
छत्रपति शिवाजी महाराज का हमारे देश के इतिहास में जो योगदान है वह कितना महत्वपूर्ण है, यह समझने के लिए आवश्यक है कि हम यह देखें कि उस दौर में स्थानीय प्रजा किन भयानक परिस्थितियों से गुजर रही थी। इसके लिए इतिहास के पृष्ठों से कुछ उदाहरण देखना प्रासंगिक होगा…
मुहम्मद तुगलक को शिकार पसन्द था। मनुष्यों का शिकार! अक्सर वह अपने सैनिकों के साथ किसी गांव को घेर लेता और फिर अपने घेरे को गांव के चारों ओर कसता जाता। इस दौरान जो भी नजर आता उसका शिकार किया जाता।
तैमूर ने दिल्ली पर हमला किया। इतिहासकारों के अनुसार पांच दिनों तक उसने दिल्ली की सड़कों पर कत्लेआम कर निरपराध लोगों के रक्त की नदियां बहा दी। सड़कें रक्त से सराबोर हो गई और लाशें पूरे शहर में बिखरी पड़ी थी। उस समय के विश्व के सबसे संपन्न नगर दिल्ली से उसने विपुल धन लूटा और अपने साथ ले गया। परन्तु उसके पूर्व उसने लाखों लोगों का नरसंहार कर दिल्ली को लुहलुहान कर दिया।
16 वीं शती का इतिहासकार मुहम्मद क़ासिम फिरिश्ता लिखता है कि सुल्तान शहाबुद्दीन बहमनी ने विजयनगरम साम्राज्य के साथ हुई अपनी संधि को तोड़ते हुए विजय के पश्चात पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को मौत के घाट उतारा दिया। जहां कहीं इस कत्लेआम की संख्या 20000 के ऊपर चली जाती, वहां कुछ समय रुक कर वह जश्न मनाता था।
निजाम के शासन के दौरान मीरान हुसैन, शराब के नशे धुत्त हो कर घोड़े पर सवार हो कर निकल पड़ता था। उसके साथ उसके कुछ मित्र होते थे। रास्ते में आने वाले लोगों पर अंधाधुंध प्रहार कर उन्हें मार डालना उसका शौक था।
फिरिश्ता ने एक जगह लिखा है कि अल्लाहउद्दीन बहमनी, शादी के मण्डप से दुल्हनों को उठा लेता था और उनका बलात्कार कर उन्हें लौटा देता था। ये अत्याचार मुग़ल काल में भी बदस्तूर जारी रहे।
सर थॉमस रो, जो मुगल काल में भारत आए थे, लिखते हैं ‘एक बार जहांगीर के दरबार में 100 चोर हाजिर किए गए। बगैर किसी पूछताछ या मुकदमे के उनके नेता को जंगली कुत्तों के सामने फिकवा दिया गया और अन्यों को कत्ल कर दिया गया। मेरे घर के सामने ही 12 कुत्ते उस नेता को नोच कर खा गए जबकि उसके साथियों को नंगा कर उनके सिर कलम कर दिए गए। उनकी लाशे सड़क पर सड़ती रही..’
(सभी वाकयों के लिए संदर्भ : ‘शक कर्ते शिवराय’ लेखक विजय देशमुख, मूल मराठी)
ये वाक़ए अपवादस्वरूप नहीं थे। ये तो कुछ प्रतिनिधि उदाहरण भर है। सत्य तो यह है कि शिवाजी महाराज के जन्म से पूर्व, भारत की आम जनता सैकड़ों वर्षों तक अमानवीय अत्याचार सहन कर रही थी। शासकों को प्रजा के प्रति कोई स्नेह नहीं था। वे हिन्दू किसानों पर भारी करों का बोझ लाद देते थे और तलवार के बल पर उसे वसूल करते थे। सूखा पड़ता था, अतिवृष्टि से फसलें बर्बाद होती थी परन्तु किसानों को कोई रियायत नहीं मिलती थी।
सैनिक गांवों में घुस कर किसानों को लूट लिया करते थे। कर इकट्ठा करने वाले अधिकारी, आतंक का पर्याय थे। कब कौन अधिकारी करों को वसूल करने के बहाने आ कर धन, फसल और स्त्रियों को उठा कर ले जाएगा इसका कोई भरोसा नहीं था। यह सब संभव था, क्योंकि कोई न्याय व्यवस्था थी ही नहीं। शासक मौलवियों द्वारा बताए गए इस्लामी नियमों के आधार पर शासन चलते थे। काज़ी ही न्यायाधीश होता था। कोई लिखित नियम नहीं थे और काज़ी अपनी मर्जी के अनुसार निर्णय देता था जो निर्णय अन्तिम रहता था। आम आदमी कहां गुहार लगाए? किसके पास शिकायत करे? तथाकथित रक्षक ही भक्षक बने बैठे थे।
कईं शासक हिंदुओं के घोड़े, पालखी या हाथी पर बैठने पर प्रतिबंध लगा देते थे। वे शाही पोशाख नहीं पहन सकते थे। बर्नियर ने उस समय के हालात बताते हुए लिखा था कि “किसानों और अन्य मजदूरों का शोषण इतना अधिक है कि उनके लिए जीवित रहना भी असम्भव हो जाता है। वे गरीबी में संघर्ष करते रहते हैं। उनके बच्चे भूख से मर जाते हैं और वे एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहते हैं।”
जब देश और हिन्दू समाज इन भीषण परिस्थितियों से जूझ रहा था, तब सन 1630 में 19 फरवरी को महाराष्ट्र के शिवनेरी में एक बच्चे का जन्म हुआ जिसकी माता ने उसका नाम रखा शिवाजी!
शिवाजी किसी राजपरिवार के सदस्य नहीं थे। उन्हें अपने राज्य की रक्षा हेतु या राज्य पुनः प्राप्त करने हेतु मुगलों से लड़ने की आवश्यकता भी नहीं थी। उसी काल के कौन अन्य लोगों की तरह वे भी मुगलों के मुलाजिम बन आराम का जीवन जी सकते थे। परन्तु वे मुगलों के विरुद्ध खड़े हुए। स्वयं के लिए नहीं, सिर्फ और सिर्फ स्वराज्य की स्थापना के लिए। उनके पास न कोई सेना थी, न धन था, न साधन, और लड़ाई थी भारत के इतिहास के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक से जिसके पास बेशुमार दौलत, विशाल सेना और संसाधन थे। ऐसी परिस्थिति में यह सोचना भी असंभव था कि उस शक्ति के विरुद्ध खड़ा हुआ जा सकता है।
परन्तु शिवाजी महाराज ने न सिर्फ सोचा, बल्कि करके भी दिखाया। स्थानीय जनजातियों के युवाओं को साथ ले कर उन्होंने पराकाष्ठा के शौर्य, दूरदृष्टी के प्रदर्शन के साथ अतुलनीय नेतृत्व के सामर्थ्य पर मराठों को ऐसी शक्ति के रूप में संगठित किया कि भारतीय इतिहास के अगले 200 वर्षों में मराठों ने भारत देश को विदेशी आक्रांताओं के चंगुल से लगभग मुक्त कर दिया था।
ऐसे महान् व्यक्तित्व की जयंती पर सादर नमन।
श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर 19/02/2026