संसद, प्रतीकात्मक राजनीति और चयनात्मक पारदर्शिता का प्रश्न

श्री राज नारायण द्विवेदी

लोकतंत्र में संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं है, बल्कि वह राष्ट्र की राजनीतिक संस्कृति का दर्पण भी होती है। देश की जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनती है कि वे संसद में उसके जीवन से जुड़े प्रश्नों—रोजगार, शिक्षा, कृषि, अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक न्याय—पर गंभीर बहस करें। इसलिए संसद का प्रत्येक मिनट राष्ट्रीय संपत्ति के समान है। जब यही समय नारेबाजी, हंगामे और प्रतीकात्मक राजनीतिक प्रदर्शनों में व्यतीत होने लगता है, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

हाल के मानसून सत्र में लोकसभा परिसर में विपक्षी सांसदों द्वारा प्रस्तुत “चंदा चोरी” का नाटकीय प्रदर्शन इसी बहस को जन्म देता है। इस प्रदर्शन में सांसद पप्पू यादव ने भगवा वस्त्र धारण कर एक साधु का अभिनय किया, विपक्षी नेताओं ने प्रतीकात्मक रूप से दान-पेटी में धन डाला और उसके माध्यम से राजनीतिक संदेश देने का प्रयास किया। स्पष्ट है कि यह प्रदर्शन चुनावी चंदे और सत्तापक्ष की आलोचना के लिए किया गया था। किंतु इस घटना ने एक दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़ा कर दिया—क्या भारत की राजनीति में धार्मिक प्रतीकों का उपयोग केवल एक दिशा में ही स्वीकार्य माना जा रहा है?

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यही संविधान सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान और राज्य की धार्मिक निरपेक्षता का भी आधार है। यदि किसी एक धार्मिक परंपरा के प्रतीकों को बार-बार राजनीतिक व्यंग्य का माध्यम बनाया जाए, जबकि अन्य धार्मिक संस्थाओं से जुड़े विवादों पर वैसी ही प्रतीकात्मक प्रतिक्रिया कभी दिखाई न दे, तो यह स्वाभाविक रूप से चयनात्मकता का आरोप उत्पन्न करता है।

यह भी एक तथ्य है कि पिछले वर्षों में केवल मंदिरों या हिंदू धार्मिक संस्थाओं से जुड़े विवाद ही सामने नहीं आए हैं। महाराष्ट्र में चर्च की भूमि से जुड़े कथित ₹300 करोड़ के भूमि घोटाले के बाद राज्य सरकार ने चर्च और मिशनरी संपत्तियों का व्यापक ऑडिट कराने का निर्णय लिया। केरल के बिलीवर्स ईस्टर्न चर्च से जुड़े विदेशी अंशदान (एफसीआरए) और कर संबंधी मामलों की जांच आयकर विभाग तथा अन्य एजेंसियों द्वारा की गई। मेथोडिस्ट चर्च इन इंडिया तथा चर्च ऑफ साउथ इंडिया की संपत्तियों के प्रबंधन और हस्तांतरण से जुड़े विवाद भी न्यायालयों और प्रशासनिक संस्थाओं तक पहुंचे। इसी प्रकार वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और अतिक्रमण से जुड़े अनेक मामले भी समय-समय पर सार्वजनिक चर्चा का विषय बने हैं।

इन सभी मामलों का उल्लेख इसलिए आवश्यक है कि लोकतंत्र में कानून का सिद्धांत समानता पर आधारित होता है। यदि किसी भी संस्था—चाहे वह राजनीतिक दल हो, धार्मिक संगठन हो, ट्रस्ट हो या गैर-सरकारी संगठन—के विरुद्ध वित्तीय अनियमितता या कानून के उल्लंघन के आरोप लगते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किंतु प्रश्न यह है कि क्या इन मामलों को लेकर संसद परिसर में कभी वैसा ही नाटकीय प्रदर्शन हुआ जैसा राम मंदिर या भगवा प्रतीकों को केंद्र में रखकर देखने को मिला?

लोकतंत्र में राजनीतिक व्यंग्य की अपनी भूमिका है, किंतु व्यंग्य तभी विश्वसनीय होता है जब वह निष्पक्ष हो। यदि वह केवल एक विचारधारा, एक धर्म या एक राजनीतिक पक्ष तक सीमित रह जाए, तो वह व्यंग्य कम और राजनीतिक रणनीति अधिक प्रतीत होता है। इससे समाज में संवाद नहीं, बल्कि ध्रुवीकरण बढ़ने की आशंका रहती है।

इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष “चंदा” और “पारदर्शिता” है। यदि विपक्ष चुनावी चंदे में पारदर्शिता की मांग करता है, तो वही सिद्धांत विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले सभी धार्मिक, सामाजिक और गैर-सरकारी संगठनों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए। इसी प्रकार यदि किसी धार्मिक संस्था के वित्तीय लेनदेन पर प्रश्न उठते हैं, तो उनकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। कानून की दृष्टि में मंदिर, चर्च, मस्जिद, वक्फ, गुरुद्वारा, ट्रस्ट, एनजीओ और राजनीतिक दल—सभी समान रूप से जवाबदेह होने चाहिए।

भारतीय लोकतंत्र की शक्ति उसकी संस्थाओं की निष्पक्षता में निहित है। संसद यदि प्रतीकों के संघर्ष का मंच बन जाएगी, तो जनहित के वास्तविक प्रश्न पीछे छूट जाएंगे। आज देश को ऐसी राजनीति की आवश्यकता है जो प्रतीकात्मक टकराव से ऊपर उठकर नीति, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व पर केंद्रित हो। लोकतंत्र की विश्वसनीयता तभी बनी रहेगी जब पारदर्शिता का सिद्धांत सभी पर समान रूप से लागू होगा—न कि केवल राजनीतिक सुविधा के अनुसार।

संसद की गरिमा इस बात से नहीं बढ़ती कि कौन कितना तीखा नाटक करता है, बल्कि इस बात से बढ़ती है कि वहां राष्ट्रहित के प्रश्नों पर कितनी गंभीरता, समानता और संवैधानिक मर्यादा के साथ चर्चा होती है। लोकतंत्र में चयनात्मक आक्रोश नहीं, बल्कि समान मानदंड ही जनविश्वास की सबसे बड़ी कसौटी हैं।


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