
लेखक: डॉ सुशील कुमार शर्मा
हर साल 26 जुलाई का दिन भारत के इतिहास में केवल एक कैलेंडर तिथि नहीं, बल्कि भारतीय सेना के अदम्य साहस, राष्ट्रवाद की प्रखर भावना और अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत की कूटनीतिक संप्रभुता का जीवंत प्रतीक है। वर्ष 1999 में इसी दिन भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ को सफलतापूर्वक अंजाम देकर कारगिल की दुर्गम चोटियों से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़कर तिरंगा फहराया था। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि जब देश की अखंडता पर आंच आती है, तो भारत का सैन्य और कूटनीतिक नेतृत्व किस तरह अभेद्य दीवार बनकर खड़ा हो जाता है।
कारगिल युद्ध केवल सीमाओं पर लड़ा गया युद्ध नहीं था, बल्कि यह आधुनिक भारत के राष्ट्रवादी विमर्श को एक नई दिशा देने वाला मोड़ था। इस युद्ध ने देश के भीतर ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना को गहराई से स्थापित किया। कश्मीर के पहाड़ों में जब देश के वीर जवान -10 से -15 डिग्री की हाड़ कंपाने वाली ठंड में ‘बाघ हिल’, ‘टोलोलिंग’ और ‘टाइगर हिल’ जैसी चोटियों पर रेंगते हुए आगे बढ़ रहे थे, तब पूरा देश जाति, धर्म और भाषा की सीमाओं को भुलाकर एक सूत्र में बंध गया था। कारगिल ने भारत को अपने शहीदों को सम्मानित करने का एक नया विमर्श दिया। कैप्टन विक्रम बत्रा का उद्घोष “ये दिल मांगे मोर” और कैप्टन मनोज कुमार पांडेय का साहस आज भी देश के युवाओं के लिए राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी परिभाषा हैं। इस युद्ध ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि भारत शांतिप्रिय देश जरूर है, लेकिन अपनी संप्रभुता और सीमाओं की रक्षा के लिए वह किसी भी सीमा तक जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की कूटनीतिक सफलता इस बात से देखी जा सकती है कि,कारगिल युद्ध सैन्य मोर्चे के साथ-साथ कूटनीतिक मोर्चे पर भी एक ऐतिहासिक मोड़ था। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में देश ने एक बेहतरीन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का प्रदर्शन किया, जिसने पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर पूरी तरह अलग-थलग कर दिया।
इस युद्ध को नियंत्रण रेखा (LoC) का सम्मान और वैश्विक समर्थन के रूप में बेहद अहम इसलिए माना जाता है जब भारत ने एक बेहद सधा हुआ रुख अपनाया। भारतीय सेना को सख्त निर्देश थे कि वे किसी भी परिस्थिति में नियंत्रण रेखा पार न करें। भारत के इस आत्मसंयम ने दुनिया को दिखा दिया कि भारत आक्रामक नहीं, बल्कि अपनी रक्षा में लड़ रहा है। इसका परिणाम यह हुआ कि अमेरिका, ब्रिटेन और यहां तक कि चीन ने भी पाकिस्तान को LoC का सम्मान करने और अपनी सेनाएं पीछे हटाने को कहा।
यहाँ अमेरिका का रुख और वाशिंगटन घोषणापत्र और भी ज्यादा महत्वपूर्ण था जिसमें पाकिस्तान को उम्मीद थी कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मामले में हस्तक्षेप कर युद्धविराम करा देगा और घुसपैठियों को चोटियों पर बने रहने का मौका मिल जाएगा। लेकिन भारत की दृढ़ कूटनीति के आगे तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को सख्त रुख अपनाना पड़ा। 4 जुलाई 1999 को वाशिंगटन में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने पड़े, जिसमें बिना शर्त घुसपैठियों को हटाने की बात स्वीकार की गई। यह भारत की बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत थी।
इस युद्ध में चीन को अपनी पैंतरेबाजी को छोड़कर तटस्थता की नीति अपनाने को बाध्य होना पड़ा क्योंकि पाकिस्तान का सदाबहार दोस्त माने जाने वाले चीन ने भी इस युद्ध में पाकिस्तान का खुलकर साथ नहीं दिया और मामले को बातचीत के जरिए सुलझाने तथा LoC का सम्मान करने की सलाह दी।
यह युद्ध बहुत बड़ा कूटनीतिक सबक देने वाला रहा जब कारगिल ने दुनिया के सामने यह साबित कर दिया कि भारत एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति है, जो अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान करना जानता है, लेकिन अपनी सुरक्षा से समझौता कभी नहीं करेगा।
आज हमें यह कहते हुए गौरव होता हैं कि,कारगिल विजय दिवस केवल अतीत के गौरवगान का अवसर नहीं है, बल्कि यह भविष्य के संकल्पों का दिन है। कारगिल युद्ध से मिले सबकों के बाद ही भारत ने अपनी सैन्य तैयारियों, खुफिया तंत्र और रक्षा तकनीक में व्यापक सुधार किए। आज जब भारत ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी मिसाइलों, विमानों और हथियारों का निर्माण कर रहा है, तो उसकी नींव में कारगिल के अनुभव भी शामिल हैं।
26 जुलाई को कारगिल के वीर योद्धाओं को नमन करते हुए देश का हर नागरिक गर्व से कह सकता है कि भारत की सीमाएं सुरक्षित हाथों में हैं और देश का कूटनीतिक और राष्ट्रवादी संकल्प आज पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ और प्रखर है। जय हिंद!