आधुनिकता के चक्रव्यूह में फंसी गृहलक्ष्मी स्त्री गरिमा और भारतीय पारिवारिक मूल्यों का पुनरुत्थान

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता


हमारी सनातन संस्कृति का यह उद्घोष सदियों से भारत भूमि की पहचान रहा है। भारतीय मनीषा ने स्त्री को कभी केवल ‘व्यक्ति’ नहीं माना, बल्कि उसे ‘शक्ति’, ‘गृहलक्ष्मी’ और ‘परिवार की धुरी’ का सर्वोच्च स्थान दिया है। समाज और राष्ट्र की नींव एक स्वस्थ परिवार पर टिकी होती है, और उस परिवार को संस्कार, स्वास्थ्य और स्नेह से सींचने का दायित्व प्रकृति ने स्त्री को सौंपा है। परंतु, आज के तथाकथित आधुनिक और प्रतिस्पर्धी युग में, पश्चिमी ‘नारीवाद’ (Feminism) के छद्म जाल ने भारतीय समाज के इस सुंदर ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करना शुरू कर दिया है।

नारीवाद का छद्म जाल और “माय बॉडी, माय रूल” का संकट पश्चिमी नारीवाद का मूल दर्शन ‘अधिकारों की लड़ाई’ और ‘पुरुष से अंतहीन प्रतिस्पर्धा’ पर आधारित है। इस विचारधारा ने भारतीय नारियों को यह पट्टी पढ़ाई कि घर संभालना, बच्चों को उत्तम संस्कार देना और परिवार को एकजुट रखना एक प्रकार की ‘गुलामी’ या ‘पिछड़ापन’ है।


इस छद्म आंदोलन का सबसे विकृत स्वरूप वर्तमान में “माय बॉडी, माय चॉइस” के नारे और युवाओं में बढ़ते “बॉडी काउंट” (यौन साथियों की संख्या) की अंधी दौड़ के रूप में सामने आया है। युवतियों को यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि जितने अधिक पुरुषों के साथ शारीरिक संबंध होंगे, वे उतनी ही ‘स्वतंत्र’ और ‘आधुनिक’ कहलाएंगी। दैहिक (शारीरिक) सुख को ही जीवन का सर्वोच्च आनंद मान लेना आज की पीढ़ी की सबसे बड़ी भूल साबित हो रही है।


जिस स्त्री को अपने घर की ‘महारानी’ और ‘गृहस्वामिनी’ होना चाहिए था, वह आधुनिकता के भ्रम में किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में महज एक ‘कर्मचारी (नौकर)’ बनने या केवल दैहिक सुख की दौड़ में शामिल होने को ही अपने जीवन की सर्वोच्च सफलता मानने लगी है। यह आत्म-गौरव का विकास नहीं, बल्कि वैचारिक और शारीरिक दासता है।

इस आधुनिक भ्रम को समझने के लिए पंचतंत्र की एक प्रसिद्ध कथा अत्यंत प्रासंगिक है।


एक बार एक सुंदर हिरणी हरी-भरी वादियों और अपने झुंड की सुरक्षा को छोड़कर एक घने, अपरिचित जंगल की ओर निकल पड़ी। उसे किसी ने बहकाया था कि झुंड के नियम और परिवार की सीमाएं उसकी ‘स्वतंत्रता’ की बेड़ियाँ हैं। वह अकेली उस जंगल में स्वच्छंद दौड़ने लगी और इसे ही अपनी असली आज़ादी मान बैठी। कुछ ही दूरी पर उसे एक शिकारी मिला, जिसने हिरणी को रिझाने के लिए मीठी घास और सुस्वादु फल बिखेर रखे थे। हिरणी ने उस क्षणिक सुख (दैहिक तृप्ति) को ही जीवन का परम आनंद मान लिया और वहाँ रुक गई।


जैसे ही उसने घास चरना शुरू किया, वह शिकारी के बिछाए जाल में फंस गई। जब वह जाल में तड़प रही थी, तब उसे समझ आया कि जिसे वह ‘स्वतंत्रता’ समझ रही थी, वह वास्तव में उसके विनाश का जाल था। और जिस पारिवारिक झुंड को वह ‘बंधन’ समझती थी, वही उसकी वास्तविक सुरक्षा और स्वाभिमान का कवच था।


आज की आधुनिक नारी की स्थिति भी इसी हिरणी जैसी हो रही है। ‘माय बॉडी माय रूल’ के नाम पर जो क्षणिक दैहिक सुख या कॉर्पोरेट गुलामी का लालच परोसा जा रहा है, वह वास्तव में पुरुष-प्रधान बाजारवाद का एक शिकारी जाल है, जिसमें स्त्री केवल उपभोग की वस्तु (Object) बनकर रह जाती है।


विवाह की आवश्यकता और मनोवैज्ञानिक संताप प्रकृति और संस्कृति का एक अकाट्य नियम है—समयबद्धता। करियर की अंधी दौड़, अंधाधुंध पैसा कमाने की लालसा और ‘आत्मनिर्भरता’ की अतिवादी परिभाषा के कारण आज विवाह की सही उम्र लगातार पीछे छूटती जा रही है। भारतीय शास्त्र और आयुर्वेद मानते हैं कि सही समय पर विवाह और मातृत्व केवल शारीरिक आवश्यकता नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक संतुलन के लिए अनिवार्य है।


जब इस प्राकृतिक चक्र की उपेक्षा की जाती है, तो समाज में कई गंभीर समस्याएं उत्पन्न होती हैं:

भावनात्मक खोखलापन और अवसाद: ३०-३५ वर्ष की आयु के बाद अकेलेपन, अत्यधिक कार्य-तनाव और ‘लिव-इन या हुकअप’ संबंधों के टूटने के बाद महिलाओं में चिड़चिड़ापन, एंग्जायटी और डिप्रेशन की समस्या तेजी से बढ़ रही है। पश्चिमी देशों में आज करोड़ों महिलाएं ४० की उम्र पार करने के बाद अकेली हैं और एंटी-डिप्रेसेंट (अवसाद की दवाइयाँ) के सहारे जी रही हैं।

पारिवारिक बिखराव: देर से होने वाले विवाहों में अक्सर दोनों पक्षों में वैचारिक हठधर्मिता होती है, जिससे आपसी सामंजस्य नहीं बैठ पाता और परिवार टूट जाते हैं।


उत्तम संतानों का अभाव: जैविक रूप से मातृत्व में अत्यधिक देरी होने से न केवल स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं आती हैं, बल्कि बच्चों को वह समय और संस्कार नहीं मिल पाते जो एक युवा और ऊर्जावान माता दे सकती है।

पुरुषार्थ व्यवस्था: ‘अर्थ’ और ‘धर्म’ का संतुलन सनातन संस्कृति में परिवार को छोड़कर केवल पैसा कमाने या नौकरी के पीछे भागने को कभी भी सही नहीं माना गया है। सनातन धर्म में धन कमाना (अर्थ) जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जरूर है, लेकिन यह कभी भी बच्चों के प्रति कर्तव्यों और पारिवारिक मूल्यों की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

ऋणों से मुक्ति (पितृ ऋण): सनातन धर्म के अनुसार, मनुष्य पर तीन मुख्य ऋण होते हैं—देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। गृहस्थ जीवन में प्रवेश करके एक संस्कारी संतान को जन्म देना और उसका सही लालन-पालन करना पितृ ऋण से मुक्ति का मार्ग है।


अंधाधुंध भागदौड़ का विरोध: अपनी बुनियादी जरूरतों को भूलकर, केवल दूसरों की चाकरी या नौकरी में दिन-रात एक करना और अपने बच्चों को लावारिस या बिना संस्कारों के छोड़ देना ‘अधर्म’ की श्रेणी में आता है। यदि हमारा परिवार और बच्चे ही किसी काम के न रहें (यानी कुसंस्कारी या दिशाहीन हो जाएं), तो ऐसी नौकरी या पैसे कमाने की व्यवस्था का कोई सामाजिक मूल्य नहीं है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य : चरित्र बल और सच्चा स्वाभिमानभारतीय सनातन संस्कृति ने कभी भी शारीरिक सुख या कामवासना को पाप नहीं माना, लेकिन उसे ‘धर्म’ के नियंत्रण में रखा।

विवाह एक आध्यात्मिक मिलन सनातन में शारीरिक संबंध केवल वासना तृप्ति का साधन नहीं है, बल्कि वह संतानोत्पत्ति और दो आत्माओं के मिलन का एक पवित्र माध्यम है, जिसे केवल ‘विवाह संस्कार’ के भीतर ही मान्यता दी गई है। जब एक नारी अपने चरित्र की रक्षा करती है, तो उसका मानसिक बल, संकल्प शक्ति और तेज (ओज) बढ़ता है।


सच्चा स्वाभिमान क्या है?: किसी दफ्तर में आठ-दस घंटे टारगेट पूरा करने का दबाव झेलना और बॉस की डांट सुनना स्वाभिमान नहीं है। सच्चा स्वाभिमान उस अधिकार में है जो एक स्त्री को अपने घर में ‘निर्णायक’, ‘संस्कारदात्री’ और ‘पूजनीय’ बनाकर मिलता है। वीर शिवाजी को ‘छत्रपति’ बनाने वाली माता जीजाबाई थीं, न कि कोई कॉरपोरेट जॉब करने वाली महिला।

पुरुषों के लिए स्पष्ट संदेश : रक्षक और मार्गदर्शक का दायित्व


हालाँकि यह लेख मुख्य रूप से नारियों की स्थिति पर केंद्रित है, परंतु इस व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी पुरुषों के कंधों पर भी आती है। भारतीय संस्कृति पुरुषों को ‘पति’ (अर्थात पालन करने वाला) और ‘भर्ता’ (पोषण करने वाला) कहती है। यदि आज की नारी घर छोड़कर बाहर की दौड़ में भाग रही है, तो पुरुषों को आत्ममंथन करना होगा कि क्या वे परिवार के विभिन्न स्तरों (पिता, भाई, पति, पुत्र) पर अपनी स्त्री को वह पूर्ण सुरक्षा, असीम सम्मान और मानसिक शांति दे पा रहे हैं जिसकी वह हकदार है?

जब पुरुष अपने पुरुषार्थ, त्याग और निष्ठा से घर को एक सुरक्षित स्वर्ग बनाएगा, तभी गृहलक्ष्मी का स्वाभिमान घर के भीतर सुरक्षित रहेगा। पुरुषों को स्त्रियों के प्रति अपनी दृष्टि को केवल उपभोग की वस्तु से ऊपर उठाकर श्रद्धा, पूजनीय भाव और अर्धांगिनी के रूप में स्थापित करना होगा, क्योंकि एक सशक्त पुरुष ही एक सुरक्षित और संस्कारी परिवार की ढाल बन सकता है।

गौरव की पुनस्थापना


नारी की सुरक्षा, नारी के स्वाभिमान और नारी की गरिमा की पूरी जिम्मेदारी परिवार के विभिन्न स्तरों पर दी गई है और नारी द्वारा ही परिवार की व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित किया जा सकता है। समय आ गया है कि हम पश्चिमी नारीवाद के इस खोखलेपन को पहचानें जो स्त्री को पुरुष जैसा बनने की विकृत प्रेरणा देता है, जबकि स्त्री का अपना अस्तित्व पुरुष से कहीं अधिक श्रेष्ठ, संवेदनशील, सृजनात्मक और दिव्य है।


यदि हमें भारत का सर्वांगीण विकास करना है, एक खुशहाल समाज का निर्माण करना है और अपनी भावी पीढ़ी को अवसाद व दिशाहीनता से बचाना है, तो हमें परिवार व्यवस्था को पुनः सुदृढ़ करना होगा। बालिकाओं को शिक्षा अवश्य दी जाए, परंतु वह शिक्षा उन्हें अपने परिवार और संस्कृति से तोड़ने वाली नहीं, बल्कि जोड़ने वाली होनी चाहिए। स्त्री की सुरक्षा, उसका चरित्र बल, उसकी गरिमा और सही समय पर गृहस्थ आश्रम में उसकी ससम्मान प्रतिष्ठा ही हिंदू संस्कृति और राष्ट्र के वैभव का वास्तविक मार्ग है।

श्री लोकेन्द्र शर्मा

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