रोज़ी-रोटी से पहले दर्शन नहीं, और संविधान के बाद मनुस्मृति नहीं – राहुल गांधी के विमर्श पर एक प्रश्न?

डॉ. बालाराम परमार

स्वामी विवेकानंद ने कहा था “खाली पेट धर्म नहीं होता। भूखे आदमी के सामने धर्म की बात करना उसका अपमान है।” विवेकानंद का यह कथन भारतीय चिंतन की व्यावहारिकता का मूल है। पहले मनुष्य को जीने योग्य बनाओ, उसे अन्न, काम और आत्म-सम्मान दो, फिर वह स्वयं अपनी सांस्कृतिक चेतना को जागृत करेगा।

लेकिन आज की भारतीय राजनीति ठीक इसके उलट चल रही है। एक तरफ देश अमृतकाल में विकसित भारत के लक्ष्य पर चल रहा है, रोजगार, तकनीक और वैश्विक नेतृत्व की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी, आजादी के लगभग 80 साल बाद, 2025-26 में संसद और सार्वजनिक सभाओं में मनुस्मृति को लेकर महिलाओं और दलितों की स्थिति पर प्रश्न उठा रहे हैं।

प्रश्न यह नहीं है कि मनुस्मृति पर चर्चा होनी चाहिए या नहीं। प्रश्न यह है कि चर्चा का उद्देश्य क्या है? जब देश संविधान से चल रहा है, जब महिलाओं, अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकार संविधान में सुरक्षित हैं, तो हजारों साल पुराने एक स्मृति-ग्रंथ को आज के चुनावी विमर्श के केंद्र में लाने का राजनीतिक उद्देश्य क्या है? इसी को बिंदुवार समझते हैं।

  1. मनुस्मृति में महिलाओं के बारे में वास्तव में क्या कहा गया है? – प्रचलित भ्रांति बनाम सत्य।

राहुल गांधी और उनके वैचारिक समर्थक अक्सर मनुस्मृति के दो-तीन श्लोकों को आंशिक रूप से उद्धृत करते हैं। सबसे अधिक उद्धृत किया जाने वाला श्लोक है – “पिता रक्षति कौमारे…” अर्थात बचपन में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र स्त्री की रक्षा करता है।

यह श्लोक तब लिखा गया था जब भारत के साथ-साथ संपूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित थी। राजतंत्र और कबीलाई व्यवस्था थी। जीविका के साधन अत्यंत सीमित थे। उस काल में सुरक्षा का यही सामाजिक स्वरूप था।

इस श्लोक को स्त्री-परतंत्रता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन भाष्यकारों ने इसका दूसरा पक्ष कभी नहीं बताया।

सही दृष्टिकोण यह है कि मनुस्मृति में मनु ने स्त्री को ‘रक्षा’ का पात्र नहीं, ‘सम्मान’ का केंद्र माना है। उसी मनुस्मृति में स्पष्ट लिखा है –

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥ – मनुस्मृति 3/56

अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ नारी का अपमान होता है, वहाँ सारे कर्म निष्फल हो जाते हैं।

मनुस्मृति में ही लिखा है – “स्त्रियाँ ‘श्री’ हैं, घर की लक्ष्मी हैं।” मनु ने संपत्ति में स्त्री-धन की अवधारणा दी, जो उस काल में विश्व में कहीं नहीं थी। मनुस्मृति में बलात्कार के लिए कठोर दंड तक का विधान है, जो उस युग की न्याय-व्यवस्था को दर्शाता है।

मनुस्मृति कोई धार्मिक-सामाजिक संविधान नहीं, बल्कि एक समय की सामाजिक आचार-संहिता है। स्मृति का अर्थ ही है – जो याद किया गया। समय-समय पर स्मृतियाँ बदलती रही हैं – याज्ञवल्क्य स्मृति, पाराशर स्मृति आदि। इसलिए मनु की हर बात को आज का कानून मानना, स्वयं मनु के सिद्धांत के विरुद्ध है।

  1. भारत आज मनुस्मृति से नहीं, संविधान से चलता है – संविधान सर्वोपरि है।

भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकृत किया गया था, जिसे संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।

भारत में आज मनुस्मृति का एक भी अनुच्छेद लागू नहीं है। 26 जनवरी 1950 से इस देश में केवल एक ग्रंथ सर्वोपरि है – भारत का संविधान।

संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है, अनुच्छेद 15 लिंग और जाति के आधार पर भेदभाव को निषिद्ध करता है, अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है और अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है। महिलाओं के लिए पंचायत से संसद तक आरक्षण, पैतृक संपत्ति में बराबर अधिकार और कार्यस्थल पर सुरक्षा – ये सब संविधान की देन हैं, मनुस्मृति की नहीं।

फिर जब सब अधिकार संविधान दे रहा है, तो मनुस्मृति का भय दिखाकर महिलाओं और दलितों में असुरक्षा पैदा करने का क्या अर्थ है? यह ऐसा ही है जैसे कोई आज अंग्रेजों के 1890 के कानून का हवाला देकर कहे कि तुम्हें ‘वंदे मातरम्’ बोलने पर दंड मिलेगा, जबकि वह कानून कब का समाप्त हो चुका है।

  1. प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी आखिर 80 साल बाद यह मुद्दा क्यों उठा रहे हैं?

स्वतंत्रता के लगभग 80 साल बाद, जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता वाली संविधान सभा द्वारा और डॉ. भीमराव आंबेडकर की अध्यक्षता वाली प्रारूप समिति द्वारा तैयार संविधान ने मनुस्मृति को कानूनी रूप से पूरी तरह अप्रासंगिक कर दिया है, तब इस मुद्दे को उठाने के औचित्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

इसके तीन राजनीतिक कारण दिखाई देते हैं –

(क) विकास के विमर्श से ध्यान हटाना: विवेकानंद कहते थे – पहले समृद्धि दो। आज देश का युवा रोजगार, कौशल, स्टार्ट-अप और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की बात करना चाहता है। जब विकास पर ठोस उत्तर न हो, तो इतिहास की एक प्रतीकात्मक किताब को खलनायक बनाकर भावनात्मक ध्रुवीकरण करना आसान होता है।

(ख) संविधान बनाम मनुस्मृति का कृत्रिम द्वंद्व पैदा करना: कांग्रेस पार्टी लंबे समय से यह नैरेटिव बना रही है कि भाजपा-आरएसएस मनुस्मृति लागू करना चाहते हैं, जबकि भाजपा के नेतृत्व में ही केंद्र सरकार ने डॉ. आंबेडकर से जुड़े पंचतीर्थ बनाए, संविधान दिवस मनाना प्रारंभ किया और अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए बजट कई गुना बढ़ाया। संविधान को खतरा बताकर भय का वोट बैंक बनाना इसका उद्देश्य प्रतीत होता है।

(ग) सामाजिक ताने-बाने में विभाजन: जब महिलाओं, दलितों और पिछड़ों से बार-बार कहा जाएगा कि हजारों साल पहले एक ग्रंथ में तुम्हारे बारे में ऐसा लिखा था, तो उनके मन में वर्तमान व्यवस्था के प्रति आक्रोश नहीं, बल्कि समाज के प्रति अविश्वास पैदा होगा। यह समरसता नहीं, विभाजन है।

👉🏻 अनुसूचित जाति-जनजाति और महिलाओं के बीच मनुस्मृति की चर्चा क्यों?

25 दिसंबर 1927 को महाराष्ट्र के महाड में चवदार तालाब सत्याग्रह के दौरान जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता के प्रतीकात्मक विरोध स्वरूप मनुस्मृति का दहन किया गया था। इस कार्यक्रम में गंगाधर नीलकंठ सहस्रबुद्धे, सुरबानाना टिपणीस, रामचंद्र बाबाजी मोरे और भास्करराव जाधव जैसे नेता उपस्थित थे। यह उस समय की सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध था।

उसके लगभग 20 वर्ष बाद 29 अगस्त 1947 को डॉ. आंबेडकर को प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। उसी डॉ. आंबेडकर ने विरोध के बाद घृणा का नहीं, बल्कि निर्माण का मार्ग चुना। उन्होंने हमें मनुस्मृति के दहन से आगे बढ़कर संविधान अपनाने का मार्ग दिखाया।

आज जब अनुसूचित समाज का एक बड़ा वर्ग आईएएस, डॉक्टर, वैज्ञानिक और उद्यमी बन रहा है और राष्ट्रपति पद तक पहुँच रहा है, तो उसे बार-बार यह याद दिलाना कि तुम्हारे पूर्वजों के साथ हजारों साल पहले अन्याय हुआ था, उसे सशक्त नहीं, बल्कि मानसिक रूप से फिर से पीड़ित बनाता है।

महिलाओं के संदर्भ में भी यही सत्य है। आज भारत में महिलाएं फाइटर पायलट हैं, इसरो में वैज्ञानिक हैं। इंदिरा गांधी लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहीं, प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति रहीं और वर्तमान में द्रौपदी मुर्मू देश के सर्वोच्च पद पर हैं। देश में सुचेता कृपलानी से लेकर अब तक कुल 18 महिला मुख्यमंत्री रह चुकी हैं – नंदिनी सत्पथी (ओडिशा), शशिकला काकोडकर (गोवा), सैयदा अनवरा तैमूर (असम), जानकी रामचंद्रन एवं जे. जयललिता (तमिलनाडु), मायावती (उत्तर प्रदेश), राजिंदर कौर भट्ठल (पंजाब), राबड़ी देवी (बिहार), सुषमा स्वराज और शीला दीक्षित (दिल्ली), उमा भारती (मध्य प्रदेश), वसुंधरा राजे (राजस्थान), आनंदीबेन पटेल (गुजरात), ममता बनर्जी (पश्चिम बंगाल), महबूबा मुफ्ती (जम्मू-कश्मीर), आतिशी एवं रेखा गुप्ता (दिल्ली)।

तो क्या देश की आधी महिला आबादी को मनुस्मृति के एक विवादित श्लोक से प्रेरित किया जाएगा या संविधान द्वारा दिए गए समान अवसर से?

👉🏻हजारों साल पुरानी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर विकास का रास्ता क्यों रोकना?

एक परिवार में भी अगर 100 साल पहले कोई झगड़ा हुआ हो, तो क्या हम हर दिन उसे दोहराकर आगे बढ़ सकते हैं? नहीं, हम उससे सीख लेकर आगे बढ़ते हैं।

जर्मनी ने अपने नाजी अतीत से सीखा, पर वह हर दिन उसी को लेकर नहीं रोता रहा। उसने नया संविधान बनाया और विकास किया।

संविधान सभा ने भी यही किया। जाति प्रथा और छुआछूत जैसी कुरीतियों को पहचाना, उन्हें कानून बनाकर समाप्त किया और संविधान के रूप में एक नया भविष्य लिखा।

अब अगर हम उसी पुरानी किताब को संसद में लहराएंगे, तो दुनिया हमें क्या कहेगी? दुनिया देख रही है कि भारत विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है और डिजिटल इंडिया है। वहाँ हम उन्हें मनुस्मृति के पन्ने दिखाएंगे तो हम अपना ही उपहास कराएंगे।

विकास का रास्ता अतीत की कब्र खोदने से नहीं, भविष्य की नींव रखने से बनता है। स्वामी विवेकानंद का मंत्र हमें यही रास्ता दिखाता है। जनता को पहले समृद्धि चाहिए – अच्छी शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य और सम्मानजनक रोजगार। जब पेट भरा होगा और हाथ में काम होगा, तो आत्मिक चेतना स्वयं जागेगी।

राहुल गांधी एक बड़े राष्ट्रीय दल के नेता हैं। उनसे अपेक्षा है कि वे संविधान की शक्तियों के बारे में बताएंगे – कैसे मुद्रा योजना से दलित महिलाओं को उद्यमी बनाया जाए, कैसे ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ को और मजबूत किया जाए और कैसे आरक्षण का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।

संविधान सर्वोपरि है। मनुस्मृति इतिहास है, संविधान वर्तमान है और भविष्य भी। इतिहास से सीखा जाता है, इतिहास में जिया नहीं जाता।

देश को अब मनुस्मृति बनाम संविधान की बहस से नहीं, बल्कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों को शत-प्रतिशत लागू करने के संकल्प से आगे बढ़ना है। यही वर्तमान और आने वाली पीढ़ी का सच्चा सम्मान होगा और यही अनगिनत स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


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