
राष्ट्रभक्ति, समाज शक्ति और संघ की शताब्दी साधना पर एक राष्ट्रीय चिंतन
- रोटियों से राष्ट्र तक : संघ की शताब्दी यात्रा का समाजशास्त्र (विश्लेषणात्मक और शोधपरक)
समसामयिक विश्लेषण
लेखक – राजेश कुमरावत ‘सार्थक’
भारत को यदि केवल मानचित्र पर अंकित एक राष्ट्र-राज्य मान लिया जाए, तो भारत को कभी नहीं समझा जा सकता। भारत का अस्तित्व केवल उसकी सीमाओं में नहीं, उसकी आत्मा में है। वह आत्मा जो वेदों के मंत्रों में गूंजती है, संतों की वाणी में प्रवाहित होती है, गांव की चौपाल में जीवित रहती है, तीर्थों की परंपरा में दिखाई देती है और संकट के समय समाज की सामूहिक चेतना के रूप में खड़ी हो जाती है।
भारत का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं है। यह समाज की जीवटता, संस्कृति की निरंतरता और राष्ट्रभाव की अविरल धारा का इतिहास है। विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताएं इतिहास के पन्नों में सिमट गईं, किंतु भारत आज भी जीवित है, क्योंकि यहां समाज सत्ता से बड़ा रहा है, संस्कृति राजनीति से बड़ी रही है और राष्ट्र की अवधारणा सरकारों से कहीं व्यापक रही है।
इसी भारत को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी है। संघ को केवल एक संगठन मानकर उसका मूल्यांकन करना वैसा ही है जैसे गंगा को केवल जलधारा मान लेना। संघ को समझना है तो भारत की आत्मा, उसकी सभ्यता, उसकी सामाजिक संरचना और उसके सांस्कृतिक जीवन को समझना होगा।
वर्ष 1925 में जब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की, तब भारत राजनीतिक पराधीनता से जूझ रहा था। विदेशी शासन ने केवल देश पर अधिकार नहीं किया था, बल्कि समाज के आत्मविश्वास को भी आघात पहुंचाया था। जातीय विभाजन, सामाजिक दुर्बलता, संगठनहीनता और राष्ट्रीय चेतना का क्षरण उस समय की बड़ी चुनौतियां थीं।
डॉ. हेडगेवार ने अनुभव किया कि स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं आएगी। राष्ट्र को ऐसे व्यक्तित्वों की आवश्यकता होगी जिनमें चरित्र, अनुशासन, समर्पण और राष्ट्रनिष्ठा का भाव हो। इसी विचार से संघ का जन्म हुआ।
संघ की शाखा का स्वरूप देखने में साधारण प्रतीत हो सकता है, लेकिन उसके पीछे एक गहरी राष्ट्रदृष्टि कार्य करती है। खेल, प्रार्थना, बौद्धिक चर्चा, अनुशासन और सामूहिकता के माध्यम से व्यक्ति में राष्ट्र प्रथम का भाव विकसित किया जाता है। संघ का मूल विश्वास है कि यदि व्यक्ति जागृत होगा तो समाज संगठित होगा और यदि समाज संगठित होगा तो राष्ट्र स्वतः सशक्त होगा।
पिछले लगभग एक शताब्दी में संघ ने इसी व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया को अपनी साधना बनाया है। यही कारण है कि संघ स्वयं को केवल संगठन नहीं मानता; वह राष्ट्र निर्माण की सतत प्रक्रिया है।
संघ की विशेषता यह भी है कि उसका आधार सत्ता, संपत्ति या संसाधन नहीं है। उसकी शक्ति समाज के विश्वास में निहित है। देशभर में आयोजित होने वाले शिक्षा वर्ग, प्रशिक्षण शिविर, सेवा कार्य, उत्सव और विविध कार्यक्रम इसी विश्वास के जीवंत उदाहरण हैं।
जब हजारों घरों से रोटियां बनकर शिक्षा वर्गों तक पहुंचती हैं, तब वे केवल भोजन नहीं होतीं। वे मातृशक्ति के स्नेह, समाज की आत्मीयता और राष्ट्रभाव की अभिव्यक्ति होती हैं। किसी सरकारी आदेश से यह संभव नहीं होता। यह केवल सामाजिक विश्वास से संभव होता है।
भारतीय संस्कृति में अन्न को ब्रह्म कहा गया है। अतिथि को देवता माना गया है। सेवा को धर्म माना गया है। यही कारण है कि जब कोई माता राष्ट्रकार्य में लगे स्वयंसेवकों के लिए रोटी बनाती है, तो वह केवल भोजन नहीं देती, बल्कि अपने संस्कार और आशीर्वाद भी समर्पित करती है।
संघ के कार्यक्रमों की एक और विशेषता है—सामाजिक समरसता। शाखा में न जाति पूछी जाती है, न भाषा, न क्षेत्र और न आर्थिक स्थिति। वहां केवल एक पहचान होती है—हम सब भारत माता की संतान हैं। सामाजिक समरसता का जो संदेश अनेक मंचों पर भाषणों के माध्यम से दिया जाता है, संघ उसे व्यवहार में उतारने का प्रयास करता है।
आज जब समाज अनेक प्रकार की विभाजनकारी प्रवृत्तियों का सामना कर रहा है, तब यह समरसता और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
संघ की शताब्दी यात्रा केवल शाखाओं के विस्तार की कहानी नहीं है। यह सेवा, समर्पण और सामाजिक जागरण की भी यात्रा है। विभाजन की पीड़ा हो, युद्धकालीन परिस्थितियां हों, बाढ़, भूकंप, चक्रवात, महामारी या अन्य राष्ट्रीय आपदाएं—हर अवसर पर संघ के स्वयंसेवक सेवा कार्यों में अग्रिम पंक्ति में दिखाई दिए हैं।
सेवा संघ के लिए कार्यक्रम नहीं, संस्कार है।
इस सेवा का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसमें प्रचार की अपेक्षा नहीं होती। अनेक बार समाज को यह भी ज्ञात नहीं होता कि सेवा करने वाला व्यक्ति संघ का स्वयंसेवक है। उसके लिए सेवा स्वयं में साधना है।
संघ का एक महत्वपूर्ण आयाम सनातन संस्कृति के मानबिंदुओं की रक्षा और संवर्धन भी है। भारत की सांस्कृतिक चेतना केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। इसमें परिवार व्यवस्था, सामाजिक उत्तरदायित्व, प्रकृति के प्रति सम्मान, राष्ट्र के प्रति श्रद्धा और जीवन को व्यापक दृष्टि से देखने का भाव शामिल है।
संघ ने अपने विविध आयामों के माध्यम से इन मूल्यों को समाज जीवन में सशक्त करने का प्रयास किया है। शिक्षा, ग्राम विकास, सेवा बस्तियां, वनवासी क्षेत्र, पर्यावरण, सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन और सांस्कृतिक जागरण जैसे अनेक क्षेत्रों में कार्य इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा हैं।
आज संघ के संबंध में पंजीकरण या वैधानिक स्वरूप को लेकर प्रश्न उठाए जाते हैं। लोकतंत्र में प्रश्न पूछना स्वाभाविक है। किंतु संघ को समझने के लिए केवल प्रशासनिक दृष्टि पर्याप्त नहीं है।
भारत की सभ्यता का मूल स्वभाव समाज आधारित रहा है। यहां परिवार राज्य से पहले था। ग्राम राज्य से पहले था। तीर्थ, आश्रम, मठ और सामाजिक संस्थाएं राज्य से पहले थीं। पश्चिमी चिंतन में राज्य समाज का निर्माता माना जाता है, किंतु भारतीय दृष्टि में समाज राज्य का निर्माता होता है।
यही कारण है कि भारत की अनेक महान परंपराएं किसी सरकारी पंजीकरण से उत्पन्न नहीं हुईं। कुंभ की परंपरा, संत परंपरा, अखाड़ा परंपरा और सनातन धर्म की अनेक धाराएं समाज की स्वीकृति और विश्वास से विकसित हुई हैं।
संघ भी इसी समाज शक्ति का आधुनिक स्वरूप है।
उसकी वास्तविक पहचान किसी कागजी दस्तावेज में नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों के विश्वास में है जो उसे राष्ट्र निर्माण के एक माध्यम के रूप में देखते हैं।
संघ की लगभग शताब्दी यात्रा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि राष्ट्र निर्माण केवल कानूनों, योजनाओं और नीतियों से नहीं होता। राष्ट्र निर्माण के लिए जागृत समाज, संगठित शक्ति और चरित्रवान नागरिकों की आवश्यकता होती है।
आज जब भारत अमृतकाल की यात्रा पर अग्रसर है, तब यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि राष्ट्र की शक्ति का वास्तविक स्रोत क्या है?
उत्तर स्पष्ट है—राष्ट्र की शक्ति उसके समाज में है।
वही समाज जो संकट में खड़ा होता है। वही समाज जो सेवा करता है। वही समाज जो अपने संसाधन, अपना समय और अपनी ऊर्जा राष्ट्रकार्य के लिए समर्पित करता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी समाज शक्ति का संगठित और अनुशासित स्वरूप है।
संघ को समझना है तो उसकी शाखाओं की संख्या नहीं, उसके पीछे खड़ी सामाजिक चेतना को समझना होगा। उसकी व्यवस्था नहीं, उसकी साधना को समझना होगा। उसके कार्यक्रम नहीं, उसके संस्कारों को समझना होगा। और जब ऐसा होगा, तब यह स्पष्ट दिखाई देगा कि संघ का वास्तविक पंजीकरण किसी कार्यालय की फाइल में नहीं, बल्कि भारत की आत्मा में है। लेखक: वरिष्ठ पत्रकार | राष्ट्रीय चिंतक | समसामयिक विश्लेषक
वन्दे मातरम्।