कुटुंब की महत्ता –  समाज के लिए एक चिंतन

परिवार टूटा, तो समाज टूटेगा।

परिवार बचा,तो संस्कृति बचेगी।।

“सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।” – ऋग्वेद

अर्थ – साथ चलो, साथ बोलो, तुम्हारे मन एक हों। यही कुटुंब का मूल मंत्र है।

हमारा कुटुंब क्या था?

भारत की कुटुंब संस्था एक अनोखी, वैज्ञानिक रचना है। यह कोई Contract नहीं है, यह संस्कार है। ऋषि-मुनियों ने तप से जो ज्ञान पाया, उसी पर हमारे जीवन की रचना बनी। और इस रचना की सबसे छोटी इकाई – Smallest Unit – कुटुंब को बनाया गया।

कुटुंब का मूल तत्त्व क्या है? पैसा नहीं, मकान नहीं, मूल तत्त्व है आत्मीयता। इसी आत्मीयता के कारण हमारा कुटुंब हजारों आक्रमण, गरीबी और कठिनाई के बाद भी चिरंजीवी बना रहा।

हमारे भारतीय समाज का इतिहास देखिए। हमारे बुजुर्गों ने कैसे कुटुंब को बचाए रखा। एक कमाता था, दस खाते थे, पर कोई भूखा नहीं सोता था। यही हमारी असली ताकत थी।

कुटुंब का 80% वाला सिद्धांत:

सबसे महत्वपूर्ण बात जो हमें समझनी है –

कुटुंब में व्यक्ति आजीवन रहता है। अतः कुटुंब का संस्कार देने में 80% हिस्सा रहता है। 20% व्यवहार ही वह समाज में जाकर सीखता है।*

आज हम क्या कर रहे हैं? हम सोचते हैं बच्चे को अच्छी स्कूल में डाल दिया, ट्यूशन लगा दिया, तो हमारा कर्तव्य पूरा हो गया।

नहीं।

स्कूल केवल 20% देता है। 80% तो घर से आएगा। बच्चा बोलेगा कैसे, बड़ों का आदर कैसे करेगा, मेहनत का मूल्य क्या है, अपनी बिरादरी, अपने समाज के प्रति उसका कर्तव्य क्या है – यह सब वह कुटुंब में ही सीखेगा।

आज बच्चों को संस्कार देने वाला कोई घर का सदस्य न रहा, यह काम हमने “मोबाइल” पर छोड़ दिया है। परिणाम सामने है।

आज गाड़ी पटरी से क्यों उतर रही है?

“गाड़ी चल तो रही है, किंतु दिशा विपरीत हो गई है। हादसा कभी भी हो सकता है।”

आज कुटुंब के सभी सदस्यों ने अपने-अपने दायित्व से किनारा कर लिया है। केवल पैसे कमाकर बच्चों का लालन-पालन करना ही कर्तव्य लगता है। इसमें किसी की गलती नहीं, उन्हें पता ही नहीं कि गाड़ी ने पटरी बदल ली है।

पहले जो परिवार सबके साथ रहने में गौरव समझता था, वह अब अकेले रहने में शान समझ रहा है। परिवार व्यक्ति-केंद्रीय हो गया है।

इसका परिणाम क्या हुआ?

– भावनात्मक असुरक्षा बढ़ गई है

– शारीरिक व्याधियां बढ़ गई हैं

– युवाओं को कोई मार्ग नहीं मिल रहा – वे भटक रहे हैं

– वृद्धों को लगता है – शेष जीवन का क्या करें? कोई पूछने वाला नहीं

– और जो प्रभावित कर ले, उसका अनुसरण शुरू हो जाता है – चाहे वह नशा हो, या गलत संगत

क्या यही हमारे दादाजी- दादीजी, नानाजी- नानीजी का सपना था? क्या हमारे बुजुर्गों ने इसी दिन के लिए इतना संघर्ष किया था?

समाज के लिए विशेष आह्वान:

मेरे प्यारे बंधुओं,

भारतीय समाज आज प्रगति कर रहा है। हमारे बच्चे पढ़ रहे हैं, आगे बढ़ रहे हैं। यह बहुत अच्छी बात है। पर प्रगति के साथ हमें अपनी जड़ नहीं छोड़नी है।

हमें क्या करना है?

1. फिर से संयुक्तता का गौरव जगाना: अकेले रहने में नहीं, साथ रहने में ताकत है। महीने में एक बार तो पूरे कुटुंब के साथ बैठकर भोजन करो।

2. दायित्व का बोध: कुटुंब में केवल पिता का नहीं, माता, चाचा, दादा, बड़े भाई – सबका दायित्व है। बच्चा सबको देखकर सीखता है।

3. नई पीढ़ी का निर्माण घर में: कुल के सारे संस्कार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होते हैं। इससे वंश परंपरा बनती है। अपने बच्चों को अपनी कहानी बताओ – हमने कैसे संघर्ष किया, कैसे पढ़े, कैसे आगे बढ़े।

4. वृद्धों को केंद्र में लाना: घर के बुजुर्ग बोझ नहीं हैं, वे हमारे संस्कारों की लाइब्रेरी हैं। उन्हें समय दो।

“यदि परिवार बचाना है, तो परिवार के लिए समय बचाना होगा।”

निष्कर्ष

कुटुंब टूटेगा तो समाज टूटेगा। कुटुंब बचेगा तो  समाज ही नहीं, पूरा भारत बचेगा।

कुछ लोग, कुछ संस्थाएं इस गाड़ी को फिर से पटरी पर लाने में लगी हैं। हम सबको भी उसमें लगना है। पैसा कमाना जरूरी है, पर पैसा ही सब कुछ नहीं है।

आइए, आज संकल्प लें – हम अपने कुटुंब को फिर से आत्मीयता का केंद्र बनाएंगे।

एक कुटुंब, एक संस्कार, एक उज्ज्वल भविष्य।

जय परिवार!

डॉ. बालाराम परमार

पूर्व प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय


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