
कुछ लोगों को हर परिस्थिति में विवाद, जय में पराजय और उजाले में भी अंधकार खोजने की ऐसी आदत पड़ गई है कि रोने के बहाने ढूँढना ही उनका शास्त्र बन गया है। रुदनमण्डल की इस मानसिकता को समझना कठिन नहीं—ये लोग समाधान नहीं, सिर्फ़ शोर चाहते हैं।
बसंत पंचमी के पावन पर्व पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक अखंड, विधि-विधानपूर्वक, गरिमा और गौरव के साथ पूजा-अर्चना की स्पष्ट और अटल अनुमति दी गई है। यह केवल पूजा नहीं—यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास की पुनर्प्रतिष्ठा है।
पूजा-पद्धति के बीच किसी भी प्रकार का अवरोध, रुकावट या यति नहीं होगी। प्रशासन ने यह भी सुनिश्चित किया है कि एकदम पृथक स्थान, पृथक मार्ग और सीमित पास-व्यवस्था के माध्यम से एक अलग स्थान पर शुक्रवारी नमाज़ तय समय पर, निश्चित संख्या में, पास लेकर, अनुमति प्राप्त लोगों की- बिना किसी टकराव के संपन्न हो सके।
विजय का अर्थ समझना हो तो उन लोगों की आँखों में देखिए, जो वर्षों से अपने घर–परिवार, मकान–दुकान और जीवन तक दांव पर लगाकर धैर्य, अनुशासन और सत्य के साथ इस आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके लिए यह केवल निर्णय नहीं—सम्मान, संघर्ष और संकल्प की विजय है।
भोजशाला की विजय केवल एक आदेश नहीं—यह सांस्कृतिक सत्य की पुनर्स्थापना है। सुप्रीम कोर्ट में धर्म की जीत और हाईकोर्ट में अधर्म की हार यह प्रमाणित करती है कि इतिहास चाहे जितना दबाया जाए, सत्य अपने समय पर स्वयं उदित होता है।
वसंत पंचमी पर भोजशाला में हिंदुओं को अखंड पूजा का मिला अधिकार केवल पूजा–अनुष्ठान का अवसर नहीं—यह उन अनगिनत पीढ़ियों की आत्मा का सम्मान है, जिन्होंने इस भूमि को वाग्देवी की तपोभूमि माना और उसके संरक्षण के लिए संघर्ष किया।
और आनंद यह कि सर्वे रिपोर्ट पर लगी रोक हटते ही भोजशाला सत्य की ओर एक और निर्णायक कदम बढ़ा! अब हाईकोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई केवल एक केस का फैसला नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति केश्रपुनर्जागरण की दिशा में ऐतिहासिक प्रस्थान है।
भोजशाला केवल एक संरचना नहीं …यह धर्म, संस्कृति, शिक्षा और राष्ट्रगौरव का संगम है।यह वह स्थान है जहाँ देवी वाग्देवी की वाणी फूटी, जहाँ ज्ञान का दीप जला, जहाँ भारत का बौद्धिक रक्त बहता था।आज उस पर विजय का मार्ग स्पष्ट दिख रहा है। और यह विजय किसी एक संगठन, किसी एक कार्यकर्ता की नहीं, बल्कि समूचे हिन्दू समाज के धैर्य, तप, सत्यनिष्ठा और न्याय-संकल्प की विजय है।
अब समय है भोजशाला को वैदिक परंपरा, शिल्पकला, भारतीय शिक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता के केंद्र के रूप में पुनः स्थापित करने का।सत्यता विलंबित हो सकती है, पर पराजित नहीं। भोजशाला इसका जीवंत प्रमाण है।
-कैलाशचंद्र जी