
✍️ डॉ बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’
“वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र का कर्ज चुकाने का एक उत्कृष्ट धर्म है। यह एक ऐसा महामंत्र है, जो हमारे भीतर अटूट आत्मबल जगाता है”। श्री अरविंद का यह वाक्य आज की हर बहस का उत्तर है।
आज जब वंदे मातरम् पर चर्चा होती है तो दो आवाजें आती हैं। एक कहती है यह राष्ट्रीय गौरव है, दूसरी कहती है यह मजहब के खिलाफ है। यदि दूसरी बात को सच मान लें तो हमें मजबूरन सोचना पड़ेगा कि क्या इस्लाम मानने वाले उन राष्ट्रपतियों, शिक्षा मंत्रियों, सेनापतियों और वैज्ञानिकों ने, जिन्होंने देश के सर्वोच्च पदों पर बैठकर काम किया, भारत माता के साथ अन्याय किया है? क्या यह सोचना जायज है? आइए सत्यता की कसौटी पर कसते हैं।
पहला सत्य – राष्ट्रपति के पद पर बैठे मुसलमान
भारत के राष्ट्रपति को प्रथम नागरिक कहा जाता है। वह संविधान का रक्षक होता है।
डॉ जाकिर हुसैन को याद कीजिए। वे भारत के तीसरे राष्ट्रपति थे। जामिया मिलिया इस्लामिया के संस्थापक, कुरान के हाफिज के परिवार से। उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में हर सरकारी समारोह में वंदे मातरम् का सम्मान किया। क्या उनका इस्लाम कमजोर हो गया? मेरे हिसाब से नहीं। और इसी कड़ी में डॉ फखरुद्दीन अली अहमद साहब का नाम सबसे गंभीर उदाहरण है। वे भारत के पांचवें राष्ट्रपति थे और राष्ट्रपति भवन में जब भी राष्ट्रीय कार्यक्रम होता था तो जन गण मन के साथ वंदे मातरम् भी पूरे सम्मान के साथ बजता था। उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि मेरे मजहब में यह गाना हराम है, इसलिए इसे मत बजाओ। जब 1975 में आपातकाल के कागज पर हस्ताक्षर किए। आलोचक उनके उस फैसले को सही या गलत कह सकते हैं, पर कोई यह नहीं कह सकता कि उन्होंने वह फैसला अपने मजहब को देखकर लिया। उन्होंने वह फैसला भारत के राष्ट्रपति होने के नाते लिया। यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि भारत के सर्वोच्च पद पर बैठा मुसलमान भी जब वंदे मातरम् सुनता है तो वह उसे मजहबी नजर से नहीं, बल्कि संवैधानिक और राष्ट्रीय सम्मान की नजर से देखता है। यदि वंदे मातरम् इस्लाम के खिलाफ होता तो क्या एक नमाजी और रोजेदार राष्ट्रपति अपने ही राष्ट्रपति भवन में उसे बजने देता?”
और सबसे बड़ा नाम डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम सहाब का है। वे रोज सुबह कुरान की आयतें पढ़ते थे और गीता का पाठ भी करते थे और गर्व से कहते थे “मैं पहले भारतीय हूं”। जब उनके सामने वंदे मातरम् बजता था तो वे सीना तान कर खड़े होते थे। पूरा देश आज भी उन्हें “भारत माता का लाल” और “भारत रत्न” कहता है। यदि वंदे मातरम् इस्लाम के खिलाफ होता तो क्या ये तीनों राष्ट्रपति अपने मजहब से गद्दारी करते? सच्चाई यह है कि उन्होंने बताया कि राष्ट्र की इज्जत करना ही सबसे बड़ा मजहब है।
दूसरा सत्य – वह मौलाना जो शिक्षा मंत्री बना।
भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद थे। वे कोई सामान्य मुसलमान नहीं, वे आलिम थे, जिनकी इस्लाम पर लिखी किताबें आज भी पढ़ी जाती हैं। 24 जनवरी 1950 को जब संविधान सभा में डॉ राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का सम्मान दिया, तब मौलाना आजाद सदन में मौजूद थे। सरदार पटेल थे, नेहरू थे, और हसरत मोहानी जैसे जमीयत उलेमा के नेता भी थे। किसी ने इसका विरोध नहीं किया।
मौलाना आजाद ने अगर चाहा होता तो कह सकते थे कि यह इस्लाम के खिलाफ है। पर उन्होंने नहीं कहा। क्योंकि वे इस्लाम के उस सिद्धांत को जानते थे जो कहता है “हुब्बुल वतन मिनल ईमान” यानी “वतन से मोहब्बत ईमान का हिस्सा है”।
मौलाना ने IIT, UGC, साहित्य अकादमी बनाई। क्या यह भारत माता से अन्याय था? नहीं, यह भारत माता को दुनिया में सिर ऊंचा करने लायक बनाना था।
तीसरा सत्य – इतिहास का वह पन्ना जो कट्टर दिल को भी पिघला दे।
मेरे मुस्लिम भाई, आप 1896 में चलिए। कलकत्ता में कांग्रेस का 12वां अधिवेशन हो रहा है। अध्यक्ष हैं रहमतुल्ला एम सयानी। वे बॉम्बे के बड़े बैरिस्टर हैं, अंजुमन ए इस्लाम के सदर , और कांग्रेस के दूसरे मुस्लिम अध्यक्ष थे।
उसी अधिवेशन में, सयानी साहब की अध्यक्षता में, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार वंदे मातरम् के पूरे 6 छंद गाए। यह इतिहास में दर्ज है। पूरा पंडाल झूम उठा था जिसमें मुस्लमान की बहुतायत थीं।
अब दिल पर हाथ रखकर सोचिए। क्या सयानी साहब मुसलमान नहीं थे? क्या उन्हें कुरान याद नहीं थी? क्या उन्हें जन्नत की चाह नहीं थी? फिर उन्होंने वंदे मातरम् क्यों गया? क्योंकि वे समझते थे कि वतन की तारीफ करना शिर्क नहीं है। ‘शिर्क’ अर्थात “अल्लाह की सत्ता या इबादत में किसी और को साझी ठहराना”। और तौहीद का अर्थ है “अल्लाह की एकता”। वतन की मिट्टी को सलाम करना तौहीद के खिलाफ नहीं है।
चौथा सत्य – दिल पिघलाने वाले शहीदों के उदाहरण।
अशफाक उल्ला खां को याद कीजिए। रामप्रसाद बिस्मिल के सबसे पक्के दोस्त। जब फांसी पर चढ़े तो जुबान पर था “तंग आकर हम भी उनके जुल्म के बेताब हो जाएं तो क्यों न हो”। कहा जाता है कि काकोरी के इस शहीद की आखिरी ख्वाहिश थी कि उनके जनाजे पर हिंदुस्तान जिंदाबाद और वंदे मातरम् की आवाज आए। क्या वे कम मुसलमान थे?
परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद को याद कीजिए। 1965 में जब पाकिस्तानी टैंकों ने भारत में घुसपैठ की तो इसी जांबाज मुस्लिम सिपाही ने भारत माता की रक्षा के लिए अपनी जान दे दी। उसके सीने पर गोली लगी पर उसने मातृभूमि की रक्षा के खातिर वंदे मातरम कहते हुए छाती पर गोलियां खाई ।
ब्रिगेडियर उस्मान को लोग “नौशेरा का शेर” कहते हैं। 1948 में वे शहीद हुए। वे कहते थे “मैं भारत माता की रक्षा की सौगंध खा कर लड़ रहा हूं”। और जीता जागता उदाहरण इसरो के वैज्ञानिकों का है। डॉ कलाम के साथ सैकड़ों मुस्लिम वैज्ञानिकों ने चंद्रयान बनाया। जब रॉकेट उड़ता है तो वे “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम्” बोलते हैं। क्या उनका रोजा टूट जाता है?
इस्लाम में सद्भावना की आयतें क्या कहती हैं।
मेरे भाइयों, इस्लाम अमन का मजहब है। कुरान में सद्भावना के लिए साफ कहा गया है। “लकुम दीनुकुम वलिय दीन”। अर्थात “तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन है और मेरे लिए मेरा दीन है”। सूरह काफिरून। यह आयत सिखाती है कि अपने धर्म पर रहो पर दूसरे के धर्म का सम्मान करो। “या अय्युहन नास इन्ना खलकनाकुम मिन जकरिव व उनसा व जअलनाकुम शुऊबन व कबाइला लि तआरफू”। अर्थात “ऐ लोगों, हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हें कौमों और क़बीलों में बांटा ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो”। सूरह हुजुरात आयत 13। यानी अलग अलग पहचान इंसानियत को पहचानने के लिए है, लड़ने के लिए नहीं।
“मन कतल नफ्सन बिगैरि नफ्सिन फकअन्नमा कतल न नास जमीआ”। अर्थात “जिसने एक बेगुनाह जान को कत्ल किया, उसने पूरी इंसानियत को कत्ल किया”। सूरह मायदा।
इन आयतों से साफ है कि इस्लाम किसी को देश से मोहब्बत करने से नहीं रोकता।
अपील!अपील!!अपील!!!
वंदे मातरम् में हम किसी मूर्ति की इबादत नहीं करते। पहले दो छंदों में तो सिर्फ इस मिट्टी की खूबसूरती है – “सुजलाम सुफलाम मलयज शीतलाम शस्य श्यामलाम”। इसका मतलब है पानी से भरी, फलों से भरी, चंदन जैसी ठंडी हवा वाली, फसलों से हरी भरी धरती। इसमें अल्लाह की बनाई हुई कुदरत की ही तो तारीफ है।
जो लोग बाद के छंदों में दुर्गा और लक्ष्मी के शब्दों पर आपत्ति करते हैं, उनके संज्ञान में लाना है कि पौराणिक कथाओं में दुर्गा का शाब्दिक अर्थ है “अजेय शक्ति” और “दुर्ग” का अर्थ है किला। बंकिम दादा ने इसे आदि शक्ति, परम ब्रह्म और समस्त ब्रह्मांड की सृजनात्मक ऊर्जा के प्रतीक के रूप में लिखा था। फिर भी 1937 में महात्मा गांधी और मौलाना आजाद की मौजूदगी में तय हुआ कि सिर्फ पहले दो छंद ही राष्ट्रीय कार्यक्रमों में गाए जाएंगे ताकि किसी के दिल को ठेस न पहुंचे।
तो फिर आज झगड़ा किस बात का है?
मेरे मुस्लिम भाईयों, वंदे मातरम् कहने से आपका निकाह नहीं टूटता, आपका जनाजा नहीं रुकता, आपकी नमाज नहीं छूटती। जैसे आप अपनी वालिदा को कहते हैं “अम्मी मैं तुम्हें प्यार करता हूं”, वैसे ही यह अपनी वतन वाली अम्मी को प्यार करना है।
जिस इस्लाम ने सयानी, आजाद, अशफाक, अब्दुल हमीद, कलाम को जन्नत दी, वही इस्लाम आपको भी जन्नत देगा अगर आप भारत माता को सलाम करेंगे।
आइए, इस बहस को खत्म करें। राष्ट्र की वंदना से धर्म नहीं बदलता, धर्म तो कर्म से बदलता है। और सबसे बड़ा कर्म है वतन से वफा।
वंदे मातरम्।