
श्री प्रशांत पोळ
ग्यारहवीं शताब्दी यह भारत के इतिहास का संधिकाल हैं। इस्लामी आक्रमण प्रारंभ हो चुके थे। पूरा गांधार (अफगानिस्तान), मुल्तान, पंजाब का कुछ हिस्सा इस्लामी शासन के अंतर्गत आ चुका था। यहां इस्लामी शासक राज कर रहे थे। किंतु फिर भी, 80% से ज्यादा भारत, हिंदू रीति-रिवाज, सनातन परंपराओं को निर्भीकता के साथ निभा रहा था। महमूद गजनवी ने मथुरा, कन्नौज और सोमनाथ पर आक्रमण किए थे। सोमनाथ को लूटा भी था। किंतु वह गुजरात पर राज न कर सका। वहां अभी भी सोलंकी राजवंश का ही राज था।
मालवा के राजा भोज इन्हीं दिनों, राज्य व्यवस्था के आदर्श निर्माण कर रहे थे। सन 1010 में उनका राज्याभिषेक हुआ और अगले 45 वर्ष उन्होंने राज किया। यह सारा समय मालवा के लिए स्वर्णिम काल था। राजा भोज स्वत: ज्ञान के प्रेमी थे। कला के साधक थे। अभियांत्रिकी के सिद्धहस्त थे। वह ऋषितुल्य राजा के रूप में लोगों में लोकप्रिय हो रहे थे। उन्होंने अनेक विद्वानों को एकत्र किया। कुछ पुस्तकें उनसे लिखवाई और कुछ स्वतः लिखी। उन 45 वर्षों में लगभग 84 ग्रंथोंकी रचना की, जो आज एक हजार वर्ष के बाद भी विस्मय में डाल देती हैं। इनमें से अधिकांश ग्रंथ ‘विश्वकोश’ के स्तर के हैं। उन ग्रंथों के ज्ञान का स्तर कालातीत हैं।
धारानगरी (धार) राजा भोज की राजधानी थी। किंतु परमार वंश की पहले की राजधानी अवंतिका (उज्जयिनी, उज्जैन), यह हजारों वर्षों से ज्ञान का केंद्र था। गणित, खगोल शास्त्र जैसे विषयों पर यहां निरंतर अध्ययन हो रहा था। चौथी शताब्दी में वराहमिहिर, छठवीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त, आठवीं शताब्दी में लल्ल जैसे विद्वानों की परंपरा बनी हुई थी। यह शोध का, शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र अवश्य था, किंतु बड़े स्तर का विद्यापीठ (विश्वविद्यालय) नहीं था। राजा भोज के कालखंड में ही उज्जैन में श्रीपति, खगोल शास्त्र पर अद्भुत कम कर रहे थे।
राजा भोज ने उज्जयिनी की इस परंपरा को तो अक्षुण्ण रखा। किंतु उन्हे साहित्य, संस्कृत, अभियांत्रिकी आदि विषयों पर एक ज्ञान केंद्र का निर्माण करना था। यह सारे विषय राजा भोज के प्रिय विषय थे। इसलिए, यह ज्ञान केंद्र, जो एक छोटा विश्वविद्यालय था, बनाया गया राजधानी धारानगरी (धार) में। सन 1034 में बनकर पूर्ण हुए इस ज्ञान केंद्र का नाम रखा गया – भोजशाला..!
भोजशाला यह ज्ञान का केंद्र था, विद्या का निवास था, प्रज्ञा का अधिष्ठान था। स्वाभाविक हैं, विद्या की देवी सरस्वती की सुंदर सी प्रतिमा राजा भोज ने इस भोजशाला में स्थापित की। यही वह ‘वाग्देवी की प्रतिमा’ है जो लंदन के संग्रहालय में कैद हैं।
गुरुकुल के तर्ज में संचालित इस भोजशाला में संस्कृत भाषा तथा व्याकरण का गहन अध्ययन, अध्यापन होता था। भोजशाला के दीवारों और फर्श पर उकेरे गए शिलालेखों में संस्कृत व्याकरण के नियम और चार्ट दिखाई देते हैं।
यहां खगोल विज्ञान (Astronomy), आयुध विज्ञान (Weapons Science), विमान शास्त्र (Aviation) और वास्तुकला (Architecture) जैसे उन्नत विषयों पर विस्तृत शोध और अध्यापन होता था। इन विषयों पर पढ़ने के लिए देश-विदेश के छात्र आते थे।
उन्ही दिनों राजा भोज विभिन्न विषयों पर ग्रंथों की रचना कर रहे थे। ‘समरांगण सूत्रधार’, ‘युक्ति कल्पतरु’, ‘सरस्वती कंठाभरणम’, ‘श्रृंगार प्रकाश’, ‘राजमार्तंड’, ‘तत्वप्रकाश’, ‘व्यवहार समुच्चय’, नाममालिका’, ‘चारुचर्या’, ‘राज्यमृगांक’, ‘आयुर्वेद सर्वस्व’ यह सारे ग्रंथ उन्ही दिनों लिखे गए।
इतिहास के उस संधिकाल में, जब भारत अत्यंत वैभव और संपन्नता के कारण शिथिल हो रहा था, तब राजा भोज ने समाज को ज्ञान मार्ग और ज्ञान परंपरा की ओर मोड़ने की पहल की। उसकी प्रतीक बनी ‘भोजशाला’। आगे जाकर यूरोप में जो रेनेसॉं (Renaissance – पुनर्जागरण) हुआ, उसके तीन सौ – चार सौ वर्ष पहले, भारत में रेनेसॉं का प्रारंभ किया राजा भोज ने। भोजशाला के रूप में। (दुर्भाग्य से आगे जाकर इस्लामी आक्रमण बढ़ते गए। भारतीय शासक हारते गए और ये भारतीय रेनेसॉं वहीं समाप्त हुआ)
राजा भोज ने भोजशाला को सांस्कृतिक केंद्र के रूप में भी प्रस्थापित किया। उनके कार्यकाल में और उसके बाद के परमार शासको के काल में, यह विद्वानों और कवियों का प्रमुख मंच था। यहां नियमित रूप से साहित्य गोष्ठियां होती थी।
भोजशाला में नाटकों का मंचन होता था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को यहां ऐसे शिलालेख मिले हैं, जिनमें राजा भोज के उत्तराधिकारी दरबारी कवि द्वारा रचित दो अंक (एक्ट) के नाटक का वर्णन हैं।
राजा भोज ने लिखे हुए ग्रंथों का अध्यापन भोजशाला में होता था। समरांगण सूत्रधार में राजा भोज ने नगर नियोजन और वास्तु शास्त्र के बारे में विस्तार से लिखा हैं। भोजशाला के निर्माण के लगभग 116 वर्षों के पश्चात, अर्थात वर्ष 1150 में, धारानगरी (धार) से 3180 किलोमीटर दूर, कंबुज देश (कंबोडिया) में एक अत्यंत विशाल प्रार्थना स्थल का निर्माण हुआ। यही प्रसिद्ध ‘अंगकोर वाट’ हैं, जो सारे विश्व में सबसे बड़ा प्रार्थना स्थल हैं, और जो हिंदू मंदिरों का समूह हैं।
मजेदार बात यह, की अंगकोर वाट के निर्माण में जो सिद्धांत, आदर्श और संदर्भ लिए गए हैं, वह सारे समरांगण सूत्रधार में उपलब्ध हैं।
समरांगण सूत्रधार में वास्तुपुरुष मंडल का विस्तृत आलेख 11 से 14 अध्याय में दिया हैं। 14वें अध्याय का शीर्षक हैं – ‘पुरुषांङदेवता निघंट्वादी निर्णयः’। अंगकोर वाट का पूरा ढांचा, वास्तुपुरुष मंडल की ग्रिड प्रणाली पर आधारित हैं। इसमें ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रवाह को ध्यान में रखकर, केंद्र और दिशाएं तय की गई हैं।
समरांगण सूत्रधार में विभिन्न प्रकार के मंडलों का उल्लेख हैं। मंदिरों और राजमहलों के लिए 64 पदों के ‘मंडूक मंडल’ को महत्वपूर्ण माना जाता हैं। अंगकोर वाट के संपूर्ण मास्टर प्लान और उसके गर्भ गृह में ‘मंडूक मंडल’ का सटीक प्रभाव दिखाई देता हैं। अंगकोर वाट का सबसे अहम हिस्सा, जहां केंद्रीय शिखर स्थित हैं, वह 64 पद के मंडूक मंडल के केंद्र (ब्रह्मस्थान) को दर्शाता हैं। यह मेरु पर्वत की रचना हैं।
सूर्यवर्मन (द्वितीय) ने बनाए हुए इस विशाल मंदिर समूह में संस्कृत भाषा, भारतीय पंचांग, रामायण – महाभारत, मंदिर स्थापत्य, राजधर्म की अवधारणा… इन सभी की झलक स्पष्ट से दिखती हैं।
अब मात्र सौ – सवा सौ वर्षो में, समरांगण सूत्रधार में वर्णित रचना के आधार पर अंगकोर वाट का निर्माण हुआ होगा यह मानना कठिन हैं। समरांगण सूत्रधार में नया कुछ नहीं लिखा हैं। स्थापत्य शास्त्र के प्राचीन ग्रंथ मयमतम् (मयमतमुलाकला शास्त्र), मानसर शिल्पशास्त्र आदि ग्रंथों के आधार पर समरांगण सूत्र लिखा गया हैं। अंगकोर वाट भी इन्हीं प्राचीन स्थापत्य शास्त्रों के ग्रंथोंके आधार पर निर्मित हुआ हैं। अर्थात, हजारों किलोमीटर दूरस्थ रहकर भी, भारतीय ज्ञान परंपरा दोनों स्थानों पर प्रवाहित थी।
इसी परंपरा को जीवित रखा भारतीय विद्यापीठों ने, विश्वविद्यालयों ने। तक्षशिला, नालंदा, उड्डयंतपुर (ओदंतपुर), विक्रमशिला, सुलोटगी, कांची आदि विश्वविद्यालयों ने यह परंपरा जारी रखी। भोजशाला भी इसी परंपरा की संवाहक थी। यह विज्ञान, कला और अध्यात्म का जीवंत केंद्र था, जहां हजारों छात्र अपनी बौद्धिक जिज्ञासा शांत करने आते थे।
ग्यारहवीं शताब्दी में महमूद गजनवी के साथ अरब का प्रवासी इतिहासकार अल्-बरूनी भारत आया था। अपनी ऐतिहासिक पुस्तक ‘तारीख-उल्-हिंद’ में राजा भोज, उसकी राजधानी धारानगरी और यहां के ज्ञान केंद्र के बारे में अल्-बरूनी ने लिख रखा हैं – ‘धारानगरी यह विद्वानों की नगरी हैं। यहां के ज्ञानकेंद्र में स्थापित वेधशाला अत्यंत सूक्ष्मता और सुस्पष्टता के साथ कार्य करती हैं।’ (अल्-बरुनी के धारानगरी प्रवास के समय भोजशाला का निर्माण चल रहा था।) फरिश्ता और निजामुद्दीन अहमद जैसे तत्कालीन विदेशी इतिहासकारों ने भी धार और भोजशाला की प्रशंसा की हैं।
किंतु दुर्भाग्य से इस्लाम के आक्रमणों के कारण भारत के ज्ञान मंदिर, विद्यापीठ (विश्वविद्यालय) धीरे-धीरे समाप्त होते गए। वर्ष 1193 में बख्तियार खिलजी ने विश्व के तत्कालीन सबसे बड़े विश्वविद्यालय, नालंदा को बेरहमी से नष्ट किया। वहां का सारा ग्रंथ भंडार महीनों तक जलता रहा। विक्रमशिला के विश्वविद्यालय में पढ़ रहे 10,000 विद्यार्थियों को नृशंसता के साथ काट डाला। उनकी हत्या की।
ऐसा लगभग सभी विश्वविद्यालयों के साथ हुआ..!
भारत में उच्च शिक्षा, उन्नत ज्ञान की परंपरा लगभग खंडित सी हो गई। 1193 में नालंदा के विध्वंस के बाद अगले कुछ ही वर्षों में, लगभग सभी बड़े विश्वविद्यालय बंद होते गए। गुजरात का ‘वल्लभी’ तो आठवीं शताब्दी में ही इस्लामी आक्रांताओं के कारण जर्जर हो गया था। इन बाकी विद्यापीठों के साथ उसने भी अपनी अंतिम सांस ली।
किंतु अज्ञान के इस अंधकार में एक दिया टिमटिमा रहा था – भोजशाला का !
परमार राजाओं के शौर्य के कारण चौदहवी शताब्दी के प्रारंभ तक मालवा, इस्लामी आक्रांताओं से मुक्त था। अन्ततः वर्ष 1305 में, 271 वर्षों बाद, अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण करके भोजशाला को ध्वस्त किया। भारतीय ज्ञान परंपरा की अंतिम लौ भी बुझ गई। प्रवाहित होती हुई भारत की वैभवशाली ज्ञान परंपरा रुक गई। ठिठक गई।
अर्थ स्पष्ट हैं। भारत की ज्ञान परंपरा जहां पर रुकी थी, उसे वहीं से, उसी वैभव के साथ प्रवाहित करने की आवश्यकता हैं। जिस ज्ञान के आधार पर भारत विश्व में सबसे वैभवशाली, सबसे समृद्ध राष्ट्र बना था, उस ज्ञान परंपरा के पुनः संवाहक बनने की हमसे अपेक्षा हैं। भोजशाला को उसके प्राचीन भव्य स्वरूप में पुनः प्रस्थापित करने की आवश्यकता हैं।
यदि ऐसा होता हैं, तो ज्ञान परंपरा का यह प्रवाह पुनः अविरल प्रवाहित होने लगेगा..!
