जब इतिहास लौटा : गुमनामी से गौरव तक गोपाल पाठा

कोलकाता में सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड किए जाने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि राष्ट्र की ऐतिहासिक स्मृति और आत्मसम्मान के पुनर्जागरण का प्रतीक है।

समसामयिक: लेखक – श्री राजेश कुमरावत ‘सार्थक’

स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग आठ दशक बाद भी भारत का इतिहास अनेक अनाम नायकों की प्रतीक्षा कर रहा है। वे नायक, जिन्होंने संकट की घड़ी में समाज की रक्षा की, राष्ट्र की अस्मिता के लिए संघर्ष किया और असंख्य लोगों के जीवन की सुरक्षा हेतु स्वयं को समर्पित कर दिया, किंतु इतिहास के औपचारिक पन्नों में उन्हें वह स्थान नहीं मिला जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे।

आज जब देश अपनी सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक विरासत और राष्ट्रीय आत्मबोध को पुनः प्रतिष्ठित करने के प्रयास में जुटा है, तब ऐसे गुमनाम रक्षकों को स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व भी है। पश्चिम बंगाल में सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी रोड करने का निर्णय इसी राष्ट्रीय पुनर्जागरण की एक महत्वपूर्ण कड़ी प्रतीत होता है।

16 अगस्त 1946 : जब कलकत्ता रक्तरंजित हो उठा

16 अगस्त 1946 भारतीय इतिहास का वह काला अध्याय है, जिसे “ग्रेट कलकत्ता किलिंग” के नाम से जाना जाता है। मुस्लिम लीग द्वारा घोषित “डायरेक्ट एक्शन डे” ने तत्कालीन कलकत्ता को हिंसा की आग में झोंक दिया। उस समय अविभाजित बंगाल के मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी थे।

ब्रिटिश इतिहासकारों और विभाजन पर लिखने वाले अनेक शोधकर्ताओं के अनुसार इस हिंसा में हजारों लोग मारे गए तथा हजारों घायल हुए। घर जलाए गए, महिलाओं पर अत्याचार हुए और पूरा शहर भय तथा अराजकता की गिरफ्त में आ गया। इतिहास में यह घटना भारत विभाजन की सबसे भयावह घटनाओं में से एक मानी जाती है।

संकट की घड़ी में समाज की ढाल बने गोपाल पाठा

ऐसे विकट समय में कोलकाता के एक साधारण मांस व्यापारी परिवार से आने वाले गोपाल मुखर्जी, जिन्हें जनसामान्य “गोपाल पाठा” के नाम से जानता है, पीड़ित समाज के लिए सुरक्षा कवच बनकर सामने आए।

विभाजन की त्रासदी के बीच उन्होंने असहाय परिवारों की रक्षा, महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाने तथा समाज में आत्मविश्वास जागृत करने का कार्य किया। बंगाल के अनेक लोग आज भी उन्हें उस दौर में हिंदू समाज की रक्षा करने वाले साहसी व्यक्तित्व के रूप में स्मरण करते हैं।

गोपाल पाठा का जीवन इस तथ्य का प्रमाण है कि इतिहास केवल राजनेताओं और शासकों से नहीं बनता; अनेक बार सामान्य नागरिक ही असाधारण साहस का परिचय देकर समाज की नियति बदल देते हैं।

कौन थे हुसैन सुहरावर्दी?

हुसैन शहीद सुहरावर्दी अविभाजित बंगाल के अंतिम मुख्यमंत्री थे और बाद में पाकिस्तान के पाँचवें प्रधानमंत्री भी बने। उनकी राजनीतिक भूमिका को लेकर इतिहासकारों के बीच भिन्न मत रहे हैं, किंतु ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ और उसके बाद हुई व्यापक हिंसा के कारण उनका नाम सदैव विवादों में रहा है।

स्वतंत्र भारत में लंबे समय तक अनेक सार्वजनिक स्थलों, सड़कों और संस्थानों के नाम ऐसे व्यक्तियों के नाम पर बने रहे, जिनकी भूमिका को लेकर समाज में व्यापक विमर्श होता रहा है। आज इन्हीं नामों और प्रतीकों के पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया प्रारंभ हुई है।

ऐतिहासिक न्याय की दिशा में एक कदम

हाल ही में कोलकाता नगर निगम ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए पार्क सर्कस क्षेत्र की प्रमुख सड़क ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ का नाम बदलकर ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ करने का निर्णय लिया है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे “ऐतिहासिक न्याय” की संज्ञा दी।

उन्होंने कहा कि गोपाल मुखर्जी ऐसे निर्भीक व्यक्तित्व थे, जिन्होंने विभाजनकालीन हिंसा के दौरान हजारों निर्दोष लोगों की रक्षा की थी। उनके अनुसार, अब ऐसे सच्चे रक्षकों को सम्मान देकर ऐतिहासिक न्याय बहाल किया जा रहा है।

वस्तुतः यह निर्णय केवल एक सड़क के नाम परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है, जो लंबे समय से उपेक्षित और विस्मृत नायकों को पुनः समाज के केंद्र में स्थापित करने का प्रयास कर रही है।

स्मृति में कौन और क्यों?

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जिन व्यक्तियों की राजनीतिक भूमिका विभाजनकारी विचारों, सांप्रदायिक तनावों अथवा अलगाववादी राजनीति से जुड़ी रही, क्या स्वतंत्र भारत के सार्वजनिक जीवन में उनके नामों का पुनर्मूल्यांकन नहीं होना चाहिए?

लोकतंत्र में इस विषय पर मतभेद संभव हैं, किंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि राष्ट्र अपने उन रक्षकों को सम्मान दे, जिन्होंने संकट की घड़ी में समाज और संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष किया।

सार्वजनिक स्मृतियों, संस्थानों और सड़कों के नाम केवल पहचान भर नहीं होते; वे आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास के जीवंत पाठ भी होते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि राष्ट्र अपने वास्तविक नायकों को पहचाने और उन्हें उचित सम्मान प्रदान करे।

केवल सड़क का नाम नहीं, ऐतिहासिक चेतना का प्रश्न

भारत का इतिहास ऐसे असंख्य व्यक्तित्वों से भरा पड़ा है, जिन्होंने बिना किसी पद, प्रतिष्ठा अथवा राजनीतिक शक्ति के राष्ट्र और समाज की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। दुर्भाग्यवश, स्वतंत्रता के बाद के दशकों में ऐसे अनेक नाम राष्ट्रीय विमर्श से लगभग लुप्त हो गए।

आज जब राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौट रहा है, तब इन विस्मृत विभूतियों को पुनः समाज के समक्ष लाना समय की आवश्यकता है। यह किसी के प्रति द्वेष का नहीं, बल्कि अपने वास्तविक इतिहास, अपने संघर्षों और अपने रक्षकों को सम्मान देने का प्रयास है।

राष्ट्र की आत्मा उसकी स्मृतियों में बसती है

किसी भी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं होती, बल्कि उसकी स्मृतियों, महापुरुषों और सार्वजनिक प्रतीकों से निर्मित होती है। जो समाज अपने रक्षकों और त्यागियों को भुला देता है, वह धीरे-धीरे अपनी ऐतिहासिक चेतना भी खो देता है।

गोपाल पाठा जैसे व्यक्तित्व हमें स्मरण कराते हैं कि राष्ट्र की रक्षा केवल सीमाओं पर ही नहीं होती; अनेक बार समाज के भीतर भी ऐसे संकट आते हैं, जब सामान्य नागरिक असाधारण साहस का परिचय देकर इतिहास की दिशा बदल देते हैं।

इतिहास का न्याय

राष्ट्र तभी सशक्त बनता है, जब वह अपने इतिहास को स्वयं लिखता है, अपने नायकों को स्वयं पहचानता है और अपनी स्मृतियों का संरक्षण स्वयं करता है।

गोपाल पाठा जैसे गुमनाम रक्षकों का सम्मान केवल अतीत का पुनर्स्मरण नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह बताने का संकल्प है कि इस राष्ट्र की रक्षा के लिए असंख्य अनाम लोगों ने अपना सर्वस्व अर्पित किया है।

यदि भारत अपने ऐसे भूले-बिसरे नायकों को पुनः राष्ट्रीय स्मृति में स्थापित कर रहा है, तो यह केवल इतिहास का पुनर्लेखन नहीं, बल्कि राष्ट्र के आत्मसम्मान का पुनर्जागरण है।

इतिहास का न्याय भले ही देर से हो, किंतु जब होता है तो पीढ़ियाँ उसे स्मरण रखती हैं। प्रश्न केवल एक सड़क के नाम का नहीं, बल्कि राष्ट्र की स्मृति, आत्मसम्मान और ऐतिहासिक चेतना के पुनर्जागरण का है।

लेखक : वरिष्ठ पत्रकार, समसामयिक विश्लेषक एवं राष्ट्र, इतिहास और सामाजिक विषयों के स्वतंत्र अध्येता हैं।


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