
बसन्त पंचमी के दिन देशभर में छोटे–बड़े हजारों उत्सव होते हैं। वर्ष भर उत्सवों को उत्सव कलाकार अपनी कला से बनाते हैं और बसन्त पंचमी तो कलाकारों की, विद्वानों की, साहित्यकारों की और प्रतिभा के अन्यान्य सभी क्षेत्रों की आराध्या देवी भगवती वागेश्वरी के प्राकट्य का दिवस है। बसन्त का वर्णन तो असीम है। बसन्त पर विद्वानों ने कितने ही श्लोक लिख दिए, कवियों ने कितनी ही कविताएं। कलासाधकों ने अगणित कलाओं से बसन्त को समझाया पर बसन्त का वर्णन तो असीम है। उसके आनंद का वर्णन नहीं किया जा सकता। लेकिन ये बसन्त पंचमी जब–जब आती है, तब-तब असीम सुख के साथ असीम दुःख भी लेकर आती है। दुःख जिसकी अंतहीन कथा है, दुःख इस बात का कि जिस भगवती वागेश्वरी के प्राकट्य दिवस के सुअवसर पर यह बसन्त पंचमी मनाई जाती है, जिस भगवती सरस्वती के प्राकट्य दिवस बसन्त पंचमी पर काव्य गोष्ठियों में कवि उसकी वन्दना करते हैं, मंचों पर कलासाधक जिस भगवती वीणापाणि की साधना करते हैं, विद्यालयों में बच्चे ”बुद्धिप्रदाम् शारदाम्” कहकर जिस भगवती वाणी की प्रार्थना करते हैं वह तो सात समन्दर पार लन्दन के संग्रहालय में किसी अपराधी की तरह बन्द है। जो मस्तिष्क के तम के तालों को तोड़ती है, वह स्वयं ताले में बंद है और जो सबको मुक्त करती है कोई उस भगवती सरस्वती की मुक्ति का विचार नहीं करता। यह बात असह्य दुःख से भर देती है और कला के क्षेत्र में होने के कारण ये दुःख वर्ष भर बना रहता है, बढ़ता रहता है।
आप विचार कर रहे होंगे कि सरस्वती लन्दन में अपराधी की तरह बंद है, ये कैसी मूर्खों की तरह की बात है, इसलिए प्रकरण समझिए। इस प्रकरण को समझने के बाद आप यह भी समझेंगे कि देश में केवल श्रीरामजन्मभूमि को ही ध्वस्त नहीं किया गया वरन् हिन्दुओं के समस्त मानबिन्दुओं को ध्वस्त करने का कार्य पहले मुगलों ने तलवार के दम पर किया और फिर ईसाइयों अर्थात अंग्रेजों ने धूर्त तरीकों से किया।
कहानी धार की है। वही धार जिसका सृजन महाराजा भोज ने किया था। महाराजा भोज की संस्कृतनिष्ठा, प्रताप, वैज्ञानिकता और एक प्रजापालक सम्राट होने के विषय में आज भी कहानियां सुनने–पढ़ने को मिलती रहती हैं। ये कहानी राजा भोज द्वारा धार में बनवाई गई भोजशाला की है। राजाभोज सरस्वती के साधक थे, 72 प्रकार की कलाओं के ज्ञाता थे। राजभोज ने विविध विषयों पर चौरासी ग्रन्थ लिखे और वे वास्तु और विज्ञान के महान ज्ञाता थे। सरस्वती के वरद पुत्र राजाभोज को जहाँ अनेक बार भगवती वाग्देवी का साक्षात्कार हुआ, राजा भोज ने उसी स्थान पर विश्व के सबसे उत्कृष्ट सरस्वती माता के मन्दिर का अर्थात “भोजशाला” का निर्माण कराया। भोज ने इसके निर्माण में अपना समूचा ज्ञान उड़ेल दिया। भोजशाला वास्तु का अद्भुत उदाहरण है। पूर्व की ओर मुख किए हुए भोजशाला अपने निर्माण के समय बहुत बड़ी और बहुमंजिला थी। इस भोजशाला का एक विशाल सभामंडप था, जिसकी छत सैकड़ों नक्काशीदार स्तम्भों (पिल्लरों) पर टिकी हुई थी। भवन में हजारों कक्ष थे। वास्तविकता में भोजशाला संस्कृत अकादमी थी। यहाँ संस्कृत के विद्यार्थी ही नहीं, अध्यापक भी अध्यापन करने आते थे।
भोजशाला का वर्णन बहुत दीर्घ है किन्तु आप इस बात से भोजशाला का महत्व समझ सकते हैं कि कालिदास, माघ, बाणभट्ट, भवभूति, मानतुंग, भास्कर भट, धनपाल जैसे १४०० विख्यात, प्रकाण्ड विद्वानों, धर्मशास्त्रियों, कवियों की साधनास्थली भोजशाला रही है।
भोजशाला के भवन का जो कक्ष उसका गर्भगृह है जहाँ सन १०३४ में राजा भोज की आज्ञा से विख्यात मूर्तिकार मंथल ने संगमरमर पत्थर पर माँ सरस्वती की शांतस्वरूपा मनमोहक प्रतिमा को गढ़ा, जिसे गर्भगृह में विराजित किया गया, किन्तु आज वह प्रतिमा लन्दन के संग्रहालय में बंद है।
प्रतिमा के लन्दन संग्रहालय पहुंचने के पीछे की कहानी संघर्ष और बलिदान से भरी हुई है। १२३९ में अरब से कमाल मौलाना आकर धार में बसा। जादू-टोने के नाम पर धर्मांतरण करने लगा, इस्लाम का प्रचार करने लगा। १३०५ में इस्लामी आक्रान्ता अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा को हराने के उद्देश्य से आक्रमण किया। मौलाना हिंदुत्व की जड़ को पिछले कई वर्षों से मालवा में बलहीन कर ही रहा था। खिलजी का कार्य सहज हो गया, उसने हिन्दुओं के मानबिन्दुओं को ध्वस्त करना प्रारम्भ किया। भोजशाला हिन्दू मानबिन्दुओं में प्रमुख थी तो स्वाभाविक ही उसे भी ध्वस्त करने का कार्य धूर्त खिलजी ने किया।
खिलजी के बाद भी भारत में आक्रान्ता आते गए और भोजशाला ध्वस्त होती रही। जब १४०४ में दिलावर खां ने आक्रमण किया तो उसने भोजशाला के सूर्यमार्तण्ड मन्दिर को ध्वस्त कर दिया और भोजशाला के कुछ हिस्से को मस्जिद में परिवर्तित कर दिया। फिर महमूदशाह ने पूरी भोजशाला को ही मस्जिद में परिवर्तित करने का प्रयत्न किया। कमाल मौलाना की मृत्यु के २५० वर्षों बाद भोजशाला में उसका मकबरा बनाया, जबकि कमाल मौलाना की मृत्यु अहमदाबाद में हुई थी और वहीं उसे दफनाया गया था, फिर भी यह षड्यंत्र रचा गया।
लेकिन इस्लामी आक्रान्ता अपने षड्यन्त्रों में सफल यूँ ही हो गए हों ऐसा कतई नही है। पग-पग पर हिन्दुओं ने अपनी माँ के धाम की रक्षा के लिए कितने ही संघर्ष किये, बलिदान दिए। जब खिलजी ने आक्रमण किया तो वीर गोगादेव और राजा महलकदेव ने हजारों वनवासी शूरवीरों के साथ युद्ध किया, अपने जीते-जी उस आक्रान्ता को भोजशाला में प्रवेश नहीं करने दिया। जब माँ के इन बेटों ने लड़ते-लड़ते अपना जीवन बलिदान कर दिया, तब जाकर खिलजी कहीं भोजशाला में प्रवेश पा सका। लेकिन उसका यह मार्ग भी निष्कंटक नहीं था। भोजशाला के आचार्यों और विद्यार्थियों ने कड़ा संघर्ष किया। पराजित होने पर खिलजी ने उन्हें बंदी बना लिया। १२०० साधकों के सम्मुख तलवार और कुरान में से किसी एक को चुनने का विकल्प रखा गया। धर्मरक्षकों ने मुक्ति को चुना, सुन्नत को नहीं और इन सब विद्वानों को भोजशाला में वर्षों से अविरत चल रहे यज्ञ में डाल दिया गया, जो किसी कारण से जीवित बच गये उन्हें नारकीय यातनाएं दी गईं।
भोजशाला को ध्वस्त करने का और उसके संरक्षण के लिए होने वाले संघर्षों और बलिदान का क्रम कभी नहीं रुका और भोजशाला के लिए इस्लामी आक्रान्ताओं से सतत होते संघर्ष और बलिदान के मध्य ही देश पर अंग्रेजों का शासन हुआ। अंग्रेज़ धूर्त प्रवृत्ति के थे, वो मुगलों की तरह तलवार से नहीं वरन बुद्धि से हिन्दुओं के मानबिंदुओं को नष्ट कर रहे थे। भोजशाला में सर्वाधिक श्रद्धा का केंद्र भगवती वागेश्वरी की प्रतिमा थी उसे लार्ड कर्जन ने एतिहासिक महत्व की वस्तु बताकर अपने अधीन कर लिया और लन्दन ले गया और मूर्ति आज भी लन्दन में कैद है।
एक तरफ हिन्दू समाज मूर्ति की वापसी और भोजशाला के गौरव की प्राप्ति के लिए संघर्ष कर रहा है तो दूसरी ओर मुस्लिम कट्टरपंथी इसे मस्जिद बनाने का व्यर्थ और तर्कहीन प्रयास कर रहे हैं। स्वतन्त्रता के पश्चात भी तुष्टीकरण की राजनीति के कारण सरकारों ने हिन्दुओं की श्रद्धा को अनदेखा किया। दिग्विजय सिंह ने तो इसकी हद ही कर दी, मुख्यमंत्री रहते हुए हिन्दुओं को वर्ष में मात्र एक वसन्त पंचमी के दिन सशर्त पूजन की अनुमति दी गई और मुस्लिमों को वर्ष भर नमाज की अनुमति दी गई। दिग्विजय सिंह से तो यही आशा थी किन्तु शिवराजसिंह चौहान से नहीं थी। तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके शिवराजजी की ये उदासीनता खटकती है, जैसे हिंदुत्व की बात करना हिन्दुओं के साथ उनका छलावा भर है।
इसलिए अब मध्यप्रदेश सरकार को प्रतिमा को लन्दन से लाने का केंद्र सरकार के सहयोग से सफल प्रयत्न करना चाहिए और भोजशाला को विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृत अकादमी बनाने का, भोजशाला के गौरव की पुन: प्राप्ति का अनुष्ठान करना चाहिए। संस्कृत, साहित्य, कला इत्यादि क्षेत्रों में कार्य करने वालों को अपनी अकादमियां, संस्थान धार में प्रारम्भ करना चाहिए और सम्पूर्ण समाज को वाग्देवी की वापसी के लिए सरकार पर तीव्र आन्दोलन का दबाव बनाना चाहिए। साथ ही भोजशाला के उद्भव, वैभव, पराभव के बारे में पढ़ना और जानना चाहिए और अपने स्वजनों को बताना चाहिए। ध्यान में रखने योग्य बात यह है कि वाग्देवी की प्रतिमा का लन्दन से वापस लाना बिल्कुल सम्भव है। हाल ही में काशी विश्वनाथ कोरिडोर में प्रतिष्ठित अन्नपूर्णा माता की प्रतिमा, अयोध्या में आयी प्रतिमाएं विदेशों से ही लायी गई हैं। इसलिए वाग्देवी सरस्वती की प्रतिमा भी पुन: भोजशाला में आ सकती है और प्रतिष्ठित भी हो सकती है और धारानगरी फिर से विश्व का संस्कृत केंद्र भी बन सकती है और तभी इस असह्य दुःख का शमन होगा और तभी जाकर मात्र वसन्त में ही वसन्त नहीं होगा वरन पतझड़ में भी वसन्त होगा।
श्री अमन व्यास

