
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वरिष्ठ पत्रकार
साभार : विश्व संवाद केंद्र, भोपाल
“वन्दे मातरम्” को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ी है और इस बार बहस के केंद्र में हैं हिन्दी सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर और अभिनेत्री एवं सांसद कंगना रनौत। विवाद का आधार शर्मिला टैगोर की वह टिप्पणी है, जिसमें उन्होंने कहा कि अनेक धार्मिक लोग एक ईश्वर में विश्वास करते हैं और “वन्दे मातरम्” के एक श्लोक में अनेक देवताओं का उल्लेख होने के कारण उसकी कुछ अभिव्यक्तियां ऐसे लोगों की मान्यताओं से मेल नहीं खा सकतीं।
वस्तुत: कंगना ने इस तर्क का जवाब देते हुए मूल प्रश्न ही सामने रख दिया; क्या कविता, कला और राष्ट्रीय भावना को शब्दों के शाब्दिक अर्थों में बांधकर उनकी व्यापक प्रतीकात्मकता को समाप्त कर देना उचित है? शर्मिला टैगोर ने अपना दृष्टिकोण रखते हुए कहा था कि कई धार्मिक लोग एक ईश्वर में विश्वास करते हैं और “वन्दे मातरम्” में एक श्लोक में अनेक देवताओं का उल्लेख आता है। उनकी चिंता को व्यक्तिगत धार्मिक आस्था के स्तर पर समझा जा सकता है। बेशक, किसी व्यक्ति को किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक के प्रति अपनी व्याख्या रखने का अधिकार है, किंतु समस्या तब पैदा होती है, जब किसी राष्ट्रगीत की काव्यात्मक अभिव्यक्ति को धार्मिक अनुष्ठान के चश्मे से देखा जाने लगे।
यहीं कंगना रनौत की कही गईं इस संदर्भ की सभी बातें महत्वपूर्ण हो जाती हैं। उन्होंने शर्मिला टैगोर की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह उनकी आपत्ति की सराहना करती हैं, मगर एक कलाकार के रूप में उन्हें यह देखकर आश्चर्य होता है कि कला और कविता के प्रति दृष्टिकोण इतना संकीर्ण कैसे हो सकता है? कंगना ने याद दिलाया कि कविता में रूपक होते हैं, कवि प्रभाव पैदा करने के लिए कल्पना, प्रतीक और उपमाओं का सहारा लेता है, इसलिए किसी काव्य-पंक्ति को सिर्फ उसके शाब्दिक धार्मिक अर्थ में सीमित कर देना उसके साहित्यिक और ऐतिहासिक संदर्भ को छोटा कर देना है।
वास्तव में “वन्दे मातरम्” का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है; क्या इसमें ‘माता’ केवल धार्मिक देवी का प्रतीक है या मातृभूमि का भी? स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में इसका उत्तर बिल्कुल स्पष्ट है। बंकिमचंद्र ने मातृभूमि को ऐसी शक्ति के रूप में चित्रित किया जो अपने संतानों में आत्मबल, साहस और स्वाभिमान जगाती है। उस समय भारत परतंत्र था और देशवासियों को अपनी राष्ट्रीय अस्मिता का बोध कराना बहुत आवश्यक था।
कंगना ने अपनी बातों में आगे इसी बिंदु को स्वामी विवेकानंद के प्रसिद्ध आह्वान से जोड़ा है। उन्होंने कहा कि जब विवेकानंद लोहे जैसी मांसपेशियों, इस्पात जैसी नसों और वज्र जैसी शक्ति वाले युवाओं की बात करते थे, तो वे मौसम का पूर्वानुमान नहीं दे रहे थे, वह तो उस वक्त शक्ति के जागरण का आह्वान कर रहे थे। अर्थात् ‘शक्ति’ का अर्थ हर संदर्भ में किसी धार्मिक देवी की पूजा करना नहीं होता। शक्ति साहस की भी हो सकती है, आत्मविश्वास की भी, राष्ट्रनिर्माण की भी और अन्याय के प्रतिरोध की भी यह शक्ति हो सकती है।
यही तर्क “वन्दे मातरम्” पर भी लागू होता है। ‘माता’ को मातृभूमि के रूपक के रूप में स्वीकार करना किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक आस्था बदलने के लिए बाध्य कर देना न होकर ये भारत में राष्ट्र को ‘माता’ कहना एक सांस्कृतिक और भावनात्मक अभिव्यक्ति है। जैसे कोई व्यक्ति अपनी जन्मभूमि, भाषा या संस्कृति को मां कहकर सम्मान देता है, वैसे ही राष्ट्र को मातृभूमि कहना भी राष्ट्रीय भाव का प्रतीक होता है, इसलिए कंगना का यह कहना कि ‘कृपया हिंदू-मुस्लिम मानसिकता से बाहर निकलें’ इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
वस्तुत: इसका अर्थ किसी मुसलमान की आस्था में यह होना चाहिए कि भारतीय राष्ट्रवाद को हर बार धार्मिक पहचान के चश्मे से देखने की आवश्यकता नहीं है। एक भारतीय मुसलमान के लिए भारत उसकी मातृभूमि है, एक भारतीय हिन्दू के लिए भी और अन्य सभी भारतीयों के लिए भी। राष्ट्र के प्रति सम्मान की भाषा को धार्मिक पहचान की प्रतिस्पर्धा में बदल देना स्वयं राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि “वन्दे मातरम्” को इतिहास और राष्ट्रीय चेतना के दस्तावेज के रूप में पढ़ा जाए। यह वह गीत है जिसने अंग्रेजी शासन के दौर में भारतीयों को अपनी मातृभूमि के लिए खड़े होने की प्रेरणा दी। उसके शब्दों को धार्मिक कर्मकांड में बदल देना जितना गलत है, उतना ही गलत उसे उसके ऐतिहासिक संदर्भ से काटकर देखना भी है।
कहना होगा कि कंगना का जवाब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने बहस को ‘हिन्दू बनाम मुसलमान’ से हटाकर ‘कला बनाम संकीर्ण व्याख्या’ के प्रश्न में बदलने की कोशिश की है। किसी गीत के रूपक को समझने के लिए उसकी अंतर्निहित चेतना को समझना जरूरी है, सिर्फ शब्दों के स्तर पर यह संभव नहीं, इसलिए उसके भाव पक्ष को ही प्रमुखता दी जानी चाहिए, जिसमें कि आज सबसे जरूरी बात यह है कि “वन्दे मातरम्” किसी भारतीय से यह नहीं पूछता कि उसकी पूजा-पद्धति क्या है; वह आपको सिर्फ इतना याद दिलाता है कि जिस मिट्टी ने उसे जन्म दिया, उस मातृभूमि के प्रति उसका भाव क्या है। आस्था अपनी जगह है, राष्ट्रभाव अपनी जगह। दोनों को एक-दूसरे का विरोधी बना देना भारत की विरासत एवं ज्ञान परम्परा के साथ न्याय नहीं होगा, जिसे स्वतंत्रता आंदोलन ने अपने संघर्ष से निर्मित किया था।
ऐसे में स्वभाविक तौर पर कहना यही है कि कंगना का संदेश अकेले शर्मिला टैगोर के लिए न होकर उन सभी के लिए विचारणीय है जो “वन्दे मातरम्” को उसके व्यापक राष्ट्रीय और काव्यात्मक अर्थ से काटकर केवल धार्मिक या मजहबी प्रतीक मानते हैं। वस्तुत: सच यही है कि भारत को समझना है तो प्रतीकों से बाहर निकलों। व्यापक परिदृष्य एवं दृष्टिकोणों से समझों । मां को मां कहने के लिए एक ही धार्मिक विश्वास जरूरी नहीं, मातृभूमि के प्रति सम्मान ही उसका सबसे बड़ा गौरव है। फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि रोम-रोम में देशभक्ति का भाव भर देनेवाले राष्ट्रगीत “वन्दे मातरम्” में दुर्गा, कमला शब्द दिए गए हैं। इसके आगे जाएंगे तो सिर्फ एक ही भाव नजर आता है, वह यही है कि भारत माता के लिए अपना सर्वस्व समर्पण करना है, यही राष्ट्र पुरुष है, यही सर्वज्ञ है, इसी से सब कुछ है और अंत में इसी में मिल जाना है।