बांगरू-बाण
श्रीपाद अवधूत की कलम से
“नववर्ष 1 जनवरी से नहीं गुड़ी पड़वा से आरंभ होना चाहिए यह आज के समय की मांग है।”
एक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, व आर्थिक पक्षों के आधार पर तथ्य आधारित विश्लेषण

वैश्विक स्तर पर 1 जनवरी को नववर्ष मनाने की प्रथा जो आज लगभग सार्वभौमिक रूप से अपनाई गई है। उसका कारण पश्चिमी कैलेंडर (Gregorian Calendar) का इतिहास और यूरोपीय साम्राज्यवाद/वैश्विकरण से जुड़ा है। जबकि विभिन्न संस्कृतियों के देश भारत में एक नहीं दो नहीं, बल्कि अनेक नववर्ष मनाए जाते हैं। यहां के अलग-अलग समुदायों के अपने-अपने नववर्ष हैं। अंग्रेजी कैलेंडर का नववर्ष 1 जनवरी को आरंभ होता है जबकि अन्य देशों संस्कृतियों और संप्रदायों को मानने वालों का नववर्ष सामान्यतया मार्च/ अप्रैल माह में ही आरंभ होता है। जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र महीना कहलाता है।
सबसे पहले यह जान ले कि क्रिसमस का अर्थ क्या हैं? ‘क्रिसमस’ का शाब्दिक अर्थ ‘कृष्ण-मास’ इसी महीने में कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को गीता सुनाई थी और यह गीता नामक ग्रन्थ पुरे विश्व के आध्यात्मिक क्षेत्र में नई क्रान्ति लाया था और ऐसी ही क्रान्ति ईसा मसीह के जन्म से हुई ऐसा ईसाई चर्च का मानना था और इसी कारण क्रिसमस को एक्समस (X-mas) कहा जाता हैं। “X” जो रोमन लिपि में दस का भी संकेत हैं और “mas” यानी मास, अर्थात दसवां महीना……..
लैटिन भाषा में डेका/डेसी को 10 कहा जाता है। डेसेम के आधार पर दिसंबर महीने को डेसेंबर कहा गया।
इसी प्रकार संस्कृत-भाषा में सप्ताम्बर, अष्टाम्बर, नवाम्बर, दशाम्बर जैसे शुद्ध संस्कृत रूपों से मिलते प्रतीत होते हैं? विश्व की विशेषतः यूरोप की भाषाओं जननी संस्कृत भाषा मानी गई है। जिसे भारोपीय [ भारत+यूरोपीय] भाषा परिवार कहते हैं। इस कारण इन भाषाओं के शब्दों के स्रोत संस्कृत भाषा ही है।
उस समय दिसम्बर दसवां महीना था जिस कारण इसका X-mas नाम पड़ा……… और मार्च पहला महीना इसलिए होता था क्योंकि भारतीय लोग वह लगभग संपूर्ण विश्व इसी महीने में अपना नववर्ष मनाते थे और अभी भी मनाते आ रहे हैं।
25 दिसंबर क्रिसमस ईसा के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता हैं। इसके एक सप्ताह बाद अर्थात 1 जनवरी को नया साल मनाने की परंपरा आरंभ हुई। इसका मूल कारण है। इस दिन ईसा मसीह का नामकरण हुआ था। नामकरण वाले दिन ईसा मसीह की सुन्नत/खतना {सुन्नत या खतना से मतलब जननांग या लिंग की उपरी चमड़ी को काटना है लिंगमुंडच्छद} हुई थी। यह उस समय की एक यहूदी परम्परा के रूप में प्रचलित थी।
इसके ऐतिहासिक प्रमाण भी प्राप्त होते है। ल्यूक के सुसमाचार, जो कविता के रूप में है। उसके 2:21 के अनुसार “उस समय के राज्यों ने ईसा-मसीह के जन्म (25 दिसंबर क्रिसमस) के आंठवे दिन यानि 1 जनवरी को उस समय के प्रचलित यहूदी कानून के तहत ईसा मसीह की सुन्नत या खतना के पर्व के रूप में मनाया था। उस काल में यह सुन्नत या खतना एक आम परंपरागत रिवाज माना जाता था। मध्यकाल में जब यूरोप में कट्टरपंथी रोमन कैथोलिक चर्च का दबदबा बढा तो उन्होंने ईसा-मसीह को एक दैवीय अवतारी पुरुष के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया और उनके जीवन से सम्बंधित सारी घटनाओं को एक पर्व के रूप में मनाने का चलन शुरू किया। इसी की परिणिति यह नव वर्ष भी है।
जिसे ‘एंग्लिकन’ इस नाम से मनाया जाने लगा। फिर पुनर्जागरण काल में चित्रकारों ने अपनी चित्रकला के विषयो में ईसा मसीह के जीवन से जुडी अनेक घटनाओ को उकेरना शुरू किया। जैसे ‘लास्ट-सपर’ अर्थात अंतिम भोज। तब कई चित्रों में ईसा की सुन्नत के चित्र भी बनाए गए। तब से यह सुन्नत-पर्व नव-वर्ष का पर्व हो गया और एक दूसरे की देखा देखी सभी ने अर्थात विश्व के अन्य देशों ने इसे मनाना आरंभ कर दिया और आज सारा विश्व इसे नव वर्ष के त्यौहार के रूप में मनाता है।”
वास्तविकता यह है कि दुनिया का लगभग प्रत्येक कैलेण्डर सर्दी के बाद बसंत ऋतु से ही प्रारम्भ होते है। यहाँ तक की ईस्वी सन वाला ग्रेगरेरियन कैलेण्डर ( जो आजकल प्रचलन में है ) वो भी मार्च से प्रारम्भ होता था।
दुनिया में सबसे पहले तारो, ग्रहों, नक्षत्रो आदि को समझने का सफल प्रयास भारत में ही हुआ था। तारो , ग्रहों , नक्षत्रो , चाँद , सूरज आदि की गति को समझने के बाद भारत के महान खगोलशास्त्रियो ने भारतीय कलेंडर ( युगाब्द विक्रम संवत शक संवत ) तैयार किया। इसके महत्त्व को उस समय सारी दुनिया ने स्वीकार किया था साथ ही अपनाया भी था।
भारतीय महीनों के नाम जिस महीने की पूर्णिमा जिस नक्षत्र में पड़ती है उसी के नाम पर उसका नामकरण हुआ है। जैसे जिस महीने की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में आती हैं इसलिए उसे चैत्र महीनें के नाम से संबोधित किया जाता है।
भारतीय काल गणना इतनी वैज्ञानिक व्यवस्था है कि सदियों-सदियों तक एक पल का भी अन्तर नहीं पड़ता जबकि पश्चिमी काल गणना में वर्ष के 365.2422 दिन को 30 और 31 के हिसाब से 12 महीनों में विभक्त करते है। इस प्रकार प्रत्येक 4 वर्ष में फरवरी महीनें को लीप-इयर घोषित कर देते है। फिर भी नौ मिनट 11 सेकण्ड का समय बच जाता है। तो प्रत्येक चार सौ वर्षो में भी एक दिन बढ़ाना पड़ता है। तब भी पूर्णांकन नहीं हो पाता है। अभी 10 साल पहले ही पेरिस के अन्तरराष्ट्रीय परमाणु घड़ी को एक सेकण्ड स्लो कर दिया गया फिर भी 22 सेकण्ड का समय अधिक चल रहा है। यह पेरिस की वही प्रयोगशाला है। जहां की सी. जी. एस. (C.G.S.) सिस्टम से संसार भर के सारे मानक तय किये जाते हैं।
रोमन कैलेण्डर में तो पहले 10 ही महीने होते थे। किंग नुमापा जुलियस ने 355 दिनों का ही वर्ष माना था। जिसे में जुलियस सीजर ने 365 दिन घोषित कर दिया और उसी के नाम पर एक महीना जुलाई बनाया गया उसके 100 साल बाद किंग अगस्ट्स के नाम पर एक और महीना अगस्ट भी बढ़ाया गया चूंकि ये दोनो राजा थे। इसलिए इनके नाम वाले महीनों के दिन 31 ही रखे गये। आज के इस वैज्ञानिक युग में भी यह कितनी हास्यास्पद बात है कि लगातार दो महीने के दिन समान है जबकि अन्य महीनों में ऐसा नहीं है। जिसे हम अंग्रेजी कैलेण्डर का नौवाँ महीना सितम्बर कहते है, दसवाँ महीना अक्टूबर कहते है, ग्यारहवाँ महीना नवम्बर और बारहवाँ महीना दिसम्बर कहते है। इनके शब्दों के अर्थ भी लैटिन भाषा में 7,8,9 और 10 होते है। सितम्बर का अर्थ सप्ताम्बर था, आकाश का सातवा भाग, उसी प्रकार अक्टूबर अष्टाम्बर, नवम्बर नवमाम्बर और दिसम्बर दशाम्बर है।
सन् 1608 में एक संवैधानिक परिवर्तन द्वारा एक जनवरी को नव वर्ष घोषित किया गया। यही वह काल था जब पूरे विश्व पर इंग्लैण्ड का अर्थात ईसाई धर्म का दबदबा था पूरा विश्व उनके कब्जे में था और उन्होंने अपने धर्म के आधार पर एक जनवरी को नया वर्ष आरंभ करवा दिया।
जेनद अवेस्ता के अनुसार धरती की आयु 12 हजार वर्ष है। जबकि बाइविल केवल 2 हजार वर्ष पुराना मानता है। चीनी कैलेण्डर 1 करोड़ वर्ष पुराना मानता है। जबकि खताईमत के अनुसार इस धरती की आयु 8 करोड़ 88 लाख 40 हजार तीन सौ 11 वर्षो की है। चालडियन कैलेण्डर धरती को दो करोड़ 15 लाख वर्ष पुराना मानता है। फीनीसयन इसे मात्र 30 हजार वर्ष की बताते है। सीसरो के अनुसार यह 4 लाख 80 हजार वर्ष पुरानी है। सूर्य सिद्धांत और सिद्धांत शिरोमाणि आदि ग्रन्थों में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन ही सृष्टि का प्रथम दिन माना गया है।
संस्कृत के होरा शब्द से ही, अंग्रेजी का आवर (Hour) शब्द बना है। इस प्रकार यह सिद्ध हो रहा है कि वर्ष प्रतिपदा ही नव वर्ष का प्रथम दिन है। एक जनवरी को नव वर्ष मनाने वाले दोहरी भूल के शिकार होते है क्योंकि भारत में जब 31 दिसम्बर की रात को 12 बजता है तो ब्रिटेन में सायं काल होता है, जो कि नव वर्ष की पहली सुबह हो ही नहीं सकता। और जब उनका एक जनवरी का सूर्योदय होता है, तो यहां के Happy New Year वालों का नशा उतर चुका रहता है। सनसनाती हुई ठण्डी हवायें कितना भी शराब डालने पर शरीर को गरम नहीं कर पाती है। ऐसे में सवेरे सवेरे नहा धोकर भगवान सूर्य की पूजा करना तो अत्यन्त दुष्कर रहता है। वही पर भारतीय नव वर्ष में वातावरण अत्यन्त मनोहारी रहता है। केवल मनुष्य ही नहीं अपितु जड़ चेतना नर-नाग यक्ष रक्ष किन्नर-गन्धर्व, पशु-पक्षी लता, पादप, नदी नद, देवी देव व्यष्टि से समष्टि तक सब प्रसन्न हो कर उस परम् शक्ति के स्वागत में सन्नद्ध रहते है।
लेकिन यह इतना अधिक व्यापक था कि – आम आदमी इसे आसानी से नहीं समझ पाता था, खासकर पश्चिम जगत के अल्पज्ञानी तो बिल्कुल भी नहीं किसी भी विशेष दिन, त्यौहार आदि के बारे में जानकारी लेने के लिए विद्वान् (पंडित) के पास जाना पड़ता था।
मेरा आप सभी भारतीयों से निवेदन है कि – नकली कैलेण्डर के अनुसार नए साल पर, फ़ालतू का हंगामा करने के बजाये, पूर्णरूप से वैज्ञानिक और भारतीय कलेंडर (विक्रम संवत) के अनुसार आने वाले नववर्ष प्रतिपदा पर समाज उपयोगी सेवाकार्य करते हुए नववर्ष का स्वागत करें …..
हिंदुओं का नववर्ष ही नहीं दुनिया के अधिकाँश धर्मो व सम्प्रदायों का भी नववर्ष चैत्र अर्थात मार्च से शुरू होता है।
बेबीलोन नव वर्ष
यह मार्च महीने में ही मनाया जाता है। यह समारोह ग्यारह दिन तक चलता है। लगभग 3000–2000 BCE पूर्व का माना जाता है।
सुमेरियन → अक्काडियन → बेबीलोनियन परंपरा।
विश्व का सबसे पुराना दर्ज नववर्ष उत्सव।
ईरानी एवं पारसी नव वर्ष
ईरानी एवं पारसी नववर्ष नौरोज़ (Nowruz / Navroz) विश्व की सबसे प्राचीन और प्रकृति-आधारित नववर्ष परंपराओं में से एक है। यह ठीक उसी धारा में आता है, जिसमें भारत का चैत्र नववर्ष, बेबीलोन का अकितु उत्सव और अन्य वसंत-आधारित नववर्ष आते हैं।
बहाई नववर्ष
नया साल 21 मार्च को वसंत विषुव पर होता है। बहाई नववर्ष का आधार ईरानी–ज़रथुस्त्रीय–आर्य ऋतु विज्ञान है। बहाई धर्म में नया वर्ष ‘नवरोज’ हर वर्ष 21 मार्च को शुरू होता है। बहाई समुदाय के लोग नव वर्ष के आगमन पर 2 से 20 मार्च अर्थात् एक महीने तक व्रत रखते है।
बाली नया साल
बाली नववर्ष केवल एक तिथि नहीं, बल्कि समय, मौन और आत्मशुद्धि की अद्वितीय सभ्यता-दृष्टि है। यह दुनिया के उन गिने-चुने नववर्षों में है जहाँ उत्सव शोर से नहीं, शून्य से शुरू होता है।बाली नववर्ष का नाम न्येपी (Nyepi) है।
Nyepi = मौन, स्थिरता, विराम
यह बाली शाका संवत का नववर्ष है
सामान्यतः मार्च (अमावस्या के आसपास) आता है
भारतीय शक संवत (78 ई.) से सीधा संबंध है। बाली का नववर्ष भारतीय परंपरा की समुद्र पार जीवित शाखा है।
न्येपी दिवस चार कठोर नियम
पूरे बाली द्वीप पर 24 घंटे।
अमाती गेनि – आग नहीं
अमाती कार्या – काम नहीं
अमाती लेलोंगन – मनोरंजन नहीं
अमाती लेलुंगन – यात्रा नहीं
यहाँ तक कि हवाई अड्डा बंद
इंटरनेट सीमित समुद्र, सड़क, बाज़ार – सब शांत
यह सामूहिक मौन व्रत है। आधुनिक विश्व में अद्वितीय है।
तेलुगु नव वर्ष
आम तौर पर मार्च या अप्रैल के महीने में बदल जाता है. के लोगों को आंध्र प्रदेश भारत इन महीनों में नव वर्ष दिवस के आगमन का जश्न मनाने। इस दिन पूरे आंध्र प्रदेश भर में उगादि ( युग + आदि = युग का आरंभ जिसका अर्थ है एक नए वर्ष का आरंभ) के रूप में मनाया जाता है। कन्नड़ (युगादी), मराठी (गुढ़ी पड़वा), कोंकणी नववर्ष में भी मानी जाती है। यह समग्र भारतीय चैत्र नववर्ष परंपरा का दक्षिणी रूप है।
कश्मीरी कैलेंडर, Navreh (नव वर्ष) जिसे नवरेह ( Navreh) कहा जाता है केवल एक पर्व नहीं, बल्कि शैव-तांत्रिक, खगोलीय और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवित प्रमाण है। यह परंपरा दिखाती है कि कश्मीर में काल को कैसे चेतना के रूप में समझा गया।
नवरेह की प्रमुख परंपरा:-
थाल दर्शन
नवरेह की सुबह, परिवार का मुखिया एक थाल सजाता है और परिवार के सदस्य सबसे पहले उसी को देखते हैं। इस थाल में होता है?
पंचांग, चावल, दर्पण, फूल, सिक्का,
अखरोट, जल-पात्र।
यह कन्नी दर्शन (तमिल) और कलश दर्शन (वैदिक) की ही कश्मीरी अभिव्यक्ति है।
अखरोट का विशेष महत्व
कश्मीर में अखरोट शिव–शक्ति का प्रतीक है। बाहरी कठोर आवरण = स्थूल जगत
अंदर का बीज = चेतना
इसलिए नवरेह पर अखरोट रखना अनिवार्य माना गया।
गुड़ी पड़वा
हिंदू नववर्ष केवल एक तिथि नहीं, बल्कि समय-बोध, सृष्टि-दर्शन और सामाजिक अनुशासन का संगम है। यह वह बिंदु है जहाँ काल, प्रकृति और मानव कर्म एक साथ पुनः आरंभ होते हैं। शास्त्रों में इसे चैत्र नवसंवत्सर उत्तर भारत में नवसंवत आरंभ कहा गया है।
ब्रह्मपुराण एवं अन्य ग्रंथों में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ब्रह्मा द्वारा सृष्टि-रचना का प्रारंभ बताया गया। यही दिन सत्य युग का प्रारंभ व कालचक्र का उद्घाटन माना गया है इसलिए यह केवल “वर्ष” नहीं, सृष्टि-दिवस है। हिंदू काल-गणना आस्था नहीं, विज्ञान और अनुभव पर आधारित है।
चेटी चंड (Cheti Chand)
सिंधी समाज का नववर्ष केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जल-संस्कृति, व्यापारिक नैतिकता और सनातन कालबोध का संयुक्त रूप है। यह पर्व बताता है कि सिंधु सभ्यता में नववर्ष का आधार केवल समय नहीं, जीवन का स्रोत था।
चेटी चंड
चेटी = चैत्र मास
चंड = चंद्र / दिवस
तिथि: चैत्र शुक्ल द्वितीया
(कभी-कभी प्रतिपदा से उत्सव आरंभ) यह चैत्र नववर्ष परंपरा की ही सिंधी अभिव्यक्ति है।
थेलेमिक नववर्ष (Thelemic New Year)
यह सबसे प्राचीन माने जाने वाली मिस्र की संस्कृति में मनाया जाने वाला नववर्ष का त्योहार है। सामान्य अर्थों में “लोक-उत्सव” नहीं है, बल्कि एक गूढ़ (esoteric) समय-बोध है, जो आधुनिक पाश्चात्य रहस्यवाद, मिस्री प्रतीकवाद और ज्योतिषीय संक्रमण से जुड़ा हुआ है। 20 मार्च के आसपास (वसंत विषुव से ठीक पहले या उसी दिन) जब सूर्य मीन से मेष में प्रवेश करता है यानी ज्योतिषीय वर्ष का आरंभ यह वही क्षण है जहाँ पश्चिमी ज्योतिष में नया चक्र वैदिक परंपरा में मेष संक्रांति ईरानी परंपरा में नौरोज़ माना जाता है।
अकाली नव वर्ष
नव वर्ष दिवस सिख Nanakshahi कैलेंडर में मार्च को है। सिखों का स्वतंत्र कैलेंडर नाम नानकशाही संवत
आरंभ बिंदु गुरु नानक देव जी का प्रकाश (1469 ई.) 1 चेत (Chet 1) सामान्यतः 14 मार्च। यह भी वसंत काल में ही आता है
नववर्ष का वास्तविक आधार: ऋतु और सूर्य है। यह तथ्य है कि सूर्य की गति से ऋतुएँ बदलती हैं।
कृषि चक्र चलता है। जैविक घड़ी (circadian rhythm) नियंत्रित होती है। वसंत ऋतु में (मार्च–अप्रैल)
प्रकृति का पुनर्जन्म होता है। बीज से अंकुरण होता है। शीत से उष्मा की ओर संक्रमण होता है। इसलिए विश्व की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में भारत (चैत्र नववर्ष, गुड़ी पड़वा, उगादी)
ईरान (नौरोज़)
बेबीलोन (अकितु)
कश्मीर (नवरेह)
सिंध (चेटी चंड)
बाली (न्येपी)
सभी ने मार्च–अप्रैल को ही नववर्ष मनाया जाता है। यह केवल एक संयोग नहीं, प्राकृतिक अनिवार्यता है।
आर्थिक वर्ष या फाइनेंशियल ईयर..
इसी प्रकार देखा जाए तो व्यावहारिक रूप से भी हम आर्थिक वर्ष जिसे फाइनेंशियल ईयर कहते हैं। उसे भी 1 अप्रैल – 31 मार्च को ही मानते हैं।
शैक्षणिक सत्र या वर्ष
स्कूल/ कॉलेज का शैक्षणिक सत्र (CBSE सहित) अप्रैल/ जुलाई से नया शैक्षणिक सत्र आरंभ करते हैं।
कृषि वर्ष
ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों को लीज पर देने या लेने, नौकरों को काम पर रखने हेतु अक्षय तृतीया अर्थात मई महीने से ही नया वर्ष मानते हैं।
सरकारी योजनाएँ/बजट वर्ष
मार्च–अप्रैल केंद्रित अर्थात व्यवहार में भारत पहले से ही अप्रैल को नया वर्ष मानता है, पर मानसिक रूप से 1 जनवरी को ढो रहा है।
आज हमें इसे बदलने की आवश्यकता है।(आज के संदर्भ में)
आज स्थिति बदल चुकी है। हम पर आज उपनिवेशिक राज काज नहीं है। हम स्वतंत्र हैं वैचारिक रूप से भी आर्थिक रूप से भी। हमारा अपना प्राचीन ज्ञान एवं संस्कृति अपने स्रोतों की ओर लौट रहा है।
पर्यावरण संकट सामने है।
प्रकृति से कटे कैलेंडर असफल हो रहे हैं। ऐसे में ऋतु-आधारित नववर्ष
सूर्य-केंद्रित समय कृषि-संवेदी कैलेंडर केवल सांस्कृतिक नहीं, पर्यावरणीय आवश्यकता बन गए हैं।
अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त