
✍️ डॉ बालाराम परमार
विषय प्रवेश
21वीं सदी ज्ञान, विज्ञान, पराक्रम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सदी है। परंतु एक लंबा शैक्षिक अनुभव बताता है कि सर्वसुविधायुक्त भारत देश की युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से कटी हुई है।
एक ओर हम चाँद पर पहुँच गए, अग्नि मिसाइल बना ली, एक हजार से अधिक अंग्रेजी कानून विलोपित कर दिए, 500 साल से चल रही कानूनी लड़ाई जीतकर अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण कर लिया। परंतु दूसरी ओर हम अपने गाँव की मिट्टी भूल गए। खेत-खलिहान क्या है, जानते ही नहीं हैं, देखा भी नहीं। पूर्वजों के संस्कार भूल गए। मान-मर्यादा ताक पर रख दी। फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं, पर गीता का एक श्लोक भी शुद्ध उच्चारण से नहीं पढ़ सकते।
इसके कारणों को ढूंढने पर एक ही तथ्य सामने आया और वह है – “वैचारिक गुलामी”। यह तब होती है जब कोई व्यक्ति अपनी सोचने-समझने की क्षमता खो देता है। वह दूसरों के विचारों, पुरानी रूढ़ियों या बाहरी एजेंडे को बिना किसी प्रश्न के स्वीकार कर लेता है। किसी विचार या नेता की बातों को बिना सोचे-समझे सच मान लेता है। सही और गलत का फैसला स्वयं करने के बजाय दूसरों पर निर्भर रहता है। अपनी संस्कृति, भाषा या विचारों को दूसरों से कमतर समझता है।
1947 में अंग्रेज चले गए, लेकिन पाश्चात्य शासन व्यवस्था के साथ मैकाले की सोच वाली शिक्षा भी यहीं रह गई और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लागू होने के 6 साल बाद भी वह अंगद के पैर की भांति जमी हुई है। यहाँ इसका कारण भी जानना प्रासंगिक है और वह अक्टूबर 1868 में भारतीय ज्ञान के मूल स्रोत वेदों का यूरोपीय भाषा में अनुवाद करने वाले मैक्समूलर के एक पत्र से स्पष्ट हो जाता है। वह लिखता है:
‘India has been conquered once, but she should be conquered again. And the second conquest should be the conquest through education.’
अर्थात भारत एक बार जीता गया है, परंतु उसे सर्वार्थ में दूसरी बार जीता जाना चाहिए, और यह दूसरी विजय शिक्षा के माध्यम से होनी चाहिए। और मैकाले प्रणीत शिक्षा के माध्यम से भारत जीता गया।
मैक्समूलर और मैकाले की “वैचारिक गुलामी” का उत्तर देना अभी बाकी है… हिंदेशियावासियों।
यह उत्तर होगा… “भारत माता एक बार 15 अगस्त 1947 को मुक्त हुई है, परंतु उसे सर्वार्थ में दूसरी बार मुक्त करने की आवश्यकता है। यह दूसरी मुक्ति भी होगी दैशिक शास्त्र के अध्ययन-अध्यापन की शिक्षा के माध्यम से”।
भारत माता की इस पीड़ा को समझकर दृढ़ संकल्प के साथ इसका उत्तर देने के लिए पुनरुत्थान विद्यापीठ ने शिक्षा के भारतीयकरण की प्रक्रिया का बीड़ा पाँच ‘तप’ के साथ उठाया है।
🔥 पहला तप – नेमिषारण्य : गोमती नदी के पास स्थित एक पवित्र हिंदू तीर्थ स्थल है, जहाँ ऋषियों ने वेदों और पुराणों का पाठ किया था। जिस प्रकार महाभारत युद्ध के पश्चात कुलपति शौनक के संयोजकत्व में अठासी हजार ऋषियों ने बारह वर्ष तक ज्ञान यज्ञ किया था, उसी प्रकार वर्तमान समय में भी देश के विद्वज्जनों को सम्मिलित कर फिर से ज्ञान यज्ञ करने की आवश्यकता है। फिर से शिक्षा का भारतीय प्रतिमान तैयार करने के लिए यह प्रथम चरण राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के रूप में पूरा हो गया है।
🔥 दूसरा तप – लोकमत परिष्कार: जनमानस के विचारों और भावनाओं को परिष्कृत, संस्कारित और राष्ट्रहित के अनुकूल जागरूक करना। इसका उद्देश्य समाज में जाति, संप्रदाय या स्वार्थ से ऊपर उठकर देशहित और नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता देने वाली वैचारिक चेतना का निर्माण करना है। शिक्षा सर्वजन समाज के लिए होती है। सर्वजन का प्रबोधन करना, शिक्षा के नए प्रतिमान को समाज से स्वीकृति दिलवाना, लोकजीवन में विद्यमान रूढ़ि, कर्मकांड, अंधश्रद्धा को परिष्कृत करना। यह चरण लोकजागरण, लोकशिक्षण, प्रिंट मीडिया, सोशल मीडिया के माध्यम से हो रहा है।
🔥 तीसरा तप – परिवार शिक्षा : यह अनौपचारिक और प्राथमिक अभिकरण है। यह बच्चे का पहला विद्यालय है जहाँ जन्म के बाद से ही अनजाने में और स्वाभाविक रूप से उसकी शिक्षा और समाजीकरण की शुरुआत होती है। शिक्षा व्यक्ति के जन्म से पूर्व ही आरंभ हो जाती है। उस समय शिक्षा देने वाले माता-पिता होते हैं। अतः माता को प्रथम गुरु कहा गया है। परिवार में संस्कार होते हैं, चरित्र निर्माण होता है। परिवार कुल परंपरा, कौशल परंपरा, व्यवसाय परंपरा तथा वंश परंपरा का वाहक होता है। अतः कुटुंब प्रबोधन शिक्षा यह तीसरा चरण है।
🔥 चौथा तप – शिक्षक निर्माण : यह सुनियोजित, वैचारिक और व्यावसायिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा किसी व्यक्ति को एक कुशल, नैतिक, संवेदनशील और प्रभावी शिक्षक के रूप में तैयार किया जाता है। इसमें वैयक्तिक विकास के साथ-साथ शिक्षण कौशल, ज्ञान अर्जन और उत्तरदायित्व की भावना का विकास शामिल है। देश की भावी पीढ़ी के निर्माण के लिए समर्थ शिक्षकों की आवश्यकता रहती है। जब तक दायित्वबोध युक्त और ज्ञानसंपन्न शिक्षक नहीं होंगे तब तक भारतीय शिक्षा देने वाले विद्याकेंद्र नहीं चल सकते। अतः सुयोग्य शिक्षक निर्माण करना, यह योजना का चौथा चरण है।
🔥 पाँचवाँ तप – विद्यालयों की स्थापना: ऐसे विद्याकेंद्रों की स्थापना जो शासन के नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त हों, जिनकी विषय-वस्तु भारतीय ज्ञान परंपरा और मूल्यों पर आधारित हो, तथा जो अर्थ-निरपेक्ष व समाज-संचालित हों। विद्यापीठ की संकल्पना है कि पहले चारों चरण ठीक से संपन्न हो गए तो पाँचवाँ चरण सरल हो जाएगा। और निर्माण किए हुए शिक्षक जब देशभर में विद्यालय चलाएंगे, तभी भारतीय स्वरूप की शिक्षा दी जा सकेगी। वर्तमान में यह संकल्पना विद्या भारती संस्थान द्वारा पूरी की जा रही है।
विदेशी आक्रांताओं के आने से पहले भारत में गुरुकुल, आश्रम, मंदिर और छोटी-छोटी चौपालों के माध्यम से जीवन का सर्वतोमुखी विकास होता था और व्यक्ति का तथा राष्ट्र का जीवन सुख, समृद्धि, संस्कार एवं ज्ञान से परिपूर्ण होता था। विश्व भी उससे लाभान्वित होता था। सांदीपनि, नालंदा, तक्षशिला और धार की भोजशाला इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
भारतीय शिक्षा व्यवस्था में ‘स्व’ की स्थापना करने की आवश्यकता है। हम जो भी विषय पढ़ते हैं, वे भारतीय ज्ञान परंपरा और जीवनमूल्यों के अनुरूप नहीं हैं। इसी कारण आज की पीढ़ी में एक बहुत बड़ा वर्ग दिग्भ्रमित दिखाई देता है। शिक्षा व्यवस्था परिवर्तन का अगला कार्य स्व-आधारित तंत्र निर्मित करना है। इन विद्याकेंद्रों का आदर्श लेकर पुनरुत्थान विद्यापीठ कार्यरत है।
दैशिक शास्त्र दर्शन कहता है कि “जिस देश में जिसकी दैशिक शिक्षा नहीं, वहाँ की प्रजा भू-भाग शासन की दृष्टि से स्वतंत्र, परंतु मानसिक रूप में परतंत्र रहती है।” आजादी के 80 वर्ष बाद भारत की 140 करोड़ जनता की न्यायपालिका, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका के संचालक मंडल द्वारा संचालित करने के तौर-तरीकों के दृष्टिकोण से यह स्वयं सिद्ध है।
भारत माँ का वैभव शाश्वत रहे, इसके लिए आज हमें “त्रिस्तरीय स्वराज” चाहिए। शिक्षा में स्वराज, समाज में स्वराज, शासन में स्वराज। और इन तीनों को प्राप्त करने की कुंजी है “दैशिक शिक्षा”।
1. दैशिक शास्त्र का अर्थ और आवश्यकता
“दैशिक” शब्द “देश” से बना है। अर्थात जो शिक्षा देश की मिट्टी, देश की भाषा, देश की संस्कृति से उपजी हो। अथर्ववेद के श्लोक 12.1.12 में कहा गया है:
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”, अर्थात यह भूमि मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ। जिस शिक्षा में हम अपनी माता को ही न पहचानें, वह शिक्षा किस काम की? मैकाले की शिक्षा व्यवस्था में ‘माँ’ से ज्यादा महत्व मौसी को देना सिखाया जाता है। यही कारण है कि पढ़ी-लिखी पीढ़ी रोज सुबह अखबार में छपे नौकरी के विज्ञापन देखती है।
चाणक्य ने कहा है:
“मूर्खस्य पंच चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं तथा। क्रोधश्च दृढवादश्च परवाक्येष्वनादरः।।”
अर्थात मूर्ख के 5 लक्षण हैं – गर्व, कड़वा बोलना, क्रोध, हठ और दूसरों की बात न मानना। आज हमारी शिक्षा प्रणाली में यही 5 लक्षण हैं। हमें अंग्रेजी न आने पर गर्व नहीं, शर्म आती है। हम अपने ही ग्रंथों का अपमान करते हैं। यही “परवाक्येष्वनादरः” है।
पुनरुत्थान संस्थान, अहमदाबाद के अनुसार 21वीं सदी में भारत के सामने 3 संकट हैं:
1. पहचान का संकट – हम कौन हैं, यह भूल गए।
2. ज्ञान का संकट – हमारा ज्ञान दूसरे देशों की किताबों में बंद है।
3. चरित्र का संकट – डिग्री है, पर संस्कार नहीं।
इन तीनों संकटों से उबरने का समाधान दैशिक शास्त्र में है। आवश्यकता है खोजी और फौजी बनने की।
2. पहला स्तर: शिक्षा में स्वराज – “राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 से दैशिक शास्त्र तक” की यात्रा
विकास के हर पड़ाव पर शिक्षा ही नींव रही है। नींव कमजोर तो इमारत गिरेगी। और 2020 में भारत सरकार ने इसी नींव को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को संसद में कानून का रूप देकर मजबूत करने का संकल्प लिया है।
भूदान आंदोलन के प्रणेता आचार्य विनोबा भावे ने आजादी के तुरंत बाद कहा था कि “आजादी मिलने के बाद मैकाले शिक्षा पद्धति द्वारा संचालित विद्यालयों को बंद कर दिया जाए और फिर हमारे विद्यालय शुरू किए जाएं।”
एनडीए की सरकार ने 75 साल बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में विनोबा जी और गांधी जी की उसी कल्पना को नीति का रूप दिया है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और दैशिक शास्त्र में 5 समानताएं स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं।
पहली समानता मातृभाषा में शिक्षा है।
NEP 2020 में कक्षा 5 तक मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा को अनिवार्य किया गया है। लाला बद्रीनाथ जी कहा करते थे कि “जिस भाषा में माँ लोरी गाती है उसी में ज्ञान स्थाई होता है।” इसी भाव से प्रेरित होकर आज IIT खड़गपुर में हिंदी में B.Tech की पढ़ाई प्रारंभ हुई है और उसमें अध्येता टॉपर बन रहे हैं।
दूसरी समानता भारतीय ज्ञान प्रणाली को मजबूत करना है।
NEP में आयुर्वेद, गणित, खगोल, सांख्य योग, वैदिक गणित, मानव मूल्य शिक्षण जैसे विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है। उपनिषदों का वाक्य है “सा विद्या या विमुक्तये” अर्थात शिक्षा का लक्ष्य मुक्ति है। इसी को ध्येय वाक्य बनाकर दिल्ली विश्वविद्यालय में “भारतीय ज्ञान परंपरा” को अनिवार्य पेपर बना दिया गया है।
तीसरी समानता बहु-विषयकता और लचीलापन है।
NEP में विज्ञान के साथ कला और कौशल को एक साथ जोड़ने का प्रावधान है। चाणक्य नीति में कहा गया है “शिल्पम् शिक्षेत्” अर्थात हर व्यक्ति को कोई न कोई शिल्प अवश्य आना चाहिए। इसी के अनुरूप CBSE ने 11वीं-12वीं में छात्र को गणित के साथ संगीत तथा कोडिंग के साथ कुम्हारी या बढ़ईगिरी चुनने का विकल्प दे रखा है।
चौथी समानता मूल्य आधारित शिक्षा है।
NEP में नैतिकता, नागरिक कर्तव्य और संवैधानिक मूल्यों को राष्ट्रीय चेतना का मूलाधार माना गया है। नीतिशास्त्र में कहा गया है “चरित्रं शिक्षेत्” अर्थात चरित्र निर्माण सबसे पहले होना चाहिए। इसी के पालन में आज हर स्कूल में 15 मिनट “नीति श्लोक” – चाणक्य, विदुर, तिरुक्कुरल तथा साधु-संत, ऋषि-मुनि और समाज सुधारकों के वचनों के पाठ का प्रावधान किया गया है।
पाँचवीं समानता व्यावसायिक शिक्षा है।
NEP के अंतर्गत कक्षा 6वीं से ही कौशल, बागवानी, कारीगरी आदि का प्रशिक्षण प्रारंभ किया गया है। पुनरुत्थान संस्थान की “काम के साथ ज्ञान” की अवधारणा को इसमें मूर्त रूप दिया गया है। अनेक विद्यालयों में छात्र सप्ताह में एक दिन खेती और बुनाई सीखते हैं। इससे वे स्वावलंबी बनते हैं। इस प्रकार गांधी जी की नई तालीम की अवधारणा को साकार किया गया है।
अब प्रश्न उठता है कि स्वतंत्र भारत में मैकाले की शिक्षा का क्या काम? देश आजाद है। संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न गणतंत्र है। मौलिक अधिकार हैं और कर्तव्य पालन के लिए नीति निर्देशक तत्व हैं। अदम्य साहस वाली सैन्य-शक्ति है। मुद्रा भंडार है। यातायात साधनों का जाल है। उद्योग और व्यापार निरंतर प्रगति कर रहा है। फिर 1835 में बनी लॉर्ड मैकाले की शिक्षा क्यों? जिसका उद्देश्य था ऐसे वर्ग को तैयार करना जो “खून और रंग से भारतीय हो पर रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज हो।” इसी वजह से आज 200 साल बाद भी हमारे IIT, IIM के टॉपर विदेश की ओर भाग रहे हैं। क्योंकि शिक्षा ने उन्हें “नकलची” बनाया, “सृजनकर्ता” नहीं।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 कागज पर दैशिक शास्त्र है। अब उसे जमीन पर उतारना है। जिस दिन हर स्कूल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के स्तंभ लागू होंगे, उस दिन पुनरुत्थान का सपना पूरा होगा। तभी “भारत विश्वगुरु” का सपना भी सच होगा।