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अस्पृश्यता रोग की जड़ जन सामान्य के इस विश्वास में निहित है कि यह धर्म का अंग है और इसका उल्लंघन महापाप होगा। यह विकृत धारणा ही वह मूल कारण है, जिससे शताब्दियों से अनेक समाज- सुधारकों, धर्माचार्यों के समर्पित प्रयासों के बाद भी यह घातक परम्परा जनसामान्य के मन में आज भी घर किए बैठी है। गुरुनानक देव जी, आचार्य रामानुज, बसवेश्वर, शंकरदेव, स्वामी दयानन्द, नारायण गुरु, गाँधी जी और वीर सावरकर सरीखे अनेक महापुरुषों ने हिन्दू-समाज के मस्तक पर लगे इस कलंक को मिटाने का अथक प्रयास किया है। फिर भी यह कलुषित दाग विद्यमान है।
मिथ्या धर्मधारणा से उत्पन्न इस सामाजिक बुराई में यह अन्तर्निहित है कि जन सामान्य की दृष्टि में अधिकाधिक धर्म-प्रवक्ता के रूप में मान्य परम्परागत मठाधीशों को ही इस अधार्मिक आचरण का निदान प्रस्तुत करने हेतु प्रस्तुत होना चाहिए। इस दिशा में सन् 1969 में विश्व हिन्दू परिषद के उडुपी (कर्नाटक) सम्मेलन में एक सही शुरुआत की गई। इसमें शैव, वीर शैव, माध्व, वैष्णव, जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि समस्त हिन्दू सम्प्रदायों का प्रतिनिधित्व हुआ था। सम्मेलन में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर सम्पूर्ण हिन्दू जगत का आह्नान किया गया कि वे श्रद्धेय आचार्यों व धर्मगुरुओं के निर्देशानुसार अपने समस्त धार्मिक व सामाजिक अनुष्ठानों से अस्पृश्यता को निकाल बाहर करें।
धर्माचार्यों का आदेश-निर्देश
पूज्य धर्माचार्यों का ऐतिहासिक निर्देश इस प्रकार है कि ‘समस्त हिन्दू समाज को अविभाज्य एकात्मता के सूत्र में पिरोकर संगठित करने एवं स्पृश्य-अस्पृश्य की भावना व प्रवृत्ति से प्रेरित विघटन को रोकने के उद्देश्य की प्राप्ति हेतु विश्वभर के हिन्दुओं को अपने पारस्परिक व्यवहार में एकात्मता एवं समानता की भावना को बरकरार रखना चाहिए।’ निस्संदेह इस प्रस्ताव की स्वीकृति हिन्दू समाज के इतिहास में क्रान्तिकारी महत्त्व का कदम माना जा सकता है। यह एक विकृत परम्परा पर सच्ची धर्मभावना की विजय का स्वर्णिम क्षण था। (श्री गु. स. खं 11, पृ. 237-238)
एकता पर बल दो, भेदों की अनदेखी करो
इसके लिए भजन कीर्तन अथवा रामायण व महाभारत की कथाओं को सुनाने आदि का कार्यक्रम किया जा सकता है, जहाँ सभी हिन्दू विशुद्ध धर्म प्रेम की पवित्र धारा में समान भ्रातृ-भावना से अनुप्राणित होकर अस्पृश्य-स्पृश्य आदि का भेद भूलकर एकत्र हों।
साक्षरता, स्वास्थ्य, खेल इत्यादि के प्रोत्साहन हेतु सेवा प्रकल्प प्रारम्भ किए जा सकते हैं। इस हेतु आधुनिक दृश्य-श्रव्य उपकरणों को भी उपयोगी ढंग से अपनाया जा सकता है। परन्तु इन सभी गतिविधियों का केन्द्रबिन्दु हृदय को प्रभावित करना, एकताकारी सत्प्रवृत्तियों पर बल देना तथा मतभेदों की उपेक्षा करना होना चाहिए।
इस स्वर्णिम सिद्धान्त का अक्षरशः आचरण करने के कारण ही संघ में जाति-वर्ग, पंथ, भाषा अथवा अन्य किसी प्रकार के भेदों का नाम तक नहीं है। समाज के प्रत्येक क्षेत्र से आए लाखों स्वयंसेवक एक साथ उठते-बैठते, खाते-पीते तथा खेलते हैं। वे यह जानने की चिन्ता भी नहीं करते कि उनके बगल में बैठा स्वयंसेवक किस जाति बिरादरी का है। ( श्री गु. स. खं. 11, पृ. 242-243)