
जलती धरती माँ: बढ़ता तापमान और पर्यावरण संरक्षण
लेखक: भूपेन्द्र भारतीय (अधिवक्ता व लेखक)
जिस पुण्य भारतवर्ष भूमि पर सनातन धर्म “माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः” अथर्ववेद (12.1.12) का एक दिव्य सूक्त कहता है, जिसका अर्थ है—”भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ”। यह मंत्र हमें प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी, पोषण, संरक्षण और अटूट प्रेम का पाठ पढ़ाता है। वह भूमि वर्तमान में अपने पुत्रों की अतिमहत्वाकांक्षा व उपभोक्तावादी सोच के कारण धू धू कर जल रही है !
जब हम आज से पच्चीस वर्ष पहले गाँवों में गर्मी की छुट्टियां मनाने जाते थे, तो मई-जून के माह में दिनभर खेत- खलिहान व जंगलों में बेधड़क व बगैर किसी गर्मी-लू लगने की चिंता से भटकते व घुमक्कड़ी करते रहते थे। प्रकृति के सुंदर उपहारों का पूर्ण आनंद लेते थे। आम, अचार, खजुरा, करोंदा, जामुन आदि इस मौसम के फलों का आनंद लेते थे व पानी का कोई अभाव नहीं था।
उन दिनों गर्मी का मौसम वर्तमान की तरह डरावना नहीं लगता था, बल्कि हमारे लिए वह समय सबसे मजेदार व जीवन के सबसे अच्छे दिन रहे थे। लेकिन क्या यह सब आज के बच्चे व किशोर कर सकते है ? उन्हें हम वह वातावरण व प्राकृतिक सुकून दे पा रहे हैं? यदि वे हमारे समय की बेफिक्री से घुमे तो एक दिन में बिमार हो जाए। उस गर्मी में तापमान वर्तमान जैसा विकराल नहीं था।
धरती का तापमान बढ़ने के मुख्य कारण
इसका स्पष्ट कारण है कि वर्तमान में धरती का तापमान आसमान छू रहा है। धरती माँ जलने लगी है। कांक्रीट के जंगलों ने धरती माँ की साँसों को जैसे रोक दिया हो। धरती माँ अपने पुत्रों की ओर दयनीय भाव से देख रही है! अति शहरीकरण हमारी सामाजिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं है। भारतवर्ष की आत्मा गाँवो में बसती है लेकिन पीछले दो दशकों में गाँवो का भी भूगोल व सामाजिक तानाबाना बदल गया है। गाँव अब अपने मूल स्वभाव में नहीं रहे। वे प्रकृति से दूर जा रहे हैं जिसके कारण भी तापमान बढ़ रहा है।
खेती किसानी में दिनोंदिन बढ़ते रसायनिक पदार्थों के कारण भी हमारी धरती घुट घुट कर मरने के कगार पर है। धड़ल्ले से कटते जंगल और उनके आसपास बड़े बड़े कांक्रीट शहरों का निर्माण होना आगे चलकर धरती माँ के लिए खतरे के निशान से ऊपर वाली बात है। कारों, वातानुकूलित(एसी), फ्रिज जैसी मशीनें हर घर में जरूरत से ज्यादा होना भी तापमान बढ़ने का एक बड़ा कारण है। धरती का बढ़ता तापमान मानवजाति के सामने सबसे बड़ा खतरा है।
साइंस पत्रिका कहती है कि वैज्ञानिकों को एक बात खाए जा रही है कि धरती का तापमान, “भले ही धीरे-धीरे बढ़ रहा है, मगर यह लगातार बढ़ता जा रहा है और इस पर रोक लगाना नामुमकिन जैसा हो रहा है।” लेकिन आलोचकों को इस दावे पर शक है। उनका कहना है कि ज़्यादातर वैज्ञानिक जो मानते हैं कि धरती का तापमान बढ़ता जा रहा है, वह बिलकुल सच है। मगर इसकी वजह क्या है और इसके क्या नतीजे होंगे, इस बारे में वैज्ञानिक सिर्फ अटकलें लगाते रहते हैं। जबकि इसके लिए प्रथम दृष्टया मानव, उपभोक्तावादी व बाजारवादी सोच रखने वाले देश व मानव समूह प्रमुखता से जिम्मेदार है।
पर्यावरण संरक्षण: अनुपम मिश्र के विचार
वहीं बढ़ते तापमान और पर्यावरण संकट के इस दौर में अनुपम मिश्र के विचार और कार्य अत्यंत प्रासंगिक हैं। अनुपम जी का मानना था कि जल संकट (जो बढ़ते तापमान का प्रमुख कारण/परिणाम है) केवल तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक समस्या है। उन्होंने अपनी पुस्तकों, विशेषकर “आज भी खरे हैं तालाब” में सदियों पुरानी पारंपरिक जल संचयन तकनीकों (जैसे- तालाब, बावड़ी, जोहड़) को पुनर्जीवित करने पर जोर दिया।
वे मानते थे कि पर्यावरण को बचाने के लिए समुदाय की भागीदारी अनिवार्य है। उनका जोर ‘विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन’ पर था, यानी पानी का प्रबंधन स्थानीय स्तर पर हो। प्रकृति के साथ तालमेल: “राजस्थान की रजत बूँदें” पुस्तक में उन्होंने रेगिस्तान के कठोर वातावरण में भी पानी बचाने की अनूठी संस्कृति का वर्णन किया है। अनुपम मिश्र के विचार हमें सिखाते हैं कि “प्रकृति का शोषण नहीं, बल्कि उसके साथ तालमेल बिठाकर ही हम बढ़ते तापमान जैसी चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। वे पानी को केवल ‘संसाधन’ नहीं, बल्कि ‘जीवन का हिस्सा’ मानते थे।”
नरवाई (पराली) जलाने की गंभीर समस्या और प्रशासनिक विफलता
विगत दिनों मैं मांगलिक व अन्य सुख-दुख के आयोजनों में अपने क्षेत्र के नजदीकी गाँवों व कस्बों में जाना हुआ तो देखा इस बार भी नरवाई(पराली जैसा ही) बड़ी मात्रा में जलाई गई है। इस बार इससे नुकसान ज्यादा हुआ। इसका एक बड़ा कारण शासन के द्वारा कठोर आर्थिक दंड। स्पष्ट नियमों व किसान लाभार्थी नियमों का नहीं होना भी है।
कुछ किसानों पर नरवाई जलाने के कारण कार्यवाही भी हुई। इस आर्थिक दंड के डर के कारण सुनने में आया कि बहुत से किसानों ने नरवाई जलाने के लिए गुपचुप नरवाई में आग लगा दी है और उसे ऐसा ही छोड़ दिया। वह आग अन्य फलदार व हरे वृक्षों को नहीं जलाये उसकी निगरानी के लिए किसान वहीं रूके लेकिन वह प्रशासन के डर से आग लगाकर भाग जाता हैं।
जिससे क्षेत्र में नरवाई के साथ बड़ी संख्या में हरे व बड़े फलदार वृक्ष भी जलते है। इसके लिए शासन का कठोर आर्थिक दंड, स्पष्ट नियमों का अभाव व उसे ठीक से नहीं लागू करना बड़ा कारण है।
वहीं देखने में आता है कि जब चुनाव आते है तो जनप्रतिनिधि व प्रशासन अच्छे से चुनाव सम्पन्न कराने के लिए अपनी बात मतदाताओं को कितने प्रेम से व घर घर जाकर बताते है लेकिन पर्यावरण संरक्षण व तापमान संतुलन जैसे गंभीर मामलों में प्रशासन व जनप्रतिनिधियों को देखा गया है कि ऐसे कार्यों में वे व्यवहारिकता व जनता के बीच अपनी बात गंभीरता से नहीं पहुंचाते हैं।
गाँवों में अधिक मात्रा में चौपालें लगाकर नरवाई नहीं जलाने व उसके आर्थिक पहलू का वैकल्पिक मार्ग अच्छे से बताते तो इतनी बड़ी मात्रा में पर्यावरण का नुकसान नहीं होता। साथ ही धरती का तपमान कुछ तो कम होता। उम्मीद है अगली बार दोनों पक्ष अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वाह करेंगे। जिससे प्रकृति व पारिस्थितिकीय तंत्र आगे ठीक रहेगा।
आखिर हम धरती को माँ कहते हैं और उसके साथ ऐसा व्यवहार करना कहाँ तक उचित है ? जो धरती माँ हमें जीवन जीने के लिए सब कुछ खुले हाथों से देती है उसे हम बढ़ते तापमान के आगे झुलसने के लिए क्यों विवश कर रहे हैं ?