कम्युनिस्ट पारितंत्र को समय-रेखा से समझिए: तथ्य क्या कहते हैं?

कैलाश चन्द्र

सोशल मीडिया पर इन दिनों एक चित्र और उसके साथ कुछ दावे प्रसारित किए जा रहे हैं। दावा यह है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के परिवार के कई सदस्य वर्ष 2014 के बाद सिविल सेवाओं में आए और इसे राजनीतिक संरक्षण या व्यवस्था से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

ऐसे दावों की पड़ताल भावनाओं या राजनीतिक पसंद से नहीं, बल्कि तथ्यों, परीक्षा-वर्ष, परिणाम, रैंक, बैच और नियुक्ति की समय-रेखा से होनी चाहिए।पहले पूरी समय-रेखा देखिए ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के IAS अधिकारी हैं। उस समय देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। उनका मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनना बहुत बाद की घटना है। वे मार्च 2024 में निर्वाचन आयुक्त बने और फरवरी 2025 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने।इसलिए परिवार के सदस्यों के सिविल सेवा चयन को उनके बाद के CEC पद से जोड़ना समय-रेखा की दृष्टि से उचित नहीं है।उनकी बड़ी बेटी मेधा रूपम 2014 बैच की उत्तर प्रदेश कैडर की IAS अधिकारी हैं। उन्होंने UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2013 में अखिल भारतीय स्तर पर लगभग 10वीं रैंक प्राप्त की।

इस परीक्षा का परिणाम 2014 में घोषित हुआ।इसी परीक्षा में मनीष बंसल ने लगभग 53वीं रैंक प्राप्त की और वे भी 2014 बैच के IAS अधिकारी बने। दोनों की मुलाकात लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) में प्रशिक्षण के दौरान हुई और बाद में उनका विवाह हुआ।इसका सीधा अर्थ है कि परीक्षा, परिणाम, रैंक और चयन की प्रक्रिया विवाह से पहले पूरी हो चुकी थी।इसलिए यह कहना कि विवाह अथवा पारिवारिक संबंध के कारण उन्हें सिविल सेवा में प्रवेश मिला, उपलब्ध समय-रेखा से स्वतः सिद्ध नहीं होता।

छोटी बेटी की स्थिति भी देखिएज्ञानेश कुमार की छोटी बेटी अभिश्री UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2017 के माध्यम से IRS में चयनित हुईं और उनकी रैंक लगभग 297 बताई जाती है। उनकी शिक्षा सेंट स्टीफेंस कॉलेज से हुई।उनके पति अक्षय लाबरू/लबरू 2018 बैच के IAS अधिकारी बताए जाते हैं। उनकी UPSC CSE 2017 में लगभग 104वीं रैंक बताई जाती है। चित्रों और कुछ रिपोर्टों में उनके बैच/वर्ष को लेकर अलग-अलग उल्लेख मिलते हैं, इसलिए इस हिस्से में सावधानी आवश्यक है।

परिवार में अन्य सिविल सेवा से जुड़े सदस्य भी बताए जाते हैं—जिनमें IRS और IPS से जुड़े रिश्तेदार शामिल हैं। इसलिए पूरे मामले को केवल “2014 के बाद बेटियों और दामादों को नौकरी मिली” जैसे एक वाक्य में समेट देना अधूरी तस्वीर प्रस्तुत करता है।असली प्रश्न है—चयन किसने किया?यहाँ एक बुनियादी तथ्य समझना आवश्यक है।IAS और IRS जैसी सेवाओं में प्रवेश UPSC की निर्धारित परीक्षा प्रक्रिया से होता है। इसमें लिखित परीक्षा और साक्षात्कार जैसी चयन प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं। किसी व्यक्ति का किसी अधिकारी का पुत्र, पुत्री, रिश्तेदार या परिचित होना अपने आप में चयन का प्रमाण नहीं बन जाता।इसी तरह किसी व्यक्ति का चयन वर्ष 2014 या उसके बाद होना भी अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि चयन तत्कालीन राजनीतिक सत्ता की देन था।मेधा रूपम की लगभग 10वीं और मनीष बंसल की लगभग 53वीं रैंक जैसी सार्वजनिक परीक्षा उपलब्धियाँ कम-से-कम यह बताती हैं कि उनके चयन को केवल पारिवारिक संबंधों के आधार पर समझाना पर्याप्त नहीं है।

“CEC बनने के बाद परिवार में नियुक्तियाँ हुईं”—समय-रेखा क्या कहती है? यहाँ सबसे महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। परिवार के जिन सदस्यों की चर्चा की जा रही है, उनका चयन उस समय हो चुका था जब ज्ञानेश कुमार मुख्य निर्वाचन आयुक्त नहीं थे। वे 1988 बैच के अधिकारी के रूप में लंबे समय से प्रशासनिक सेवा में थे। निर्वाचन आयुक्त और फिर मुख्य निर्वाचन आयुक्त का पद उन्हें दशकों बाद मिला। इसलिए 2014 के आसपास हुए चयन को 2024–25 में मिले निर्वाचन आयोग के पद से जोड़ना कालक्रम की दृष्टि से गलत संबंध स्थापित करता है। परिवार में कई अधिकारी होना क्या अपने आप में संदेह का प्रमाण है?नहीं।

किसी परिवार में अनेक लोग सिविल सेवा में हों, तो उसके कई संभावित सामाजिक कारण हो सकते हैं—शिक्षा का वातावरण, प्रतियोगी परीक्षाओं की जानकारी, प्रशासनिक सेवा के प्रति रुचि, परिवार से मिलने वाला मार्गदर्शन और समान सामाजिक परिवेश। यह भी स्वाभाविक है कि सिविल सेवा में आने वाले युवा अधिकारी प्रशिक्षण अथवा सेवा के दौरान एक-दूसरे से मिलें और उनके बीच वैवाहिक संबंध बनें। इसलिए केवल यह तथ्य कि एक परिवार में कई अधिकारी हैं, अपने आप में अनियमितता या धांधली का प्रमाण नहीं है।हाँ, यदि किसी विशेष चयन में नियम-विरुद्ध हस्तक्षेप, परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितता या अनुचित लाभ का कोई प्रमाण हो, तो उसकी स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए। लेकिन संबंध मात्र को प्रमाण मान लेना तथ्य-जाँच का विकल्प नहीं हो सकता।“2014 के बाद सब बने”—यही भ्रम कहाँ पैदा होता है?यहीं से आख्यान और तथ्य के बीच अंतर समझना आवश्यक हो जाता है।

यदि कोई व्यक्ति केवल नियुक्ति या बैच का वर्ष देखता है और उसके पीछे की परीक्षा का वर्ष, परिणाम की तारीख, रैंक तथा चयन की पूरी प्रक्रिया नहीं देखता, तो अधूरी तस्वीर बन सकती है।उदाहरण के लिए— परीक्षा 2013 में हूई और परिणाम 2014 में आये है। जिनका चयन/बैच 2014 में पूर्ण हुआ। और दूसरी ओर— ज्ञानेश कुमार का CEC बनना ये 2025 में सम्पन्न हुआ है। इन दोनों घटनाओं के बीच लगभग एक दशक का अंतर है।इन घटनाओं को एक ही राजनीतिक कारण-परिणाम श्रृंखला में रखना तभी उचित होगा जब उसके समर्थन में अतिरिक्त प्रमाण उपलब्ध हों।

यही है आख्यान-निर्माण का तरीकाकिसी जटिल तथ्य को एक सरल और भावनात्मक वाक्य में बदल देना सोशल मीडिया के आख्यान-निर्माण का सामान्य तरीका हो सकता है।“सबको 2014 के बाद नौकरी मिली।”यह वाक्य सुनने में प्रभावशाली हो सकता है, लेकिन इसके बाद सवाल होना चाहिए—परीक्षा कब हुई? परिणाम कब आया? रैंक क्या थी? चयन किस प्रक्रिया से हुआ? विवाह कब हुआ? संबंधित अधिकारी को संवैधानिक पद कब मिला?जब इन प्रश्नों के उत्तर सामने रखे जाते हैं तो तस्वीर कहीं अधिक स्पष्ट हो जाती है।इसीलिए सूचना के युग में केवल यह जानना पर्याप्त नहीं कि क्या कहा गया है। यह भी देखना जरूरी है कि किस क्रम में घटनाएँ हुई थीं।निष्कर्षकिसी व्यक्ति की योग्यता का आकलन उसके परिवार के नाम से नहीं, बल्कि उसकी परीक्षा, रैंक, चयन प्रक्रिया, सेवा-रिकॉर्ड और सार्वजनिक कार्य से होना चाहिए।

इसी प्रकार किसी परिवार में कई अधिकारी होना अपने आप में न तो अनियमितता का प्रमाण है और न ही उसे बिना जाँच के “व्यवस्था” कह देना उचित है। इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के IAS अधिकारी हैं, जबकि उनकी बेटियों और दामादों के जिन चयन की चर्चा की जा रही है, वे UPSC की अलग-अलग परीक्षाओं के माध्यम से हुए और उनमें परीक्षा-वर्ष, रैंक तथा बैच की स्पष्ट समय-रेखा मौजूद है। इसलिए किसी राजनीतिक निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले तथ्य, समय-रेखा और चयन प्रक्रिया को देखना चाहिए।अज्ञानता का लाभ उठाकर बनाया गया आख्यान कुछ समय के लिए प्रभाव पैदा कर सकता है, लेकिन तथ्य-जाँच का पहला सिद्धांत सरल है— “पहले समय-रेखा देखिए, फिर निष्कर्ष निकालिए।”और एक महत्वपूर्ण सावधानी भी—किसी विशेष राजनीतिक या वैचारिक समूह पर “जानबूझकर भ्रम फैलाने” का आरोप स्वयं एक राजनीतिक दावा है। जब तक उसके समर्थन में प्रमाण न हों, उसे तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। तथ्य अपनी जगह हैं, मत अपनी जगह पर है। समय-रेखा को समझना ही तथ्य-जाँच की पहली सीढ़ी है।


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