
भौंगर्या हाट–बाज़ार मध्य भारत के जनजातीय क्षेत्रों की शताब्दियों पुरानी आर्थिक और सामाजिक परंपरा है, जिसे होली दहन के पहले सप्ताह में आसपास के साप्ताहिक हाट-बाजार एवं विभिन्न स्थानों पर विशेष रूप में भौंगर्या हाट आयोजित किया जाता है।
इसका मूल स्वरूप केवल और केवल एक चल समयिक हाट–बाज़ार का है, जहाँ जनजाति परिवार अपने दैनिक जीवन और त्योहार संबंधी आवश्यक वस्तुओं की खरीद–फरोख्त करते हैं। किंतु विडंबना यह है कि जिस वास्तविक, सरल और व्यावहारिक लोक–व्यवस्था को जनजाति समाज ने कभी किसी रहस्य, परिणय या रोमांटिकता के रूप में नहीं देखा, उसी को बाहरी समाज, कुछ लेखकों और मीडिया ने बेवजह आकर्षक कथाओं और झूठे मिथकों से घेर दिया।
इन मिथकों ने भौंगर्या को एक सामान्य हाट–बाज़ार से हटाकर एक विचित्र और मनगढ़ंत “परिणय-पर्व”, “प्रेम-विवाह का आयोजन” और “भागकर शादी करने की परंपरा” का रूप देकर समाज के सामने एक विकृत छवि प्रस्तुत की, जिसका जनजातीय संस्कृति से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है।
भौंगर्या शब्द स्वयं स्थानीय बोली और जनजातीय भाषाओं की उस आर्थिक परंपरा की अभिव्यक्ति है, जो सदियों से हाट–बाज़ार के रूप में जीवित रही है। जनजाति जीवन में हाट–बाज़ार केवल व्यापार का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद, पारिवारिक मेल–मिलाप, सामुदायिक आदान–प्रदान और जीवन–यापन की लय का केंद्र भी होता है। होली पूर्व आयोजित भौंगर्या हाट में लोग कपड़े, खान- काकडी, खजुर, व अन्य आवश्यक होली पूजा की सामग्री एवं लकड़ी, सजावटी सामग्री, मिठाइयाँ, बच्चों के खिलौने, कृषि उपकरण, घरेलू वस्तुएँ और त्योहार से जुड़ी हर आवश्यक सामग्री खरीदते हैं। इस पूरे तंत्र में न कहीं विवाह का संकेत है, न कोई ऐसा सामाजिक विधान जो इसे प्रेम–विवाह का मंच बनाता हो।
विगत वर्षों में कई लेखकों, पत्रकारों और कुछ शोधकर्ताओं ने भौंगर्या की वास्तविकता को समझे बिना इसे एक “रोमांचक कहानी” के रूप में प्रस्तुत किया। उनके लेखों में जनजाति युवाओं को ऐसे चित्रित किया गया जैसे वे यहाँ केवल प्रेम–संबंध बनाने या भागकर विवाह करने के उद्देश्य से आते हों, जबकि यह धारणा पूर्णतः असत्य और अनुचित है। जनजाति समुदाय अपने विवाह संबंधी निर्णय अत्यंत सामूहिक, पारिवारिक और सामाजिक नियमों के अनुरूप करता है। प्रेम–विवाह या “भागकर विवाह” जैसी कोई विशेष परंपरा इस हाट–बाज़ार से नहीं जुड़ी। कभी–कभार किसी भी समाज की तरह यहाँ युवाओं का मिलना-जुलना स्वाभाविक है, पर उसे संपूर्ण व्यवस्था का उद्देश्यमूलक आधार बताना जनजाति संस्कृति के सम्मान का हनन है।
सच यह है कि भौंगर्या जनजाति अर्थव्यवस्था की एक जीवंत अनुभूति है, जो समुदाय की स्वावलंबी व्यापार–व्यवस्था और परस्पर निर्भरता को दर्शाती है। इसमें कपड़ा व्यापारी, कुम्हार, लोहार, खिलौने बेचने वाले, मसाले–अनाज वाले, मिठाई विक्रेता, झूले–तमाशे वाले और छोटे–मोटे व्यवसायी शामिल होते हैं। मेले का माहौल बच्चों, महिलाओं और युवाओं के लिए आनंद का विषय होता है, जहाँ लोकनृत्य, ढोल–मांदल और पारंपरिक वेशभूषाएँ वातावरण को जीवंत बना देती हैं। लेकिन इस सांस्कृतिक सौंदर्य को “विवाह–पर्व” कहकर प्रस्तुत कर देना न केवल अज्ञानता है, बल्कि उस संस्कृति की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाली दृष्टि भी है, जिसने अपनी पहचान को प्रकृति, श्रम, सामुदायिक सहयोग और आत्मगौरव पर विकसित किया है।
मीडिया द्वारा फैलाए गए भ्रम इसलिए भी बढ़े क्योंकि जनजाति जीवन के प्रति सामान्य समाज में जिज्ञासा के साथ–साथ अज्ञान भी बहुत है। “अनोखेपन” और “विचित्रता” के आकर्षण में कई पत्रकारों ने तथ्यात्मक अध्ययन के बजाय काल्पनिक कथाओं को प्राथमिकता दी। उन्होंने न तो जनजाति इतिहास को समझा, न उनकी रीतियों का अध्ययन किया, न बुजुर्गों से संवाद किया, न किसी प्रकार का सांस्कृतिक या नृवंशशास्त्रीय अनुसंधान किया। परिणामस्वरूप भौंगर्या की छवि एक रहस्यमय, कल्पनाश्रित और असत्य रूप में समाज के सामने आई। इससे जनजातीय अस्मिता को अनावश्यक क्षति पहुँची, क्योंकि किसी भी समुदाय की संस्कृति को उसके अपने अर्थों में नहीं बल्कि बाहरी लोगों की कल्पनाओं के आधार पर परिभाषित कर दिया गया।
जनजाति समाज के लिए भौंगर्या एक गहरा सांस्कृतिक महत्व रखता है। यह वह अवसर है जब दूर-दूर के गाँवों के परिवार मिलते हैं, पुरानी रिश्तेदारियाँ ताज़ा होती हैं, बच्चे उत्साह से मेले का आनंद लेते हैं और महिलाएँ अपनी आवश्यक घरेलू वस्तुएँ खरीदती हैं। ढोल–मांदल की तालों में नृत्य करने वाले युवाओं की ऊर्जा और सामुदायिक एकता इस बाज़ार को उत्सव जैसा रंग अवश्य देती है, परंतु उत्सव का अर्थ विवाह नहीं होता। उत्सव समुदाय की भाव–प्रकृति का स्वाभाविक रूप है, जिसे गलत समझकर प्रेम–विवाह का रंग देना पूरी प्रक्रिया को विकृत कर देता है।
वास्तविक आवश्यकता यह है कि भौंगर्या को उसके अपने स्वाभाविक और सच्चे रूप में समझा जाए एक हाट–बाज़ार, जो आदिवासी अर्थव्यवस्था की रीढ़, सामुदायिक जीवन की गूँज, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का स्थल और होली की तैयारी का केंद्र है। इसे प्रेम–विवाह की परंपरा बताना जनजाति समाज के स्वाभिमान, अस्तित्व और परंपरा के साथ अन्याय है। अब समय आ गया है कि शोध, दस्तावेज़ीकरण और सही व्याख्या के माध्यम से इस हाट–बाज़ार की वास्तविक पहचान को समाज के समक्ष रखा जाए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भ्रम नहीं, बल्कि तथ्य और सत्य को जानें। किसी समुदाय की संस्कृति को उसके वास्तविक अर्थों में समझना ही उसके सम्मान का आधार है, और भौंगर्या की पुनर्स्थापित वास्तविक छवि यही संदेश देती है कि जनजाति समाज को अब स्वयं अपने अर्थों में सुना और समझा जाए, न कि दूसरों द्वारा गढ़ी गई कहानियों के आधार पर।
भौंगर्या की वास्तविकता को समझने में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जनजालि समाज अपनी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं को केवल प्रतीकों या बाहरी आकर्षणों पर आधारित नहीं करता। उनकी परंपराएँ प्रकृति, कृषि, ऋतुचक्र, सामुदायिक श्रम और परस्पर सहयोग की जीवनधारा में विकसित हुई हैं।
होली उनके लिए केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन, फसल संग्रह, नए समय की शुरुआत और सामुदायिक आनंद का दिन है। इसी कारण होली के पहले लगने वाला भौंगर्या हाट–बाज़ार प्राकृतिक रूप से आर्थिक और सामाजिक तैयारी का स्थल बन गया। यहाँ से रंग, कपड़े, लकड़ी से बने खिलौने, नए कृषि उपकरण, पशु–चारा और घर–गृहस्थी की वस्तुएँ खरीदना व्यावहारिक आवश्यकता है, जो हर वर्ष पीढ़ी दर पीढ़ी इसी स्वरूप में निभाई जाती है। यह निरंतरता सिद्ध करती है कि यह बाज़ार केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन की आवश्यकता के साथ जुड़ा हुआ सामाजिक आयोजन है।
बाहरी समाज का एक और भ्रम यह भी रहा है कि भौंगर्या के अवसर पर जनजाति युवा अपने पारंपरिक वेश में सज–धजकर आते हैं, तो इसे विवाह–मिलन या प्रेम–प्रदर्शन का संकेत मान लिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि किसी भी सामुदायिक उत्सव या मेले में सुन्दर पहनावा, गहने और पारंपरिक वस्त्र धारण करना स्वाभाविक सांस्कृतिक व्यवहार है। जिस प्रकार किसी शहर के मेले में लोग सजकर जाते हैं, उसी प्रकार जनजाति समाज भी अपनी सांस्कृतिक लोक–अभिव्यक्तियों के साथ भौंगर्या में उपस्थित होता है। इसे विवाह का संकेत मान लेना बाहरी दृष्टि की भूल है, न कि समुदाय के भीतर का कोई संदेश।
इतने वर्षों से फैले भ्रमों का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह रहा कि समाज में जनजाति समुदाय के प्रति गलत छवियाँ बन गईं। उन्हें ऐसे समूह के रूप में प्रस्तुत किया गया जो गरीबी, परित्याग या “भागकर विवाह करने” की परंपरा में बंधा है। यह चित्रण अपमानजनक भी है और असत्य भी। जनजाति समाज में विवाह एक अत्यंत सुगठित प्रक्रिया है, जिसमें सामाजिक नियम, वंश, कुटुंब और सामुदायिक सहमति के नियम स्पष्ट हैं। भौंगर्या का इन विधियों से कोई संबंध नहीं। लेकिन मीडिया ने कभी इन वास्तविकताओं को समझने का प्रयास नहीं किया क्योंकि सच्चाई उन्हें उतनी “रोचक” नहीं लगी जितनी मिथकीय कहानियाँ।
समय की आवश्यकता यह है कि भौंगर्या को लेकर बने इन भ्रमों को समाप्त किया जाए और इसे इसके वास्तविक स्वरूप में स्थापित किया जाए। विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, सांस्कृतिक अध्ययन केंद्रों और जनजातीय अध्ययनशालाओं को चाहिए कि वे इस हाट–बाज़ार का प्रामाणिक नृवंशशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत करें। बुजुर्गों की मौखिक परंपराओं, लोक–गीतों, स्थानीय कथाओं और स्मृतियों को संकलित कर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि भौंगर्या की जड़ें व्यापार, समुदाय और त्योहार की सामूहिक तैयारी में हैं, न कि विवाह संबंधी किसी सामाजिक विधान में। यदि इस दस्तावेज़ीकरण को गंभीरता से पूरा किया जाए तो आने वाली पीढ़ियाँ तथ्य और सत्य दोनों जान पाएँगी और संस्कृति के बारे में बाहरी कल्पनाएँ स्वतः विलुप्त हो जाएँगी।
भौंगर्या का संरक्षण केवल एक हाट–बाज़ार की रक्षा नहीं है; यह जनजातिय अस्मिता की रक्षा है। क्योंकि किसी भी गलत व्याख्या से सबसे अधिक क्षति उस समुदाय को होती है जिसकी संस्कृति को गलत अर्थों में प्रस्तुत किया गया हो। आज जब जनजाति समाज अपने अधिकारों, ज्ञान–परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को लेकर अधिक जागरूक हो रहा है, तब भौंगर्या की वास्तविक पहचान को सामने लाना और भी आवश्यक हो गया है। यह पहचान उनके स्वाभिमान का हिस्सा है।
अंततः भौंगर्या हाट–बाज़ार हमें यह सिखाता है कि संस्कृति को समझने के लिए आंखों से अधिक हृदय और धैर्य की आवश्यकता होती है। जनजाति समाज की शांत, सरल, सामुदायिक और श्रम–मूलक जीवनधारा को केवल बाहरी आकर्षण या मान्यताओं से नहीं समझा जा सकता। भौंगर्या कोई रहस्य नहीं यह जीवन का उत्सव है, श्रम का सम्मान है, समुदाय की धड़कन है और होली के स्वागत की तैयारी है। इसकी वास्तविकता को पहचानना केवल शोध का काम नहीं, बल्कि समाज के प्रति नैतिक उत्तरदायित्व भी है।
प्रोफेसर सखाराम मुजाल्दे,
विभागाध्यक्ष जनजातीय अध्ययनशाला, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर, म.प्र.