
लेखक : डॉ. बी आर परमार
स्वतंत्रता के इन 79 वर्षों में भारत की तीन पीढ़ियों ने कई उतार चढ़ाव देखने और भोगनें के बाद अब उन्हें लगने लगा है कि आज भारत विकास की नई ऊँचाइयों को छू रहा है। अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल अर्थव्यवस्था , स्वास्थ्य से लेकर बुनियादी ढाँचे तक देश निरंतर आगे बढ़ रहा है। इन सुनहरे पलों को लाने में सभी राजनीतिक पार्टियों, सामाजिक – सांस्कृतिक संगठनों, विचारकों और मेहनतकश जनता का अतुलनीय योगदान रहा है। केन्द्र व राज्य सरकारों और उनके मातहतों ने अपने अंदाज में राष्ट्र को प्रगति पथ पर आगे बढ़ाया है।
पर जैसे जैसे देश विकास पथ पर आगे बढ़ता रहा , वैसे वैसे इसी प्रगति के समानांतर हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन में जाने-अनजाने में वैमनस्य की ऐसी दरारें गहरी होती जा रही है जिससे हमारी सारी उपलब्धियों पर पानी फिर रहा है। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और विचार के नाम पर वर्षों से एक गांव – मोहल्ले में साथ रह रहे लोग एक-दूसरे से कट रहे हैं। इसका सबसे पहला और गहरा प्रभाव राजनीति में देखने को मिल रहा है। चुनाव में हार जीत के बाद इसका परिणाम समाज में कटुता के रूप में सामने आ रहा है।
प्रजातांत्रिक देशों का इतिहास गवाह है कि जब राजनीति और राजनीतिज्ञों का स्तर गिरता है तो इसका असर सामाजिक सोच पर पड़ता है और समाज में वैमनस्यता बढ़ती है और समाज में व्याप्त भाईचारा टूटता है। जैसा कि विभाजन के बाद भारत के साथ ही पाकिस्तान और बंग्लादेश में देखने को मिल रहा है। इन तीनों देश में लोकतंत्र का निर्मल नभ धूमिल हो रहा है।
भारत में कुछ दशकों से सत्ता प्राप्ति के लिए जो उठा पटक हो रही है और हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, जिसके कारण सामाजिक जीवन में वैमनस्य आम आदमी के दैनिक जीवन का सामान्य हिस्सा बन गया है। वर्तमान राजनीतक जोड़ तोड़ परिदृश्य भी यही दर्शाता है कि सभी 6 राष्ट्रीय और 60 क्षेत्रीय दल मतदाता में वैमनस्यता बढ़ाने और समाज को तोडने के दोषी है।
सभी राजनीतिक दलों ने आजादी के समय से लेकर आज तक इस घिनौनापन का खेल खेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है । शुरूआती दशकों में पाला बदलने के घिनौनेपन की आवृत्ति कभी-कभार होती थीं । आजकल यह सुबह अखबार की सुर्खियों से लेकर रात के अंतिम सोशल मीडिया स्क्रॉल तक देखने , सुनने और पढ़ने को मिलता है। एक ही देश, एक ही संविधान, एक ही तिरंगे के नीचे रहने वाले राजनीतिक लोग अब एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी नहीं, दुश्मन मानने लगे हैं।
मोहल्ले में पड़ोसी पड़ोसी से दूरी बना रहा है। विद्यालय में बच्चे मित्रता से पहले पूछते हैं कि आप किस पृष्ठभूमि से आते हैं। कार्यस्थल पर सहयोग की जगह संदेह ने ले ली है। यह स्थिति कोई एक दिन या वर्ष अथवा दशक में पैदा नहीं हुईं , भारतीय समाज में इस तरह की स्थिति पैदा करने के लिए लंबे समय से देसी और विदेशी सोची समझी रणनीति का सहारा लिया जाता रहा है।
चुनाव दर चुनाव स्वार्थ परख राजनीतिक दलों और उनके आकाओं द्वारा इसे लगातार हवा दी जा रही है और इसका परिणाम हम सब भुगत रहे हैं।
राजनीति लोकतंत्र की आत्मा है। उसका मूल कार्य संवाद से समाधान निकालना, नीति से जनकल्याण करना और प्रतिस्पर्धा से बेहतर शासन देना है। पर आज राजनीति का स्वरूप बदल गया है। चुनावी मंच पर घोषणापत्र की जगह आरोपपत्र ने ले ली है। संसद और विधानसभाओं में बहस की जगह नारेबाजी ने ले ली है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच वैचारिक मतभेद का स्थान व्यक्तिगत शत्रुता ने ले लिया है। नेता जब सार्वजनिक मंच से मर्यादा तोड़ते हैं, तो कार्यकर्ता सड़क पर उसी भाषा को अपनाते हैं। जब राजनीतिक दल नागरिकों को मतदाता नहीं, वोट बैंक में बाँटते हैं, तो समाज भी स्वयं को खेमों में बाँट लेता है।
राजनीति के इस पतन के लक्षण बहुत स्पष्ट हैं। सबसे पहला लक्षण भाषा का पतन है। सार्वजनिक जीवन से शालीनता, शिष्टाचार और तर्क लगभग गायब हो गए हैं। उनकी जगह गाली, व्यंग्य और अपमान ने ले ली है। विपक्षी नेता द्वारा ‘ये मोदी’ कहना कौनसा शिष्टाचार है? टेलीविजन की बहस से लेकर सोशल मीडिया की टिप्पणी तक, शब्द अब विचार का माध्यम नहीं, हथियार बन गए हैं। जब सार्वजनिक जीवन की भाषा ही अपमानजनक हो जाए तो नागरिक भी उसी भाषा को सामान्य मानने लगता है।
दूसरा लक्षण मुद्दों का पतन है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, पर्यावरण, विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे विषय जो राष्ट्र का भविष्य तय करते हैं, वे सार्वजनिक बहस से बाहर हो गए हैं। उनकी जगह पहचान के मुद्दे आ गए हैं। कौन किस जाति का है, कौन किस धर्म का है, कौन किस क्षेत्र से आया है, यही अब चुनाव का मुख्य मुद्दा बन गया है। नीति पीछे छूट गई है और व्यक्तिगत निष्ठा आगे आ गई है। तीसरा लक्षण संस्थाओं के प्रति अविश्वास है। जब चुनाव आयोग, न्यायपालिका, पुलिस, मीडिया और शैक्षणिक संस्थाओं को भी बार-बार पक्ष और विपक्ष के खेमे में बाँटा जाता है, तो नागरिक का उन पर से भरोसा उठ जाता है। जिस दिन नागरिक का संस्थाओं से भरोसा उठ जाता है, उस दिन लोकतंत्र केवल संविधान की पुस्तक में रह जाता है, व्यवहार में नहीं रहता।
राजनीति का यह पतन सीधे समाज में कटुता बनकर उतरता है। समाज और राजनीति एक-दूसरे के प्रतिबिंब हैं। जब राजनीति कटु हो जाती है तो समाज में आपसी रिश्ते भी कटु हो जाते हैं। कटुता का सबसे पहला शिकार संवाद है। लोकतंत्र संवाद पर जीवित है। जब नागरिक एक-दूसरे से बात करना बंद कर दें, जब असहमति का उत्तर बहिष्कार हो जाए, जब पड़ोसी पड़ोसी से त्योहार पर मिलना बंद कर दे, तो समाज भीतर से खोखला हो जाता है।
आज राजनीतिक पतन के कारण अनेक मोहल्लों और गाँवों में यही दृश्य देखने को मिल रहा है। पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हत्याएं हो रही है। ऐसे ही नजारे अन्य राज्यों में भी चुनाव के बाद देखने को मिलते हैं। एक ही गली में दो परिवार दशकों से रहते आए हैं, पर अब वे एक-दूसरे के घर नहीं आते जाते। क्योंकि दोनों अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा के हैं। एक विचारधारा वाली पार्टी जीत गई और दूसरी विचारधारा वाली पार्टी हार गई। इसी राजनीतिक जीत और हार के फलस्वरूप रिश्तेदारों में दूरियाँ बढ़ रही हैं। मित्रता भी अब विचारों की समानता पर नहीं, पहचान की समानता पर टिक रही है।
सामाजिक कटुता का दूसरा शिकार युवा पीढ़ी है। जो युवा आज विद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रवेश कर रहा है, वह एक ऐसे वातावरण में पल रहा है जहाँ आक्रोश को साहस माना जाता है, चिल्लाने को तर्क माना जाता है, और दूसरे को नीचा दिखाने को जीत माना जाता है। वह राजनीति को सेवा नहीं, स्वार्थ का पर्याय मान रहा है। वह सार्वजनिक जीवन को अवसर नहीं, युद्धक्षेत्र मान रहा है। एक पीढ़ी यदि कटुता में पलेगी तो उससे राष्ट्र-निर्माण की आशा कैसे की जा सकती है।
राष्ट्र का निर्माण ईंट और सीमेंट से नहीं, चरित्र और दृष्टि से होता है। और चरित्र का निर्माण तभी होता है जब समाज संस्कार देता है। जब समाज स्वयं कटु हो जाए तो वह अगली पीढ़ी को क्या संस्कार देगा।
कटुता का तीसरा शिकार विकास है। कोई भी निवेशक, कोई भी उद्यमी, कोई भी वैज्ञानिक ऐसे वातावरण में अपना समय, धन और प्रतिभा नहीं लगाता जहाँ प्रतिदिन तनाव, अशांति और असुरक्षा हो। वैमनस्य की आग में विकास की फसल जल जाती है। सड़क, पुल, अस्पताल, कारखाने तब बनते हैं जब राजनेताओं की ऊर्जा निर्माण में लगती है। जब वही ऊर्जा भ्रष्टाचार, पदलोलुपता, दुसरे की छाती पर पैर रखकर आगे बढ़ने की तीव्र लालसा और विध्वंस में लगती है तो विकास के मुद्दे पीछे चले जाते हैं। नार्थ ईस्ट के राज्य इसका उदाहरण है ।आर्थिक, सामाजिक और बुनियादी विकास के विभिन्न पैमानें जैसे कि प्रति व्यक्ति आय और गरीबी दर के अनुसार वर्तमान में बिहार भारत का सबसे पिछड़ा राज्य है। इसका प्रमुख कारण निम्न स्तर की राजनीति ही है।
इस वैमनस्य के मूल में कई कारण काम कर रहे हैं। पहला कारण है तात्कालिक लाभ की राजनीति। जब किसी दल को लगता है कि समाज को बाँट कर वोट अधिक मिलेंगे तो वह जाति, धर्म, संप्रदाय में बाँटने का मार्ग चुनता है। अल्पकालिक चुनावी लाभ के लिए दीर्घकालिक सामाजिक हानि को नजरअंदाज कर दिया जाता है। दूसरा कारण है डिजिटल माध्यमों का दुरुपयोग। सोशल मीडिया ने संवाद को तीव्र किया है, पर साथ ही झूठ, अफवाह और घृणा को भी तीव्र कर दिया है।
एक झूठा संदेश मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाता है और वर्षों में बनी सामाजिक समरसता को क्षणों में नष्ट कर देता है। एल्गोरिद्म भी उसी को बढ़ावा देते हैं जो उत्तेजना पैदा करे, जो क्रोध जगाए, जो जाति और धर्म के आधार पर बाँटे। तीसरा कारण है ऐतिहासिक घावों का राजनीतिक उपयोग। अतीत की पीड़ा को याद रखना आवश्यक है, पर उसे वर्तमान का हथियार बनाना खतरनाक है। जब अतीत को वर्तमान पर थोपा जाता है तो भविष्य अंधकारमय हो जाता है। चौथा कारण है शिक्षा में मूल्यों की कमी। जब शिक्षा केवल अंक और डिग्री देती है, पर सहिष्णुता, समानता और नागरिक कर्तव्य बोध नहीं सीखाती, तब शिक्षित व्यक्ति भी असहिष्णु और उदण्ड हो जाता है।
इस संकट से बाहर निकलने का मार्ग सरल नहीं है, पर असंभव भी नहीं है। इसका उत्तर केवल कानून नहीं दे सकता, केवल पुलिस नहीं दे सकती, केवल भाषण नहीं दे सकते। इसका उत्तर देना होगा राजनीति को, समाज को और प्रत्येक नागरिक को।
राजनीति को आत्मशुद्धि करनी होगी। राजनीतिक दलों को यह तय करना होगा कि सत्ता का संघर्ष विचारों का होगा, व्यक्तियों का नहीं। दल के भीतर एक आचार संहिता होनी चाहिए। जो सार्वजनिक मंच से घृणा फैलाए, जो जाति, धर्म, भाषा के नाम पर समाज को बाँटे, उसके विरुद्ध दल स्वयं अनुशासनात्मक कार्रवाई करे। चुनाव का घोषणापत्र पाँच वर्षों का लेखा-जोखा हो, पाँच मिनट का नारा नहीं। विपक्ष का दायित्व सरकार की आलोचना करना है, पर सरकार को अस्थिर करना नहीं। सत्ता का दायित्व शासन करना है, पर प्रतिशोध लेना नहीं। जब राजनीति फिर से सेवा का मार्ग चुनेगी, तभी नागरिक का विश्वास लौटेगा। संसद में बहस का स्तर ऊँचा होगा, तभी सड़क पर संवाद का स्तर ऊँचा होगा।
समाज को संवाद की संस्कृति पुनर्जीवित करनी होगी। मोहल्ले, विद्यालय, विश्वविद्यालय, कार्यस्थल और ग्राम सभा में ऐसे मंच बनने चाहिए जहाँ असहमति रखी जा सके, पर अपमान न हो। जहाँ तर्क हो, पर तिरस्कार न हो। जहाँ हम एक-दूसरे को सुनें, समझें और यदि सहमत न हों तो भी सम्मान करें। भारत की शक्ति उसकी विविधता में है। पर विविधता तभी शक्ति है जब वह एकता से बंधी हो। एकता का अर्थ एकरूपता नहीं है। एकता का अर्थ है भिन्न होते हुए भी साथ चलना। हमें अपनी साझा स्मृतियों को फिर से जीवित करना होगा। एक गाँव में सदियों से एक तालाब, एक बाजार, एक श्मशान साझा करने वाले लोग आज अलग-अलग क्यों हो रहे हैं। इस प्रश्न का उत्तर हमें स्वयं देना होगा।
नागरिक को अपना दायित्व समझना होगा। लोकतंत्र केवल मतपेटी तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र प्रतिदिन के व्यवहार में है। हम सोशल मीडिया पर क्या लिखते हैं, बाजार में कैसे व्यवहार करते हैं, पड़ोसी के सुख-दुख में कैसे भाग लेते हैं, यही तय करता है कि हमारा लोकतंत्र जीवित है या मृत। प्रत्येक नागरिक को यह संकल्प लेना होगा कि वह एक भी शब्द ऐसा नहीं बोलेगा या लिखेगा जिससे किसी अन्य नागरिक की गरिमा भंग हो। हम अपने बच्चों को पहले अच्छा मनुष्य बनाएंगे, फिर अच्छा डॉक्टर, इंजीनियर या अधिकारी। क्योंकि बिना मनुष्यता के कोई भी पद व्यर्थ है। असहमति हमारा अधिकार है, पर अपमान हमारा धर्म नहीं हो सकता।
कानून की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। घृणा फैलाने, हिंसा भड़काने, समुदायों के बीच द्वेष उत्पन्न करने के लिए भारतीय दंड संहिता और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में पर्याप्त प्रावधान हैं। आवश्यकता है इनके कठोर और निष्पक्ष क्रियान्वयन की। जांच समयबद्ध हो, न्याय त्वरित हो और दंड सबके लिए समान हो। जब कानून का भय सब पर समान रूप से होगा, तभी वैमनस्य फैलाने वाले तत्व नियंत्रित होंगे। पर कानून अंतिम उपाय नहीं है। कानून भय पैदा कर सकता है, पर प्रेम पैदा नहीं कर सकता। वह काम समाज को करना है।
भारत ने विश्व को सदैव यह संदेश दिया है कि भिन्नता में एकता संभव है। हमारी सभ्यता का मूल मंत्र सहिष्णुता है। हमने अनेक आक्रमण, अनेक परिवर्तन, अनेक चुनौतियाँ देखी हैं, पर अपनी मूल आत्मा को बचाए रखा है। आज फिर वही परीक्षा है। आज प्रश्न यह नहीं है कि हम कितने अमीर हैं, कितने शक्तिशाली हैं। प्रश्न यह है कि हम कितने एक हैं। कितने नेक हैं। आर्थिक प्रगति के साथ यदि सामाजिक विघटन बढ़ रहा है तो वह प्रगति अधूरी है।
वैमनस्य का अंधकार तभी मिटेगा जब हम दीप जलाएंगे। वह दीप संवाद का होगा, समझ का होगा, सहिष्णुता का होगा। राजनीति को फिर से सेवा का मार्ग चुनना होगा।
जिस दिन भारत में मौजूद सभी राजनीतिक दल एक-दूसरे को शत्रु मानना बंद कर देंगे, उसी दिन राजनीति का पतन रुकेगा और समाज में फैल रही कटुता मिटेगी। यही 21 वीं सदी के भारत भारती की माँग है और यही प्रत्येक राजनीतिक दल का सामूहिक दायित्व भी।