–कोच, हर NCC ट्रेनर और हर गुरुकुल के आचार्यों को द्रोणाचार्य का अवतार मानता है—जो हर एकलव्य को अवसर देने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आज लाखों एकलव्य स्पोर्ट्स स्कूल, एकलव्य आवासीय विद्यालय और आदिवासी–युवा मंच स्थापित हैं, जहाँ कोई अंगूठा नहीं कटता बल्कि हथियार, कलम, कंप्यूटर और कला का अभ्यास दिया जाता है।

एकलव्य का असली खतरा :

एकलव्य का असली खतरा आज कहीं और है। आज उसका अंगूठा कटाने की कोशिश वे लोग कर रहे हैं जो उसे “खतना” और “बपतिस्मा” के चक्र में घसीटना चाहते हैं। वे मिशनरी–व्यवस्थाएँ जो आदिवासी क्षेत्रों में प्रवेश कर उसकी भाषा, उसकी संस्कृति, उसके देवता और उसकी परंपराओं को खा जाती हैं। यह प्रक्रिया द्रोणाचार्य नहीं करते—यह काम उन लोग का है जो “अपने हाथ” का भला चाहते हैं, जिनके लिए एकलव्य मात्र ‘‘डेटा पॉइंट’’ है, ‘‘कन्वर्ज़न लक्ष्य’’ है, ‘‘राजनीतिक वोट–ब्लॉक’’ है।

द्रोण ने कभी एकलव्य की पहचान नहीं छीनी। पर आज जो शक्तियाँ सक्रिय हैं, वे एकलव्य को ‘‘एकलव्य’’ ही नहीं रहने देना चाहतीं। उसे ‘‘अंधभक्त आदिवासी’’ कहकर अपमानित करती हैं, और फिर उसी क्षण उसे अपने धर्म–राजनीतिक जाल में फँसाती हैं। यही वास्तविक अंगूठा–कटाई है—जहाँ पहचान, परंपरा और संस्कृति का अंगूठा काट लिया जाता है, ताकि अगली पीढ़ी कभी अपने पूर्वजों को पहचान ही न सके। और कथा–विकृति का खेल यहीं नहीं रुकता। जैसे ‘शंबूक वध’ को ब्राह्मणवाद का अत्याचार बताया गया, जबकि अनेक शास्त्रीय व्याख्याओं में वह ‘‘आत्मघाती तंत्र–अनुष्ठान’’ और ‘‘राजकीय मर्यादा भंग’’ से जुड़ा प्रसंग था। जैसे ‘शम्बूका’ को ‘‘दलित नायक’’ बनाया गया, वैसे ही ‘द्रौपदी चीरहरण’ को स्त्री–विरोध का स्थायी प्रतीक बता कर यह छुपा लिया गया कि वही ग्रंथ स्त्री–सम्मान को सर्वोच्च स्थान देता है।

जैसे गोडसे को ‘‘हिन्दू आतंकवाद का प्रतीक’’ कहा गया, पर हिंदू समाज के करोड़ों हिंसक अत्याचारों के विरुद्ध खड़े संत–समाज, गुरुओं और सुधारकों का उल्लेख नहीं किया गया। जैसे आरक्षण के विमर्श को सामाजिक न्याय की जगह जातिगत नफरत की प्रयोगशाला बना दिया गया। जैसे ब्राह्मण को ‘‘उत्पीड़क’’ और ओबीसी–दलित को ‘‘सदैव पीड़ित’’ दिखाया गया—ताकि समाज स्थायी रूप से विभाजित रहे।यह सब द्रोण–एकलव्य की कथा से ही शुरू हुआ—जहाँ एक ऐतिहासिक प्रसंग को वर्ग–संघर्ष की वैचारिक माला पहनाकर भारतीय संस्कृति के खिलाफ खड़ा कर दिया गया।

आज भारतीय समाज का दायित्व है कि वह अपने नायकों को वापस reclaim करे। द्रोणाचार्य शत्रु नहीं, शिक्षा–परम्परा की रीढ़ हैं। एकलव्य पीड़ित नहीं, प्रतिभा और तपस्या का आदर्श है। होलिका अत्याचारी है, प्रह्लाद धर्म का प्रतीक है। राम आक्रांता नहीं, आदर्श पुरुष हैं। रावण विद्रोही नहीं, अहंकार और अधर्म का प्रतीक है। महिषासुर नायक नहीं, दुर्गा के पराक्रम से पराजित दुराचार की मूर्ति है।

कथा को उसके मूल अर्थ में पुनर्स्थापित करना ही सांस्कृतिक पुनर्जागरण का पहला कदम है। जब तक समाज स्वयं अपनी कथा नहीं लिखेगा, तब तक कोई और उसकी कहानी तोड़कर लिखता रहेगा। यह संघर्ष अब केवल पुस्तकों का नहीं—यह स्मृति, मन, चेतना और भविष्य का युद्ध है।


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