अब भारत तय करेगा दुनिया की रेटिंग !!!

रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स : पश्चिमी एकाधिकार को चुनौती देता भारतीय दृष्टिकोण

पिछले कई दशकों से वैश्विक मंच पर राष्ट्रों के मूल्यांकन, रैंकिंग और प्रतिष्ठा को तय करने का अधिकार कुछ चुनिंदा पश्चिमी संस्थाओं के हाथों में सिमटा रहा है। वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स, प्रेस फ्रीडम इंडेक्स, डेमोक्रेसी इंडेक्स जैसे अनेक सूचकांकों के माध्यम से यह तय किया जाता रहा कि कौन सा देश लोकतांत्रिक है, कौन स्वतंत्र है, कौन खुश है और कौन जिम्मेदार। इन सूचियों में अक्सर भारत जैसे प्राचीन सभ्यतागत राष्ट्र को पीछे और अनेक विरोधाभासी उदाहरणों को आगे दिखाया जाता रहा। यह केवल सांख्यिकीय विसंगति नहीं थी, बल्कि एक वैचारिक पूर्वाग्रह भी था। दुर्भाग्यवश, भारत के भीतर भी एक ऐसा वर्ग रहा है जो इन रिपोर्टों को अंतिम सत्य मानकर देश की छवि को कमजोर करने का माध्यम बनाता रहा। ऐसे समय में भारत द्वारा ‘रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स (RNI)’ की शुरुआत एक ऐतिहासिक और वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है।

शक्ति से आगे जिम्मेदारी का प्रश्न :अब तक वैश्विक रेटिंग्स मुख्यतः तीन आधारों पर केंद्रित रही हैं किसी देश की आर्थिक समृद्धि , उसकी सैन्य और तकनीकी शक्ति, उसकी विकास दर और उपभोग क्षमता लेकिन RNI एक मौलिक और गहन प्रश्न उठाता है—क्या कोई देश अपनी शक्ति का प्रयोग जिम्मेदारी से कर रहा है? क्या उसकी समृद्धि वैश्विक शांति, पर्यावरणीय संतुलन और मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ कर रही है, या केवल संसाधनों के दोहन और असमानता को बढ़ावा दे रही है?


यह वही प्रश्न है जिसे भारत सदियों से अपने दर्शन में केंद्र में रखता आया है—‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’। भारत की दृष्टि में राष्ट्र की महानता केवल उसकी ताकत से नहीं, बल्कि उसके आचरण से तय होती है।

तीन वर्षों का शोध, भारतीय विवेक : रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स कोई भावनात्मक या तात्कालिक पहल नहीं है। इसे वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन ने दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) और मुंबई के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (IIM) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के सहयोग से लगभग तीन वर्षों के गहन शोध के बाद तैयार किया है। इस इंडेक्स में वर्ल्ड बैंक, संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के 2023 तक के उपलब्ध आंकड़ों का उपयोग किया गया है। अंतर यह है कि इन आंकड़ों को पश्चिमी राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यतागत विवेक से परखा गया है।

पश्चिमी सूचकों का पाखंड : जब वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स में पाकिस्तान को भारत से अधिक खुशहाल बताया जाता है, या प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में बांग्लादेश को भारत से ऊपर स्थान दिया जाता है, तब स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि इन सूचकों के मानदंड कितने यथार्थवादी और निष्पक्ष हैं। क्या ये सूचक वास्तव में जमीनी सच्चाइयों को प्रतिबिंबित करते हैं या किसी विशेष वैचारिक एजेंडे से प्रेरित हैं? RNI ऐसे ही प्रश्नों का उत्तर है। यह किसी देश को कमतर या श्रेष्ठ साबित करने का उपकरण नहीं, बल्कि वैश्विक जिम्मेदारी को मापने का एक वैकल्पिक ढांचा है।


भारत : मूल्यांकन का विषय नहीं, मूल्यांकनकर्ता-पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा इस इंडेक्स का विमोचन इस बात का संकेत है कि भारत अब केवल वैश्विक रेटिंग्स का उपभोक्ता नहीं रहा। भारत उस चरण में प्रवेश कर चुका है जहां वह स्वयं वैश्विक विमर्श की दिशा तय कर सकता है। यह पहल स्पष्ट संदेश देती है कि भारत को अपनी उपलब्धियों के लिए किसी पश्चिमी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। भारत अब न केवल अपने लिए, बल्कि दुनिया के लिए भी यह तय करने की स्थिति में है कि जिम्मेदारी का अर्थ क्या है। यह देखना दिलचस्प होगा कि जो राजनीतिक और बौद्धिक वर्ग अब तक पश्चिमी सूचकों के आधार पर भारत की आलोचना करता रहा है, वह RNI पर कैसी प्रतिक्रिया देता है। यदि वे वास्तव में तथ्यों और निष्पक्षता में विश्वास रखते हैं, तो उन्हें इस भारतीय पहल का स्वागत करना चाहिए। लेकिन यदि उनकी आलोचना चयनात्मक रही है, तो RNI उनके वैचारिक दोहरेपन को भी उजागर करेगा।


रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स दुनिया को यह संदेश देता है कि 21वीं सदी केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धा की सदी नहीं है। यह जिम्मेदारी, संतुलन और सह-अस्तित्व की सदी है। भारत यह मानता है कि शक्ति का उद्देश्य वर्चस्व नहीं, बल्कि संरक्षण होना चाहिए। विकास का लक्ष्य केवल GDP वृद्धि नहीं, बल्कि मानवता की उन्नति होना चाहिए। RNI भारत की वैचारिक आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। यह पहल बताती है कि भारत अब न केवल आर्थिक और सैन्य रूप से सशक्त हो रहा है, बल्कि बौद्धिक और नैतिक नेतृत्व की भूमिका भी निभाने के लिए तैयार है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स भविष्य में वैश्विक विमर्श की दिशा बदलने की क्षमता रखता है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह रेटिंग का विषय नहीं, बल्कि रेटिंग तय करने वाला राष्ट्र है।

– राजेश कुमरावत “सार्थक”

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं। वे भारतीय सभ्यतागत दृष्टि, राष्ट्रकेंद्रित विमर्श और वैश्विक मुद्दों पर भारतीय पक्ष को प्रमुखता से रखते रहे हैं।


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