
साभार: VSK Bharat
डॉ. लोकेन्द्र सिंह
“सनातन संस्कृति में सर्वश्रेष्ठ धर्म है ‘मानव धर्म’। मानवता की स्थापना करना ही धर्म की स्थापना करना है। देवी अहिल्याबाई होलकर ने धर्म की स्थापना हेतु अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया। समस्त प्रजा को वात्सल्य से सींचने वाली देवी अहिल्याबाई होलकर पूरे मालवा की मातुश्री कहलाई। त्याग, तपस्या, समर्पण, अनुशासन एवं न्याय- मानव धर्म के मूल आधार हैं। इन्हीं आधारभूत कर्तव्यों का पालन समाज में समरसता और व्यवस्था को स्थापित करता है। अहिल्याबाई का संपूर्ण जीवन न्याय प्रियता, सद्चरित्र, संस्कार अनुशासन और धर्म के स्तंभों पर मजबूती से खड़ा है।”
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ का केंद्रीय भाव यही है। नाट्यरूप में प्रस्तुत पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर के जीवन से उन्होंने भारत की बेटी के संघर्ष, साहस और नेतृत्व की कहानी सुनाई है। यह गाथा आपको प्रारंभ से अंत तक बाँधे रखती है, फिर भले ही आपने देवी अहिल्याबाई की कहानी पहले से सुन भी क्यों न रखी हो। पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर के 300वें जयंती वर्ष में यह पुस्तक अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। पुस्तक की एक ओर विशेषता है कि इसका पाठक वर्ग बहुत विशाल है यानी हर कोई इस पुस्तक को पढ़ सकता है।
‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ की प्रस्तावना भी पठनीय और महत्वपूर्ण है। लेखिका डॉ. साधना बलवटे ने प्रस्तावना में ही अपने पाठकों को देवी अहिल्याबाई होलकर के व्यक्तित्व और उनके कार्यों का संक्षिप्त परिचय कराया है। प्रस्तावना को मैं इस नाटक के सारांश के तौर पर देखता हूँ, जो सीधे तौर पर पुस्तक के पाठकों के लिए है। यह प्रस्तावना अहिल्या कथा का साररूप है। यूं तो पुण्यश्लोक का जीवन दर्शन इतना विराट है कि उसे किसी पुस्तक, ग्रंथ या निबंध में समेटना अत्यंत कठिन है। फिर भी, आज की पीढ़ी- जो अपने नायकों को नहीं जानती, जानना भी चाहती है तो थोड़े में अधिक जानना चाहती है। ऐसे सभी लोगों को डॉ. साधना बलवटे की पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ अवश्य पढ़नी चाहिए। जैसे शिखर दर्शन से मंदिर की भव्यता और दिव्यता की अनुभूति होती, वैसे इस पुस्तक को पढ़कर लोगों के मन मंदिर में सुशोभित देवी अहिल्याबाई होलकर के जीवन के दर्शन होते हैं।
पुस्तक के माध्यम से एक महत्वपूर्ण तथ्य हमारे सामने आता है। आखिर हम एक रानी के लिए पुण्यश्लोक जैसे विशेषण का उपयोग क्यों करते हैं? यह जानकार भी गौरव की अनुभूति होती है कि भगवान विष्णु, धर्मराज युधिष्ठिर और राजा नल के पश्चात देवी अहिल्याबाई होलकर ही एकमात्र व्यक्तित्व हैं, जिन्हें उनकी उज्ज्वल छवि, शुभ चरित्र के कारण पुण्यश्लोक की उपाधि प्राप्त हुई है।
पुस्तक को पढ़ते हुए बौद्धिक बेईमानों की कारगुजारियां भी याद आती हैं। कैसे भारत के महान चरित्रों को उन्होंने अपने वैचारिक एवं राजनीतिक स्वार्थ पूर्ति के चक्कर में इतिहास लेखन के दौरान उपेक्षित किया है। वहीं, आक्रांताओं को उज्ज्वल चरित्र के नायक के तौर पर प्रस्तुत करने के लिए मनगढ़ंत कहानियां लिख डालीं। तथाकथित इतिहासकारों ने एक क्रूर और अत्याचारी शासक औरंगजेब का महिमामंडन करने के लिए नैरेटिव बनाया कि वह टोपी सिलकर अपना खर्चा निकालता था। सत्ता के लिए अपने भाइयों की गर्दनें उतारने वाला शासक कैसी टोपियां सिलता होगा, हम सहज अंदाज लगा सकते हैं। अगर इतिहासकारों को त्यागपूर्ण भाव से शासन करने के उदाहरण ही प्रस्तुत करने थे, तो उनको झूठी कहानियां लिखने की बजाय देवी अहिल्याबाई की कथा सुननी चाहिए थी। राज्य की संपत्ति के विषय में अहिल्याबाई होलकर की दृष्टि कितनी उदात्त थी, उसका वर्णन इस पुस्तक में आया है।
मातुश्री अहिल्याबाई का मानना था कि राज्य की संपत्ति प्रजा के कल्याण के लिए होती है। इसका उपयोग राज परिवार का कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तिगत कार्य के लिए नहीं कर सकता। हम देवी अहिल्याबाई होलकर को धार्मिक कार्यों के लिए आगे बढ़कर दान करने वाली नायिका के तौर पर जानते हैं। आपको जानकर सुखद आनंद की अनुभूति होगी कि उन्होंने जो धर्म संबंधी निर्माण कार्य कराए, उसका व्यय उन्होंने अपने निजी खर्च से किया, जिसे खासगी कहते थे।
आज आवश्यकता है लोकमाता अहिल्याबाई के जीवन पृष्ठों को पुनः पढ़ा जाए और उनका अनुकरण किया जाए। डॉ. बलवटे ने अपनी पुस्तक में एक स्थान पर उचित ही लिखा है कि शक्ति, विद्या, बुद्धि, लक्ष्मी और मातृत्व का समवेत रूप यदि किसी में देखना हो या किसी एक व्यक्तित्व को, इन शक्तियों का नाम देना हो तो वह एक ही होगा ‘मातुश्री अहिल्याबाई होलकर’।
लेखिका ने मनकोजी और सुशीला बाई की बेटी, शिव की अनन्य भक्त पुण्यश्लोक, लोकमाता देवी अहिल्याबाई के जीवन के सभी पहलुओं को दिखाने का प्रयास किया है। एक कुशल एवं लोक कल्याणकारी शासक के रूप में उनकी छवि ‘नारी सशक्तिकरण’ का सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करती है। स्त्री सेना का गठन, कपास की फसल को प्रोत्साहन, बुनकरों का प्रशिक्षण एवं हथकरघा उद्योग की स्थापना, स्त्री शिक्षा, विधवा स्त्रियों को अधिकार, प्रजा के साथ न्याय करने के लिए अपने पुत्र को भी दंड देने वाली और समय पड़ने पर युद्ध लड़कर शत्रुओं को परास्त करने वाली तथा अपनी सूझबूझ से युद्ध को टाल देने का सामर्थ्य रखने वाली देवी अहिल्याबाई होलकर के संपूर्ण जीवन को अभिव्यक्त करने का प्रयास है पुस्तक ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ में किया गया है।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद के पूर्व संगठन मंत्री श्रद्धेय श्रीधर पराड़कर ने नाटिका को अपना आशीर्वाद देते हुए उचित ही लिखा है – “प्रस्तुत लघु नाटिका में देवी अहिल्याबाई के यशस्वी जीवन को दर्शकों के सामने रखा गया है। नाटक की भाषा सहज, सरल, बोधगम्य है”। अहिल्याबाई की मातृभाषा मराठी थी, इस कारण मराठी भाषा के कई शब्दों का प्रयोग संवादों में किया गया है। उसी प्रकार उनका कार्य क्षेत्र निमाड़ था, जिस कारण निमाड़ी बोली के शब्द तथा गीतों का प्रयोग भी किया गया है। अक्सर लेखक अपना बौद्धिक सामर्थ्य प्रदर्शित करने के लिए कठिनतम शब्दों का प्रयोग करते हैं। उस कालखंड की कहानी लिखने के लिए सामान्य तौर पर लेखक उस समय में प्रचलित शब्दावली का उपयोग करते हैं। भाषा का अतिरिक्त श्रृंगार करते हैं। थोड़ा उसे दरबारी स्वरूप देते हैं। ऐसा करते समय लेखक अपने समय के पाठकों से बहुत दूर चला जाता है। इस पुस्तक की अच्छी बात यह है कि लेखिका डॉ. साधना बलवटे ने भाषाशैली के माध्यम से अपनी बौद्धिक क्षमता को प्रदर्शित करने का प्रयास नहीं किया। इस कारण यह पुस्तक आज के पाठकों को आसानी से अपने साथ जोड़ लेगी। सबको समझ में आने वाली हिन्दी में संवादों की रचना की गई है। फिर चाहे संवाद राजा का हो या सामान्य नागरिक का।
यह पुस्तक केवल एक कहानी नहीं बुनती है, बल्कि वर्तमान समय में समाज के सामने मुंह बाएं खड़ी चुनौतियों के समाधान की ओर भी संकेत करती है। किसी रचना का महत्व इसी बात में अधिक होता है कि वह वर्तमान समय से कैसे जुड़ती है। आज परिवार प्रबोधन की आवश्यकता सब अनुभव कर रहे हैं। पति-पत्नी के बीच के संबंधों में संतुलन, परस्पर सम्मान और सहयोग की भावना कैसे आ सकती है। बहुत कुशलता से इस ज्वलंत विषय की ओर संकेत किया गया है। अहिल्याबाई अपने पति खांडेराव के साथ विद्या अध्ययन और शस्त्र विद्या का प्रशिक्षण लेती हैं। अहिल्याबाई तीव्र बुद्धि की होने के कारण जल्दी ही दोनों विधाओं में पारंगत हो गई।
सावन में काँवड़ यात्रा की परंपरा अपने देश में सदियों से रही है। आज एक वर्ग काँवड़ यात्रा पर वितंडावाद करता है। जब यह विषय उठाया जाता है कि एक संप्रदाय के कुछ कट्टरपंथी एवं असामाजिक तत्व काँवड़ यात्रियों पर हमले करते हैं, उन्हें परेशान करते हैं, तब वास्तविक दोषियों की मानसिकता की चर्चा करने की जगह काँवड़ियों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। पथराव या अन्य प्रकार से काँवड़ यात्रा में व्यवधान डालने का प्रश्न आज का नहीं है। देवी अहिल्याबाई के समय से या कहें कि उससे भी पहले यह समस्या चली आ रही है। इसके समाधान की दृष्टि क्या हो? इस संबंध में हमें अहिल्याबाई का दृष्टिकोण देखना चाहिए। जब उनके सामने यह विषय आया कि काशी से रामेश्वर तक गंगाजल की काँवड़ पहुंचने के समय रास्ते में निजाम के सैनिक काँवड़ियों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, तब अहिल्याबाई ने हैदराबाद के निजाम को पत्र लिखा – “हुजूर को अहिल्याबाई होलकर का नमस्कार पहुंचे। विदित हो कि सनातनी समाज ने कभी भी आपके पूजा स्थानों, जुलूसों और त्योहार पर किसी प्रकार की बाधा डालने की चेष्टा नहीं की है। हुजूर से आग्रह है कि वह भी काँवड़ यात्रियों के साथ कोई दुर्व्यवहार न करें। अन्यथा कठोर कदम उठाने में हमें भी संकोच नहीं होगा”।
कुल मिलाकर ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ ऐसी पुस्तक है, जो हमें भारत की महान शासक पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई के जीवन से भी परिचित कराती है और वर्तमान समय की चुनौतियों के समाधान की ओर भी संकेत करती है। अपनी संस्कृति, अपने नायकों एवं अपने इतिहास को समझने में जिनकी रुचि है, उन सबको यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। नाट्य विधा से जुड़े रंगकर्मियों के लिए यह बढ़िया पुस्तक है। इस नाटक को मंच पर खेलकर समाज के प्रबोधन के जरूरी कार्य में अपना योगदान दे सकते हैं। ‘अहिल्या रूपेण संस्थिता’ का प्रकाशन राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने किया है। यह 54 पृष्ठ की पुस्तक है, जिसे आप एक बैठक में पढ़ सकते हैं।
पुस्तक – अहिल्या रूपेण संस्थिता
लेखक – डॉ. साधना बलवटे
मूल्य – 120 रुपये
प्रकाशक – राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली
(समीक्षक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।)