समाज और राष्ट्र में सत्यम, शिवम और सुंदरम की स्थापना करना ही संघ का उद्देश्य – डॉ. मोहन भागवत जी

VSK Bharat

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने नागपुर में एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि संघ का मुख्य उद्देश्य समाज और राष्ट्र में ‘सत्यम, शिवम और सुंदरम’ की स्थापना करना है। रेशीमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार स्मृतिमंदिर परिसर में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में उन्होंने यह विचार व्यक्त किए।

‘राष्ट्र स्वराधना’ ग्रंथ का हुआ लोकार्पण

कार्यक्रम के दौरान नागपुर महानगर के घोष पथक के ऐतिहासिक सफर पर आधारित ‘राष्ट्र स्वराधना’ नामक हस्तलिखित ग्रंथ का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर विदर्भ प्रांत संघचालक दीपक तामशेट्टीवार, सह संघचालक श्रीधर गाडगे और महानगर संघचालक राजेश लोया प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम में नागपुर महानगर के घोष वादकों ने अपनी शानदार रचनाएं और प्रात्यक्षिक प्रस्तुतियां भी दीं।

समन्वय और एकता का संदेश

संघ के घोषदल का उदाहरण देते हुए डॉ. भागवत ने समन्वय की महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के घोषदल में विभिन्न वाद्य यंत्र होते हैं, जिनके स्वर और ध्वनि अलग-अलग होते हुए भी स्वयंसेवक एक ही ताल पर चलते हैं”। उन्होंने आगे बताया कि जब कोई भी कार्य पूरी निष्ठा के साथ किया जाता है, तो उससे ‘सत्यम-शिवम-सुंदरम’ का अनुभव होता है।

शताब्दी वर्ष कोई उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन का अवसर

संघ के 100 वर्ष पूरे होने के संदर्भ में सरसंघचालक ने कहा कि यह कोई ‘सेलिब्रेशन’ या उत्सव नहीं है। यह पूर्वजों का स्मरण करते हुए आत्मावलोकन करने और अधिक उन्नत स्थिति की ओर बढ़ने का एक विशेष अवसर है। उन्होंने यह भी कहा कि संघ का उद्देश्य अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कराना नहीं है, क्योंकि इस सौ वर्षों की यात्रा का श्रेय देश की जनता और समाज को जाता है।

स्वयंसेवकों के परिश्रम से खड़ा हुआ संघ

डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि आरएसएस का कार्य किसी की कृपा से नहीं बढ़ा है और न ही किसी की अवकृपा से रुका है। यह केवल स्वयंसेवकों के निरंतर परिश्रम का ही साकार रूप है। आज संघ देश को दिशा दिखाने वाली एक बड़ी शक्ति के रूप में खड़ा है, जिसके लिए सभी स्वयंसेवकों ने अपना पूरा जोर लगा दिया।

‘शरीर के अभ्यास से बनता है मन’

हिन्दू समाज को संगठित करने के विषय पर बात करते हुए भागवत ने कहा कि कदम से कदम और स्वर में स्वर मिलाने का अभ्यास होना चाहिए। उन्होंने वैज्ञानिक सत्य का हवाला देते हुए बताया कि “शरीर की कृति मन पर परिणाम करती है, और शरीर के अभ्यास से ही मन बनता है”। संघ के सभी कार्यक्रमों का मूल उद्देश्य सुदृढ़ शरीर और संस्कारित मन के समन्वय से जीवन को गुणवत्तापूर्ण बनाना है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *