
लेखिका : श्रीमती नम्रता
मध्य प्रदेश का मालवा और निमाड़ क्षेत्र कृषि की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से गेहूं, सोयाबीन, मक्का, कपास और चना जैसी फसलें उगाई जाती हैं। फसल कटाई के बाद खेत में बचा हुआ डंठल और अवशेष नरवाई कहलाता है। किसानों द्वारा नरवाई को जलाने की परंपरा रही है, लेकिन इससे पर्यावरण, मिट्टी की उर्वरता और मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए इन क्षेत्रों में नरवाई प्रबंधन (Crop Residue Management) बहुत आवश्यक है।
मालवा–निमाड़ क्षेत्र में नरवाई की समस्या
मालवा–निमाड़ में बड़े पैमाने पर सोयाबीन और गेहूं की खेती होती है। फसल कटाई के बाद खेत में बड़ी मात्रा में अवशेष रह जाते हैं। समय की कमी और श्रम लागत अधिक होने के कारण किसान अक्सर नरवाई जला देते हैं।
इससे निम्न समस्याएँ उत्पन्न होती हैं—
- मिट्टी की उर्वरता कम होती है
- वायु प्रदूषण बढ़ता है
- खेत के लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं
- दुर्घटनाओं और आग फैलने का खतरा बढ़ जाता है
नरवाई जलाने से होने वाले नुकसान
- मिट्टी के पोषक तत्वों की हानि – जलाने से नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश आदि तत्व नष्ट हो जाते हैं।
- पर्यावरण प्रदूषण – धुआँ और कार्बन गैसें वातावरण को प्रदूषित करती हैं।
- मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव – धुआँ सांस और आंखों की समस्याएँ बढ़ाता है।
- जैव विविधता पर प्रभाव-नरवाई जलाने से मिट्टी में रहने वाले केंचुए, कीट और अन्य लाभदायक जीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है।
नरवाई प्रबंधन के उपाय
- कृषि यंत्रों की उपलब्धता और सब्सिडी
मध्य प्रदेश कृषि अभियांत्रिकी विभाग नरवाई प्रबंधन के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है।विभाग किसानों को नरवाई प्रबंधन के लिए आधुनिक कृषि यंत्र उपलब्ध कराने में मदद करता है।मुख्य यंत्रों में शामिल हैं—
(i)हैप्पी सीडर (Happy Seeder) – नरवाई के बीच सीधे बुवाई करने के लिए
(ii)सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (SMS) – कंबाइन हार्वेस्टर के साथ अवशेष फैलाने के लिए
(iii)रोटावेटर और मल्चर – फसल अवशेष को मिट्टी में मिलाने के लिए
(iv)स्ट्रॉ रीपर – नरवाई को काटकर उपयोगी बनाने के लिए
इन यंत्रों पर सरकार द्वारा अनुदान (सब्सिडी) दिया जाता है जिससे किसान आसानी से इन्हें खरीद सकें। - कस्टम हायरिंग सेंटर की स्थापना
विभाग द्वारा गांवों में कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित किए गए हैं। यहाँ से किसान कम किराए पर कृषि यंत्र लेकर नरवाई प्रबंधन कर सकते हैं। इससे छोटे और सीमांत किसानों को विशेष लाभ मिलता है। - किसानों का प्रशिक्षण और जागरूकता
कृषि अभियांत्रिकी विभाग किसानों को प्रशिक्षण कार्यक्रमों और कार्यशालाओं के माध्यम से यह सिखाता है कि नरवाई को जलाने के बजाय किस प्रकार वैज्ञानिक तरीके से उसका प्रबंधन किया जाए।जागरूकता अभियानों के माध्यम से किसानों को इसके पर्यावरणीय और आर्थिक लाभ समझाए जाते हैं।
(4) मल्चिंग (Mulching)
फसल अवशेषों को खेत में ही बिछाकर मिट्टी की नमी बनाए रखने और खरपतवार नियंत्रण में मदद मिलती है।
(5) कम्पोस्ट और जैविक खाद बनाना
नरवाई को सड़ाकर जैविक खाद बनाई जा सकती है जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है।
(6) पशु चारा और बायोगैस
कुछ अवशेषों का उपयोग पशु चारे या बायोगैस उत्पादन में किया जा सकता है।
(7) प्राकृतिक खेती में उपयोग
नरवाई का उपयोग मल्चिंग और जीवामृत जैसी तकनीकों में किया जाता है जिससे मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है।

निष्कर्ष-
मालवा–निमाड़ क्षेत्र में नरवाई प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है। नरवाई जलाने के बजाय वैज्ञानिक और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को अपनाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी, प्रदूषण कम होगा और किसानों की आय में भी वृद्धि होगी। इसलिए किसानों को जागरूक कर आधुनिक कृषि तकनीकों को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।